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हर्षनाथ मंदिर सीकर राजस्थान – जीणमाता मंदिर सीकर राजस्थान

हर्षनाथ मंदिर सीकर राजस्थान – जीणमाता मंदिर सीकर राजस्थान

भारत के राजस्थान राज्य के सीकर से दक्षिण पूर्व की ओर लगभग 13 किलोमीटर की दूरी पर हर्ष नामक एक छोटा सा गांव बसा हुआ हैं। इसके पास ही हर्ष नामक एक पर्वत है। यहां भगवान शिव को समर्पित हर्षनाथ मंदिर है। जो एक ऐतिहासिक स्थल है तथा भक्तों में काफी प्रसिद्ध है। इसी हर्षनाथ मंदिर के कारण ही इस गांव का नाम हर्षनाथ पड़ा तथा जिस पहाडी की तलहटी मे यह मंदिर स्थित हैं इस पहाड़ी का नाम भी हर्षनाथ पर्वत इसी मंदिर के कारण कहा जाता है। हर्षनाथ मंदिर की कथा, और इस स्थान के महत्व, दर्शन आदि के बारें मे हम नीचे विस्तार से जानेंगे।

कहा जाता हैं कि किसी समय हर्षनाथ गांव अत्यंत विस्तृत एवं वैभव सम्पन्न नगर था। जिसके बारें में जनसाधारण में अनेक किवदंतियां प्रचलित हैं। इसे आजकल हर्ष के भैरूजी के रूप में भी विशेष लोक मान्यता प्राप्त है। परंतु मूल रूप में यह हर्षदेव अर्थात भगवान शिव का पुण्य स्थल है। इसके अलावा यह देवस्थान भक्तों के साथ साथ ऐतिहासिक शोधकर्ताओं तथा कला समीक्षकों के लिए भी एक महत्वपूर्ण स्थल रहा है। समय समय पर सर्जेंट ई डीन, प्रोफेसर कीलहार्व, सर कर्निघम, कारलाइन, डा. भण्डाकर, स्वर्गीय ओझाजी आदि प्रसिद्ध विद्वानों ने इस स्थान की यात्रा करके अपने श्रम को सफल एवं उपयोगी बनाया है। इसी प्रकार अनेक कला समीक्षकों ने भी हर्षगीरि की प्रस्तर प्रतिमाओं का गंभीरता पूर्वक अध्धयन करके उनका महत्व उदघाटित किया है। इस विषय मे राजस्थान के पुरातत्व संग्रहालय विभाग के विद्वान निदेशक श्री रत्नचंद्र अग्रवाल द्वारा लिखे हुए अनेक महत्वपूर्ण लेख संग्रहित है। और जो विविध शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए है। हर्षनाथ की कलाकृतियों की सुरक्षा एवं अध्ययन हेतू सीकर में एक संग्रहालय भी बना हुआ है। जिसमें यहां से प्राप्त अनेक प्रतिमाएं संग्रहित है। यहां की अनेक मूर्तियां विदेशों के संग्रहालयों की भी शोभा बढ़ा रही है।

हर्षनाथ मंदिर के सुंदर दृश्य
हर्षनाथ मंदिर के सुंदर दृश्य

हर्षनाथ मंदिर सीकर का इतिहास


सन् 1834 ईसवीं में सर्जेंट ई डीन.ने हर्षनाथ के महत्वपूर्ण शिलालेखों का पता लगाया था। यह प्रसिद्ध शिलालेख इस समय सीकर के संग्रहालय में सुरक्षित है। इस शिलालेख के शुरुआत में हर्ष नाम से शिवजी की हर्ष पर्वत की एवं पूजा निमित्त निर्मित देवालय की प्रसंशा है। इसके बाद यहां के नामकरण पर प्रकाश डाला गया है कि किस प्रकार हर्षनाथ का नाम पड़ा। जिसके अनुसार भगवान शंकर त्रिपुर नामक एक राक्षस का संहार करने पर हर्ष उत्पन्न होने के कारण इंद्र आदि देवताओं के द्वारा हर्ष रूप भगवान शंकर की इस पर्वत पर पूजा की गई। जिससे भगवान शिव का एक नाम हर्षदेव पड़ा। तथा इस पर्वत का नाम हर्षगीरि तथा समीपस्थ नगरी का नाम हर्ष नगरी प्रसिद्ध हुआ।जो आगे चलकर हर्षनाथ पर्वत तथा हर्षनाथ नगरी के रूप में जाना जाने लगा।


इस शिलालेख में आगे प्रतापी एवं यशस्वी चौहान राजाओं की वंशावली दी गई है। तथा उनके शौर्य एवं दान का वर्णन किया गया है। साभंर के चौहान राजाओं ने इस देवालय को प्रचुर सम्पत्ति भेंट की थी। हर्षनाथ उनके लिए उसी प्रकार आराध्य थे जिस प्रकार मेवाड़ के गुहिलों के लिए एकलिंगजी सदा से रहे है। शिलालेख में हर्षगीरि के तपस्वी साधकों का भी वर्णन हैं। जिनकी चेष्टा से इस हर्षनाथ मंदिर का निर्माण हुआ। साथ ही इस देवस्थान को भेंट में मिले हुए गांवों तथा खेतों की भी सूची दी गई है। यह महत्वपूर्ण लेख संस्कृत श्लोकों में है। और इसकी भित्ति आषाढ़ शुक्ला 15 संवत् 1030 है।

हर्षनाथ मंदिर के सुंदर दृश्य
हर्षनाथ मंदिर के सुंदर दृश्य





काफी लम्बे समय तक हर्षनाथ मंदिर का यह कलापूर्ण देवस्थान सुरक्षित रह कर अपने भक्तों के लिए पूजा का विशेष केन्द्र बना रहा। परंतु मुगल बादशाह औरंगजेब के शासन काल में उसके सेनापति खान जहान बहादुर ने अपने स्वामी की प्रसन्नता के लिए इसमें बारूद भर कर इसका विनाश कर दिया था। फिर भी भक्तों के ह्रदय में इस पुण्य स्थल के प्रति श्रृद्धा भावना बनी रही जो किसी रूप में आजतक बनी हुई है।





हर्षनाथ गांव से हर्षनाथ पर्वत पर जाने के लिए पक्का मार्ग बना हुआ है। लगभग साढ़े चार किलोमीटर की चढ़ाई है। पहले चोर चक्की नामक विश्राम स्थल आता है। जिसके बारे में किवदंती है कि पुराने जमाने में हर्षनगरी में कोई चोर आ घुसता था, तो यहां पर रखी हुई एक चक्की अपने आप चलने लग जाती थी। और उससे नागरिक सचेत हो जाते थे। अगला विश्राम स्थल गौमंती के नाम से प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि इस स्थान पर पहिले गाये रहती थी। चढाई समाप्त होने पर पर्वत पर लगभग एक मील तक समतल सी भूमि आती है। अंत में प्राचीन हर्षनाथ मंदिर के दर्शन दृष्टिगोचर होते है। जो अब खंडहर स्वरूप से दिखाई पड़ते है। इस विध्वंस देवालय के सामने खड़ा होते ही यात्री कल्पना के द्वारा मानों प्राचीन काल में पहुंच जाता है। अपने पूरे वैभव में यह पुण्य स्थल कितना भव्य रहा होगा, हर्षनाथ मंदिर दिव्य भवन को गिराते समय आक्रमणकारियों के कठोर ह्रदय में मानवीय भावनाएं सर्वथा लुप्त हो गई होगी, मनुष्य के पागलपन की यह नृशंस लीला दर्शक के चित्त को आलोकित कर डालती है।




हर्षनाथ मंदिर के निर्माण के लिए इस स्थान का चुनाव करने में बड़ी समझदारी प्रकट हुई है। हर्षनाथ मंदिर की नींव रखने के लिए पर्वत के अंतिम भाग को चुना गया है। यह स्थान समुद्रतल से करीब 3000 फीट की ऊचाई पर स्थित है। यहां से दूर दूर के नगर तथा गांव चारों ओर दिखाई देते है। एक ओर कुछ दूरी पर खारे पानी का एक विस्तृत ताल फैला हुआ है।

जीणमाता मंदिर का इतिहास




हर्षनाथ मंदिर से लगभग साढ़े तीन किलोमीटर की दूरी पर जीणमाता दृष्टिगोचर होती है। हर्षनाथ के साथ जीणमाता का नाम स्वभाविक रूप से जुडा हुआ है। इस विषय में कई रोचक कहानियां लोक प्रचलित है। जीणमाता पुराण वर्णित जयंती देवी है। इस का एक नाम भ्रामरी देवी भी है। लोक गीतों में इसे भूरा की रानी कहा जाता है। जीणमाता के मंदिर में भी कई शिलालेख है। जो इस शक्तिपीठ की ऐतिहासिक जानकारी देते है।





इसी प्रसंग में हर्ष और जीण के लोक गीतों पर भी कुछ प्रकाश डालना उचित होगा। गीत का सार इस प्रकार है। धाधू में हर्ष और जीण दो भाई बहन थे। उनमें हर्ष बड़ा था और जीण छोटी थी। उनके माता पिता मर चुके थे। इसलिए जीण का भार उसके भाई हर्ष पर ही था। एक दिन जीण और उसकी भावज अर्थात हर्ष की पत्नी पानी लाने के लिए तालाब पर गई। वहां भावज ने अपनी नडंद जीण को कुछ कटु वचन कह दिए। जिनसे रूष्ट होकर वह तप करने घर से निकल गई। जब भाई हर्ष को बहन के घर छोडऩे का समाचार मिला तो वह उसे प्रसन्न करके वापिस लाने के लिए उसके पीछे गया। परंतु जीण ने किसी भी हालत हालत में वापिस घर लौटना स्वीकार नहीं किया। ऐसी स्थिति मे भाई हर्ष भी अपनी बहन के साथ ही तप करने के लिए चल पड़ा। आगे जाकर दोनों अलग अलग पर्वतों पर तप करने लगे और आगे चलकर देव और देवी के रूप में लोक पूजित हुए।




एक बार बादशाह की सेना जीणमाता का मंदिर तोडने के लिए आई परंतु वहां एक साथ ही अनगिनत भौंरों का दल प्रकट हुआ और बादशाह की फौज के सिपाहियों को काटने लगा। इस प्रकार शाही सेना की बड़ी दुर्गति हुई तो बादशाह ने देवी को भेंट चढ़ा कर अपना पिंड छुडाया। इसके बाद जीणमाता की मानयता और भी अधिक बढ़ गई। यही कारण है कि लोक गीतों मे भी भाई और बहन (हर्ष और जीण) दोनों के नामों को एक साथ ही मिलाकर गाया जाता है।

जीणमाता सीकर राजस्थान
जीणमाता सीकर राजस्थान




यह संतोष का विषय है कि हर्षनाथ के विध्वंसत किए जाने के बाद भी इस स्थान के महात्मय को बनाएं रखने की चेष्टा जरूर की जाती रही है। हर्षनाथ के मंदिर की नींव पर बिखरी हुई शिलाएँ एवं पत्थर रख कर प्राचीन स्मृति के कारण उसे एक मंदिर का रूप दिया गया है। मंदिर के आगेवाला भाग में भी प्राचीन खम्भों को खड़ा करके उन पर शिलाओं से छत पाट दी गई है। इसी प्रकार प्राचीन कलापूर्ण प्रतिमाओं को भी दीवारों के भाग में बाहर या भीतर दिखाई देते हुए लगाने की चेष्टा की गई है। प्रधान मंदिर के सामने आंगन में सफेद चिकने पत्थर की विशाल नंदीश्वर प्रतिमा स्थापित है। मूर्ति खुले आकाश में रखी हुई है। और मानो निनिर्मेष नयनों से खंडित हर्षनाथ की काले पत्थर की पिंडी की ओर देख रही है।




अश्विन और चैत्र मास में दुर्गापूजा के अवसर पर जीणमाता के स्थान पर भव्य मेला लगता है। और दूर दूर से भक्त जनता यहां देवी दर्शन के लिए तथा जात- जूडलो के लिए एकत्र होती है। इसके बाद चतुर्दशी को हर्षनाथ मंदिर पर भैरूजी का बडा विशाल मेला लगता है। और वहां भी भक्त लोग उमड़ पडते है। मेलो के समय इन स्थानों की महिमा देखते ही बनती है।

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