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सरहिन्द शरीफ दरगाह – रौजा शरीफ

सरहिन्द शरीफ दरगाह – रौजा शरीफ

सरहिन्द भारत के पंजाब प्रांत का एक खूबसूरत नगर है। जो दिल्ली अमृतसर हाइवे पर अंबाला और लुधीयाना के बीच में पडता है। मंडी गोबिंदगढ और खन्ना जैसे प्रमुख नगरो के यह बिल्कुल करीब ही है। सरहिंद की धार्मिक महत्वता इसलिए अधिक है क्योकि यहा सिखो और मुस्लिमो का प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। यहा सिखो का प्रसिद्ध गुरूद्वारा फतेहगढ साहिब है। और उसी के पास में मुस्लमानो का दूसरा मक्का कहा जाने वाला रौजा शरीफ भी यही पर स्थित है। जिसे सरहिन्द शरीफ दरगाह के नाम से भी जाना जाता है। यह दरगाह अपने समय के प्रसिद्ध सूफी संत हजरत मजर्रद अलफ सा़नी की है। जिसकी जियारत के लिए भारत ही नही विदेशो से भी जियारीन जियारत के लिए यहा आते है। आज की अपनी इस पोस्ट में इसी प्रसिद्ध सरहिन्द शरीफ दरगाह की जियारत करेंगे और सरहिन्द व इस महान हस्ती सूफी संत हजरत मजर्रद अल्फ सानी के बारे में विस्तार से जानेगें।

 

हजरत मज़र्रद अल्फ सा़नी कौन थे

हजरत मजर्रद अल्फ सानी जिन्हे अहमद सरहिन्दी के नाम से भी जाना जाता है। इनकी गिनती उन जलिलोकद्र बुजुर्गो में होती है। दीन ए हक के लिए कुफ़र और शिर्क का मुकाबला किया और हिन्दुस्तान की सरज़मी पर इस्लाम का परचम लहराया। हजरत मजर्रद अल्फ सानी ने अकबर और जहांगीर का दौर देखा है जब कई इस्लाम के मुहददीस कहे जाने वाले लोग इस्लाम को कुफर, शिर्क और नाहक़ की ओर ले जा रहे थे। हजरत ने उनका डटकर मुकाबला किया। और वह इसमे कामयाब भी हुए।

 

सरहिन्द शरीफ दरगाह मुख्य गेट
सरहिन्द शरीफ दरगाह मुख्य गेट

 

सरहिन्द

पुराने जमाने में यहा एक घना जंगल था। जिसमे बेशुमार शेर और दूसरे दरिंदे रहते थे। फिरोजशाह तुगलक के जमाने मे शाही सैनिक व अधिकारी सरकारी खजाना लिए हुए लाहौर से दिल्ली जा रहे थे। जब वो इस घने जंगल में गुजरे तो उनमें से एक नेक और पाकिजा अधिकारी को ये महसूस हुआ के यह स्थान एक महान सूफी संत पैदाइस से रौशन होगा। इस सख्स ने अपनी महसूस की हुई बात का जिक्र शाही दरबार दिल्ली के आलीमो और सुल्तान के पीरो से किया। आलिमो और पीरो को उसकी महसूस की गई बात में सच्चाई दिखाई दी। उन्होने सुल्तान को यहा एक शहर बसाने के लिए कहा। दिल्ली के सुल्तान ने आलिमो की बात माने हुए अपने वजीर ख्वाजा फतह उल्ला को दो हजार आदमी दे कर उस जगह एक शहर बसाने का हुक्म देकर रवाना किया। और इस शहर को बसाकर इसका नाम शेररिन्द रखा गया। जिसका अर्थ होता है। शेर का अर्थ शेर होता है और रिन्द का अर्थ जंगल होता है अर्थात सरहिन्द का अर्थ हुआ “शेरो का जंगल”। धीरे धीरे इस शहर की आबादी बढती गई। और इसको शेररिन्द से सरहिन्द कहा जाने लगा। बादशाह ओरंगजेब के जमाने में सिखो ने इस शहर पर कब्जा कर लिया।और किले को तोडकर यहा एक बडे गुरूद्वारे का निर्माण करया। जो आज भी यहा गुरूद्वारा फतहगढ साहिब के नाम से जाना जाता है। इसी के करीब में रेलवे लाइन पार करके सरहिन्द शरीफ दरगाह है।

 

हजरत मजर्रद अल्फ सानी की पैदाइस

 

कहा जाता है कि हजरत मुजर्रद अल्फ सानी की पैदाइस से पहले आपके वालिद बुर्जगवार ने ख्वाब में देखा। कि तमाम जहान अंधेरे में घिरा हुआ है। बंदर, रीछ, सूअर इंसानो को मार रहे है। उनके सिने से नूर की एक रोशनी निकली उस रोशनी में से एक तख्त हाजिर हुआ। उस तख्त पर एक बुजुर्ग तकिया लगाए बैठे है। उनके सामने तमाम जालिम बे दीन हलाक हो गए। आपके वादिल ने यह ख्वाब आलिमो दीन व कुतबो को बयां किया। उन्होने तस्किरा करके बताया कि आपके यहा एक लडका पैदा होगा। जो तमाम बदीनी और नाहक का खातमा करेगा। आपकी वालिदा फरमाती है की आपकी शेख अहमद की पैदाइस के समय मुझ पर बेहैशी सी छा गई थी। क्या देखती हुं की रसूल अल्लाह उम्मत के तमाम वलियो के साथ मेरे घर तशरीफ लाए है। और आवाज आती है कि अल्लाह ने शेख अहमद को अपनी खास रहमत से नवाजा है। यह इस्लाम का मुहाफिज होगा। लिहाजा इनकी जयारत करोगे तो बख्शे जाओगे। हजरत मुजर्रद अल्फ सानी की पैदाइस 14 सुलाव जुमे के दिन 1795 को हुई थी।

 

सरहिन्द शरीफ दरगाह मुख्य गुम्बद
सरहिन्द शरीफ दरगाह मुख्य गुम्बद

 

हजरत मजर्रद अल्फ सानी का बचपन

आपकी पैदाइस रसूल अल्लाह की सुन्नत के तरीके से हुई थी। आप आम बच्चो की तरह रोते हुए पैदा नही हुए ना ही बचपन में आम बच्चो की तरह रोते थे। और हमेशा खुश ल मुस्कारते रहते। काम की ज्यादती होने पर अगर आपकी वालिदा दुध पिलाना भी भुल जाती तो भी आप खामोशी रहते। आपकी शक्ल बहुत प्यारी और भोली भाली थी। जो भी आपको देखता मुहब्बत करने लगता। धीरे धीरे आप बडे होते गए आपको रोजा नमाज की तालिम आपके वालिद बाखूबी बचपन से ही देते थे। जब हजरत मजर्रद को मदरसे में तालिम के लिए भेजा गया तो आप थोडे ही समय में कुरान के हाफिज हो गए। इसके बाद आप और तालीम के लिए सियालकोट गए। बालिग होने से पहले ही मजर्रद अल्फ सानी तमाम इल्म व तालीम से फारिग हो गए थे।

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सरहिन्द शरीफ को रौजा शरीफ क्यो कहा जाता है

ऐसा कहा जाता है कि हजरत मजर्रद अल्फ सानी को हज बेतुल्लाह यानि काबा शरीफ की जयारत का बहुत खुवाहिश थी। आप काबा शरीफ के दीदार के लिए बैचेन रहते थे। एक मरतबा हजरत मजर्रद अल्फ सानी इसी सोच में बेहोशी की सी हालत में बैठे थे कि क्या देखते है। कि तमाम इंसान फरीश्ते जीन आदि सारी मखलुकात नमाज अदा करते हुए आपकी तरफ रूख करके सजदा कर रहे है। जब आपने अपने आस पास तवज्जो फरमाई तो क्या देखते है कि काबा शरीफ खुद आप से मुलाकात के लिए आया है। आवाज आती है कि आपको काबा शरीफ के जियारत का बहुत शौक था। इसलिए हमने काबा को आपकी जियारत के लिए भेज दिया। लिहाजा यही वजहा है की हजरत यह जगह तभी से आज तक काबा शरीफ के नूर की रोशनी से अफजल हो गई।

आप सरहिन्द शरीफ दरगाह के कुछ बाहरी और अंदर के दृश्य विडियो के माध्यम से भी देख सकते है:—

 

सरहिन्द शरीफ दरगाह

सरहिन्द शरीफ दरगाह ईंटो और लाल बलुआ पत्थरो से बनी हुई है। दरगाह का बाहरी गेट दो मंजिला इंटो से बनाया गया है। जो कि सरहिन्द- बस्सी पाठाण रोड के किनारे पर बना है। दरगाह के बहारी गेट से दाखिल होने पर सामने सरहिन्द शरीफ दरगाह का मुख्य गेट और दरगाह का बडा गुम्बद दिखाई देता है। बहारी गेट और मुख्य गेट के बीच के रास्ते में दोनो तरफ कतारबद्ध महमान खाना बना है। जिसमे अनेक कमरे बने है। सरहिन्द शरीफ दरगाह की जियारत के लिए आने वाले जायरीनो के रूकने लिए यह कमरे बनाए गए है। दरगाह की बगल में हजरत की मस्जिद भी बनी है। जिसको अब ओर विस्तार करके बडा बनाया गया है। मुख्य दरगाह दो मंजिला है। जिसमे नीचे का हिस्सा छोटी ईंटो चुना से बना है जिसमे हजरत की कब्र और भी कई कब्रे है। जबकि दरगाह का दूसरी मंजिल का हिस्सा लाल बलुआ पत्थर व इटो से गुम्ददार बना है। जिसमे ऊपर जाने के लिए सीढिया भी बनाई गई है। जो शायद दरगाह को अच्छा लुक देने के लिए बाद का भी बनाया हुआ हो सकता है। जब में सरहिन्द शरीफ दरगाह पर गया था तो वह रात्री का समय था। लगभग आठ बज रहे होगे। दूसरी मंजिल पर ऊपर क्या है मेने जाकर नही देखा। क्योकि मुझे आशंका थी की शायद ऊपर जाना मना हो क्योकि वह मुख्य दरगाह के ठीक ऊपर बना है। रात्रि का समय होने के कारण वहा जायरिन भी बहुत कम थे। दरगाह के प्रांगण में एक पानी का कुदरती चश्मा भी है। लोगो का मानना है कि यह आबे जमजम का पानी है। जब काबा शरीफ हजरत से मिलने खुद यहा चलकर आया था तो उसके साथ वहा की हर नूरानियत यहा आयी थी। जायरिन इस पानी को अपने साथ ले जाते है। दरगाह में जायरिनो के लिए हर रोज लंगर भी रहता है। जो महमान खाने के बिल्कुल पिछे बना हुआ है।

 

 

 

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