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शकों का आक्रमण – शकों का भारत पर आक्रमण, शकों का इतिहास

शकों का आक्रमण – शकों का भारत पर आक्रमण, शकों का इतिहास

शकों का आक्रमण भारत में प्रथम शताब्दी के आरंभ में हुआ था। शकों के भारत पर आक्रमण से भारत में शकों का प्रभुत्व बढ़ता गया। और उन्होंने अनेक राज्य अपने अधिकार में कर लिये थे। शकों का भारत पर आक्रमण भारत के युद्ध इतिहास में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। और भारत के शिक्षा जगत में शकों के भारत में प्रवेश से लेकर उनके शासन, आक्रमण, प्रभुत्व, या शक कौन थे कहाँ से आये आदि अनेक प्रश्न छात्रों से पूछे जाते है। अपने इस लेख में हमने छात्रो के उन सभी प्रश्नों के उत्तर को विस्तार पूर्वक बताया गया और शकों का इतिहास पर रोशनी डाली है।

 

 

शकों का भारत पर आक्रमण के समकालीन भारत की राजनीतिक स्थिति

 

मौर्य साम्राज्य के पतन के आखिरी समय में अंतिम मौर्य सम्राट वृहद्रथ को मार कर पुण्यमित्र पाटलिपुत्र के सिंहासन पर बैठा था। उन्हीं दिनों में यूनानियों का आक्रमण हुआ था और उन्हे पुण्यमित्र ने अंत पराजित किया था। लेकिन उसके बाद भारतीय राजाओं की शक्तियां फिर क्षीण होने लगी। पुण्यमित्र शुंग वंशीय था। इसलिए जब वह मौर्य वंश के शासन का अंत करके सिंहासन पर बैठा, उस समय का मौर्य शासन शुंग वंशीय शासन के रूप में परिणात हो गया। पुण्यमित्र स्वयं एक शूरवीर और सहासी सेनापति था। इसलिए उसके जीवन काल में साम्राज्य की अवस्था अच्छी थी। उसके बाद शासन में शिथिलता पैदा हो गई। यूनानियों को पराजित करके पुण्यमित्र ने उपनी राजधानी शाकल को जिसे आजकल स्यालकोट कहा जाता है। जीतकर अपने अधिकार में कर लिया था। अग्निमित्र उसका बेटा था और वसुमित्र उसके पोते का नाम था। दोनों ही बुद्धिमान शासक थे। शुंग वंशीय साम्राज्य के अंतर्गत अनेक छोटे छोटे राज्यों में उसके सरदारों और सामंतों का शासन चल रहा था। पुण्यमित्र जब तक जीवित रहा वह अपनी राजधानी पाटलिपुत्र में ही रहा करता था। लेकिन उसके बाद शुंग वंश शासक पाटलिपुत्र के स्थान पर कभी कभी अयोध्या और विदिशा में भी रहा करते थे। पुण्यमित्र यही का निवासी था। उसके मरने के बाद मथुरा को छोड़कर उसका वस्तृत राज्य समाप्त हो गया।

 

 

मौर्य वंशीय अंतिम शासक के समय जो मगध साम्राज्य निर्बल हो गया था वह लगातार क्षीण होता गया। पुण्यमित्र के समय उसकी शक्तियां कुछ उन्नत हो सकी थी लेकिन उसके बाद फिर कोई शासक उस सम्राज्य में शक्तिशाली न हुआ। इस बढ़ती हुई निर्बलता के दिनों में मगध राज्य के अनेक शत्रु पैदा हो गये थे। दक्षिण में आंध्र प्रांत के शासकों ने एक विशाल साम्राज्य की प्रतिष्ठा की थी। और मगध साम्राज्य के बचे हुए राज्यों पर उनके आक्रमण आरंभ हो गये थे। इन्हीं दिनों में पश्चिम की ओर से यूनानी और सिथियन जातियों के आक्रमण भी जारी हो गये थे। इन परिस्थितियों में मगध साम्राज्य लगातार कमजोर हुआ शुंग वंशजों के बाद वह कण्व शासकों के हाथ में पहुंच गया था।

 

 

शासन और विलासिता

 

शुंग वंश का अंतिम राजा देवभूमि अत्यंत विलासी था। इसके परिणामस्वरूप शासन में वह अयोग्य साबित हुआ। राज्य के छोटे और बड़े कर्मचारियों पर उसका नियंत्रण लगातार निर्बल होता गया। देवभूमि के मंत्रियों में वासुदेव नामक एक व्यक्ति भी था जो अत्यंत चतुर और कपटी स्वभाव का था। अपने शासक की अयोग्यता का उसने लाभ उठाना आरंभ कर दिया था। राज्य के कर्मचारियों और दूसरे अधिकारियों को उसने अपने अधिकार में कर लिया था। देवभूमि कभी उसकी चालो को समझ न सका। वासुदेव इतना व्यवहार कुशल था कि उसने राजा को सही बातो के समझने का कभी मौका न दिया और इस बात का बहुत बड़ा कारण देवभूमि की अयोग्यता थी। राज्य में एक और प्रबंध संबंधित परिस्थितिया बिगड़ती जा रही थी। और दूसरी और वासुदेव का प्रभाव छोटे बड़े अधिकारियों पर बढ़ता जाता था। देवभूमि की अकर्मण्यता ने वासुदेव के ह्रदय में राज्य का प्रलोभन पैदा कर दिया और उसने बड़ी बुद्धिमानी के साथ अपनी सफलता के लिए षड्यंत्र रचना आरंभ कर दिया। कुछ दिनों के बाद अवसर पाकर वासुदेव ने देवभूमि को मरवा दिया और स्वयं वहा के सिंहासन पर बैठ गया। यह घटना ईसा से 72 वर्ष पहले की है। उसके बाद वहां का शासन कण्व वंशजों के द्वारा आरंभ हुआ। इस वंश के चार राजा सिंहासन पर बैठे और उसके अंतिम राजा सश्रुमन को दक्षिण भारत के आंध्र नरेश ने पराजित किया और मगध के राज्य को उसने अपने राज्य में मिला लिया।

 

 

मद्रास प्रांत में गोदावरी और कृष्ण नदियों के बीच में आंध्र वंश के शासक बहुत पहले रहा करते थे। वहां से उन्होंने पश्चिम की और बढ़ना आरंभ किया और उन दोनों नदियों के बीच के इलाकों को जीतकर उन्होंने अपने अधिकार में कर लिया। परंतु वह अपने इस राज्य की रक्षा बहुत समय तक न कर सके। सम्राट अशोक ने आंध्र राज्य का अंत कर दिया था। और उसे लेकर उसने अपने राज्य का विस्तार किया था। आंध्र राजाओं की पराधीनता बहुत दिनों तक नहीं चली अशोक के मरने के बाद वहां के राजा फिर स्वतंत्र हो गये थे। वहां का तीसरा सातकर्णी अत्यंत प्रतिभाशाली, सुयोग्य और बहादुर था। गोदावरी के उत्तर में उसकी राजधानी प्रतिष्ठान नगर में थी। यह नगर आजकल पैठान के नाम से प्रसिद्ध है। महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में वह नगर बसा हुआ है। सातकर्णी ने अपने शासन काल में बड़ी उन्नति की थी और उसका राज्य बहुत विस्तृत हो गया था।

 

 

सीथियन आक्रमण

 

सीथियन कौन थे? शकों से सीथियन के क्या संबंध थे?

ईसा से लगभग दो शताब्दी पूर्व भारत भारत में यूनानियों ने कई स्थानों को जीतकर अपना राज्य कायम कर लिया था। उनके प्रतापी राजा मेनेन्डर ने मगध राज्य के कई राज्यों के कई नगरों को जीतकर अपने राज्य में मिलाने की चेष्टा की थी। लेकिन पुण्यमित्र ने उसको पराजित कर के उसके इरादों को मिट्टी में मिला दिया था। उसके बाद कुछ समय तक भारत सुरक्षित रहा। परंतु यह अवस्था बहुत दिनों तक नहीं चली। मध्य एशिया में सीथियन लोगों का प्रभुत्व बढ़ा और वे लोग भारत में आकर यहां के राजाओं को परास्त करने और अपना प्रभुत्व कायम करने की कोशिश करने लगे। इन दिनों में भारतीय राजा फिर निर्बल हो गये थे। इस निर्बलता का कारण उनकी आपसी फूट और विलासिता थी। पहलव, शक, यूचि, कुशणा और अन्य कई एक जातियां सीथियन जाति की शाखाएं थी। सीथियन मध्य एशिया के रहने वाले थे। इनमें पहलव और शक जातियों के आक्रमण भारतीय इतिहास में विशेषता रखते है।

 

 

पश्चिमी और मध्य एशिया में जब सेल्यूकस का शासन था, पहलव पार्थिया में रहते थे, और पराधीन थे। लेकिन सेल्यूकस के वंशजों की निर्बलता और अयोग्यता के कारण पहलव स्वतंत्र हो गये थे। और उनके राजा ने फारस, काबुल, सीस्तान और तक्षशिला को जीतकर अपने साम्राज्य को शक्तिशाली बना लिया था। लेकिन अधिक समय तक उनका शासन चल न सका और शकों ने उनको जीतकर नष्ट भ्रष्ट कर दिया था।

 

 

शको का प्रभुत्व

 

शकों कौन थे? शकों की उत्पत्ति कैसे हुई? शकों का इतिहास क्या है? शकों का आक्रमण? शकों का भारत में प्रवेश कैसे हुआ? शक लोग भारत कैसे पहुंचे?

अभी तक जिन विदेशी जातियों ने भारत में आक्रमण किये थे। उनमें शकों का आक्रमण अधिक शक्तिशाली था। शक जाति मध्य एशिया की एक अशिक्षित और जंगली जाति थी। लेकिन आपस में संगठित होकर रहना यह लोग खूब जानते थे। युद्ध में ये लोग लडाकू और आक्रमणकारी थे। युद्ध करने के सिवा उनका और कोई जीवन न था। इस जाति के सभी लोग मिलकर एक साथ रहते थे। और जहां कहीं ये लोग जाते थे, एक साथ मिलकर सब जाते थे। शक लोग मूल निवासी कहाँ के थे? और वे किस प्रकार भारत में पहुंचे थे? इस विषय पर यहां स्पष्ट लिखने की आवश्यकता है। शकों के संबंध में जो विवरण मिलते है। उनमें कहीं कहीं मतभेद हो जा है। इसलिए उनके विषय में सीधी और सही बातों को हम अपने आगे की पंक्तियों में बताने की चेष्टा करेंगे।

 

शकों का आक्रमण
शकों का आक्रमण

 

चीन में तिब्बत और मंगोलिया के बीच का हिस्सा फानसू प्रांत कहलाता है। उसके पश्चिम की ओर चीनी तुर्कीस्तान है। यहां पर यह समझ लेने की जरुरत है। कि ऐतिहासिक पुस्तकों में तुर्क और हूण नामों से जिस जाति का उल्लेख किया गया है। वह एक ही है। तुर्को, हूणों की अलग अलग जातियां नहीं है। बल्कि एक ही जाति के दो नाम है। ये हूण अभी तक इर्तिश के पूर्व में रहते थे। और मध्य एशिया में उनका अभी तक प्रवेश न हुआ था। कानसू प्रांत से लेकर यूनान की सीमा तक शक जाति के लोग रहा करते थे। ये शक लोग आर्य माने जाते थे। लेकिन आर्यों और शकों लोगों में इतना ही अंतर था कि शक लोग असभ्य, गवांर और जंगली थे। उनके रहने का कोई निश्चित देश और स्थान न था।

 

 

कानसू प्रांत की सीमा के पास ही जिस जाति के लोग रहा करते थे, उसे चीन के लोग यूचि कहते थे। इसी यूचि जाति को भारतीय ग्रंथों में ऋषिक के नाम से संबोधित किया गया है। तारीन नदी के उत्तर में ऋषिकों के निकट जो लोग रहते थे वे तुखार कहलाते थे। ऋषिकों को निर्बल समझ कर हूणों ने आक्रमण किया और उन्हें पराजित किया। ऋषिक लोग वहां से भाग कर तुखारों के देश में पहुंचे और वहां पर उन्होंने अपना अधिकार कर लिया। लेकिन ऋषिकों के साथ वहां पर भी संघर्ष पैदा हुआ, इसलिए वे वहां से भी भागें और उनके साथ तुखार लोगों ने भी अपना देश छोड़ दिया। ऋषिक, तुखारों के साथ पश्चिम की ओर चले गये। और भियानशान पहाड़ के आगे निकल गये। वहां से वह लोग दो गिरोह में हो गये, और उनके एक गिरोह ने पामुरबदख्शां का रास्ता पकड़ लिया और दूसरे गिरोह ने मुग्ध प्रांत में जाकर शक लोगों पर आक्रमण किया। शक लोग अपना देश छोड़कर भागे और हरात होकर पार्थव राज्य चले गये। वहां पर शकों की पुरानी बस्ती थी। वहां पहुंचकर इन शक लोगों को युद्ध करना पड़ा और वे अंत में वहां भी पराजित हुए। वहां से हारकर शक लोग भारत की ओर रवाना हुए और ईसा 120 वर्ष पूर्व इन लोगों ने सिंध में आकर अपना अधिकार कर लिया। यहां पर अपनी सत्ता कायम करके वे भारत के दूसरे प्रांतों की ओर बढ़ने लगे।

 

 

भारत में शकों का विस्तार

 

भारत में शक राज्य का विस्तार कैसे हुआ? शकों का आक्रमण? शकों का शासन काल क्या है? शकों का भारत पर आक्रमण कब हुआ? भारत में शकों का शासन?

सिंध में अपना राज्य कायम करने के बाद शक लोग भारत के दूसरे प्रांतों पर राज्य कायम करने की कोशिश करने लगें। पंजाब और दूसरे प्रांतों में भी कोई भारतीय राजा उस समय ऐसा न था जो शकों के राज्य विस्तार को रोक सके और उनको इस देश में जमने न देता। शकों ने सिंध के बाद सबसे पहले ईसा से 100 वर्ष पहले उज्जैन पर हमला किया और उसे जीतकर उन्होंने उसे अपने राज्य में मिला लिया। इन्हीं दिनो में शकों का आक्रमण काठियावाड़ पर भी हुआ और वहां पर भी उनकी विजय हुई। उज्जैन और काठियावाड़ को जीकर उन लोगों ने भयानक लूटमार की और उसके बाद वे दूसरे राज्यों की तरफ बढ़े।

शक लोगों का नहपान नामक एक सरदार था। जो बड़ा शूरवीर पराक्रमी हुआ। उसके बढ़ते हुए हमलों को देखकर प्रतिष्ठान के राजा विक्रमादित्य ने उसके साथ युद्ध करने का निर्णय किया और अपनी सेना तैयार करके उसने नहपान की शक सेना के साथ युद्ध किया। शक सेना ने भारत में आकर कई स्थानों पर युद्ध किया था, लेकिन विक्रमादित्य के साथ युद्ध में शक सेना के पैर उखड़ गए, और नहपान सरदार की बुरी तरह से पराजय हुई। विक्रमादित्य ने उज्जैन पर अपना अधिकार कर लिया।

 

 

शकों के साथ मालवों का युद्ध

 

 

मालवों पर शकों का आक्रमण? मालवों और शकों का युद्ध?

मध्य एशिया में कनिष्क नामक एक शक राजा बड़ा प्रतापी हुआ। उसका राज्य मध्य एशिया से लेकर काबुल और फारस तक फैला हुआ था। नहपान, राजा कनिष्क का एक बहादुर सरदार था। उसने कश्मीर और पंजाब के कुछ भागों पर भी अधिकार कर लिया था। विक्रमादित्य के साथ पराजित होने के बाद सरदार नहपान ने एक बहुत बड़ी सेना का प्रबंध किया और एक लाख सैनिकों और सवारों की सेना लेकर उसने दक्षिण पंजाब के मालवा राज्य पर पहली शताब्दी के शुरू में आक्रमण किया। मालवा युद्ध में किसी प्रकार निर्बल न थे। लेकिन उनके साथ इतनी बड़ी सेना न थी, जो इस विशाल शक सेना के साथ युद्ध करके उसे पराजित कर सकते। इसके अलावा एक बात और हुई, नहपान की इस विशाल सेना के आक्रमण का उन मालवों को पहले से पता न था। अचानक शकों का आक्रमण होने पर वीर मालवा सैनिकों ने तैयार होकर युद्ध किया। शक सेना के मुकाबले में मालवों की सेना बहुत कम थी और युद्ध की कोई तैयारी न थी। फिर भी वे बड़ी बहादुरी के साथ युद्ध में लड़े और आसानी के साथ शक सेना को विजयी होने का मौका न दिया। लेकिन एक छोटी सी सेना इतनी बड़ी सेना के मुकाबले में कितनी देर ठहर सकती थी। अंत में मालवा सैनिकों की पराजय हुई। उनके बहुत से सैनिक युद्ध में मारे गये और जो बाकी बचे थे वे मुलतान छोड़कर मरूभूमि की तरफ चले गए। पराजित होने के बाद मालव सेना के भाग जाने के बाद नहपान की शक सेना ने मालवों के नगरों को खूब लूटा और उनको विध्वंस किया।

 

 

पंजाब में इन हरे भरे नगरों को तहस नहस करने के बाद नहपान पूर्व की तरफ रवाना हुआ और आगे बढ़कर उसने मथुरा में जाकर अधिकार कर लिया। नहपान मथुरा के बाद कन्नौज राज्य की तरफ जाना चाहता था। लेकिन वहां पर आंध्र की सेना मौजूद थी और वह युद्ध के लिए तैयार थी। इसलिए उसने उस तरफ का रास्ता छोड़ दिया और वह दक्षिण की और घूमकर आनर्त, लाट और कच्छ राज्य को पराजित कर महाराष्ट्र में पहुंच गया। इसके बाद नहपान सम्मपूर्ण मार्ग में लूटमार करता हुआ उत्तर की तरफ चला गया।

 

 

शक सेना की पराजय

 

शकों का भारत पर आक्रमण का विजयी रथ किसने और कहाँ रोका? शको की पराजय कैसे हुई? शकों का आक्रमण का किसने मुंह तोड़ जवाब दिया?

नहपान के आक्रमण के बहुत पहले ही उनके शूरवीर मालव सरदार मुलतान छोड़कर अवंती प्रदेश में आकर रहने लगे थे। मुलतान में मालवों की सेना को पराजित कर नहपान अपनी विशाल सेना के साथ अवन्ती की तरफ बढ़ा। वहां के रहने वाले मालव सरदारों को जब शकों के होने वाले आक्रमण का समाचार मिला तो सभी सरदारों ने नहपान के साथ युद्ध करने का निश्चय किया। बड़ी तेजी के साथ सरदारों ने अपनी अपनी सेनाओं को युद्ध के लिए तैयार किया और अवन्ती की सीमा के बाहर निकल कर अपनी सेना का शिविर तैयार किया। मालवा सेना ने अपने शिविर में विश्राम किया और उसके सभी सैनिक शकों की सेना की प्रतिक्षा करने लगें।

 

इन दिनों में आंध्र के नरेशों का प्रताप बढ़ रहा था और पाटलिपुत्र भी उन्हीं के अधिकार में आ गया था। आंध्र के नरेशों से यह छिपा न था कि भारत में शकों शासन बढ़ता जा रहा है। और शकों की इस बढ़ती हुई शक्ति से भारत के प्रत्येक राजा और नरेश को खतरा है। इसलिए नहपान को पराजित करने और उसकी शक्ति को मिटाने के लिए आंध्र के राजा गौमती पुत्र भी अपनी एक प्रबल सेना लेकर मालव सरदारों की सहायता के लिए अवंती प्रदेश की सीमा के निकट क्षिप्रा नदी के तट पर पहुंच गया। शक सेना का मुकाबला करने के लिए अवन्ती की सीमा के बाहर जो भारतीय सेनाये और सरदार एकत्रित थे वे किसी प्रकार शक सेना से निर्बल न थे।

 

 

नहपान की विजयी सेना अवन्ती देश पर आक्रमण करने के लिए आंधी की तरह चली आ रही थी। अवन्ती के निकट पहुंचने के पहले ही नहपान को मालूम हो गया कि शक सेना के साथ युद्ध करने के लिए मालवा सरदारों की सेनायें अवन्ती देश की सीमा के बाहर पड़ी हुई है। नहपान ने आगे बढ़कर और अवन्ती के निकट पहुंकर अपनी विशाल सेना का मुकाम किया। उसने सेना को विश्राम करने की आज्ञा दी और वह मालव सरदारों के साथ युद्ध करने की योजना तैयार करने लगा। इस तरफ आंध्र के नरेश गौमती पुत्र और अवन्ती के सभी सरदारों को समाचार मिला कि नहपान की शक सेना ने आकर कुछ दूरी पर अपना मुकाम किया है। इसलिए इधर से भी युद्ध की तैयारियां होने लगी।

 

 

दोनों और से युद्ध के बाजे बजे और दोनों सेनाये एक दूसरे की ओर आगे बढ़ी। युद्ध आरंभ हुआ। कई दिनों के लगातार संग्राम से शक सेना को यह मालूम हुआ कि अवन्ती के मालव सरदारों के साथ का युद्ध ऐसा युद्ध नहीं है जिसे आसानी के साथ पराजित किया जा सके। मालव सैनिकों के साथ आंध्र के सैनिकों ने भी युद्ध क्षेत्र में भीषण मार की, जिससे नहपान की सेना पीछे की ओर भागने लगी। नहपान की बड़ी कोशिश के बाद भी उसकी सेना के पैर युद्ध स्थल पर न टिक सके। भारतीय सेनायें लगातार आगे बढ़ी और शक सेना की भगदड़ में नहपान को घेरकर उन्होंने उसे जान से मार डाला। शक सेना जितनी संख्या में अवन्ती का सर्वनाश करने के लिए आयी थी। उनमें से आधे से अधिक सैनिक युद्ध में मारे गये थे। शक सेना के साथ की समस्त सामग्री और रसद भारतीय सैनिकों ने अपने कब्जे में कर लिया। नहपान के मारे जाने से शक जाति का प्रभुत्व भारत से खत्म हो गया। उज्जैन को विक्रमादित्य ने पहले ही अपने अधिकार में ले लिया था। अवन्ती की पराजय के बाद शक लोगों का पूर्ण रूप से विनाश हूआ। आंध्र के नरेश गौथम पुत्र ने शकों के उन सभी स्थानों को लेकर अपना आधिपत्य स्थापित किया, जहाँ पर उनके अधिकार हो चुके थे। इस प्रकार भारत में शकों का आक्रमण से शुरु हुआ शक जाति के शासन का बढ़ता हुआ आधिपत्य समाप्त हुआ।

 

 

 

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