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वृन्दावन धाम – वृन्दावन के दर्शनीय स्थल, मंदिर व रहस्य

वृन्दावन धाम – वृन्दावन के दर्शनीय स्थल, मंदिर व रहस्य

दिल्ली से दक्षिण की ओर मथुरा रोड पर 134 किमी पर छटीकरा नाम का गांव है। छटीकरा मोड़ से बाई तरफ पूरब की दिशा में वृन्दावन रोड़ है। इस रोड़ पर 6 किमी के फासले पर राधाकृष्ण के प्रेम रस में सराबोर वृन्दावन धाम स्थित है। वृन्दावन से मथुरा 10 की दूरी पर है। और गोवर्धन पर्वत जिनकी परिक्रमा की जाती है वह 27 किमी की दूरी पर स्थित है।

 

 

वृन्दावन धाम का स्थापत्य

 

कहते है कि यहां पर वृन्दा देवी ने भगवान विष्णु की तपस्या की थी। उसका पति जलन्धर ना का एक राक्षस था। वृन्दा देवी ने भगवान विष्णु को अपनी तपस्या से प्रसन्न करके यह वरदान मांगा कि उसका पति किसी से न मारा जाए। भगवान विष्णु ने उसे वरदान दिया कि जब तक तुम्हारा पतिव्रता धर्म बना रहेगा, तब तक तुम्हारे पति को कोई नहीं मार सकता। कोई देवता, अस्त्रशस्त्र, दानव, मानव, यहां तक की मैं भी नहीं मार सकता।

 

जब वृन्दा देवी पति जलन्धर राक्षस को इस बात का पता चला, तब उसने खुद को अमर समझ कर देवताओं से युद्ध किया और सब देवताओं को हरा दिया, भगवान विष्णु भी हार गये। तब जलन्धर राक्षस को मारना अनिवार्य समझकर विष्णु भगवान ने छलकपट से जलन्धर का रूप धारण करके वृन्दा देवी का पतिव्रता धर्म भंग किया।

 

और उधर अवसर पाकर भगवान शिव ने जलन्धर राक्षस का वध कर दिया। जब वृन्दा देवी को विष्णु भगवान के छलकपट का पता चला तो उसने विष्णु भगवान को श्राप दे कर उन्हें काले पत्थर का सालिकराम बना दिया। यह देखकर सब देवता घबरा गए, उन्होंने वृन्दा देवी से प्रार्थना की कि विष्णु भगवान को उनका असली रूप प्रदान करे।

 

 

तब तब वृन्दा देवी ने विष्णु भगवान को उनका असली रूप प्रदान कर दिया। विष्णु भगवान ने अपने असली रूप में आकर वृन्दा देवी को वरदान दिया कि तुम्हारा अगला जन्म तुलसी का होगा और सब लोग तुम्हारी पूजा करेंगे (यहां यह बात भी स्पष्ट हो जाती है कि तुलसी की पूजा क्यों की जाती है)  तत्पश्चात वृन्दा देवी ने अपने प्राण त्याग दिये और जिस जगह उसने अपने प्राण त्यागे वहां पर तुलसी का पौधा उग आया, जो कि विष्णु भगवान के वरदान से माँ वृन्दा देवी ने तुलसी के पौधे के रूप में जन्म लिया था। तभी से सब लोग तुलसी की पूजा करते है।

 

 

यहां पर इस बात को भी बल मिलता है कि वृन्दा देवी के नाम पर इस स्थान का नाम वृन्दावन पड़ा होगा।  सम्भवतः यह स्थान जहां वृन्दा देवी ने अपने प्राण त्यागे थे, वर्तमान सेवाकुंज वाले स्थान पर रहा होगा। क्योंकि यहां पर वृन्दा देवी का मंदिर है और तुलसी के पौधे भी बहुत अधिक मात्रा में है।

 

 

इसके अलावा यह भी कहा जाता है कि राधा के सोलह नामों में से उनका एक नाम वृन्दा भी था। राधा (वृन्दा) अपने प्रियतम भगवान श्रीकृष्ण से मिलने की इच्छा से यहां पर विहार करने के लिए आती थी। इसलिए भी इस स्थान का नाम वृन्दावन पड़ा होगा।

 

 

 

 

वृन्दावन धाम का धार्मिक महत्व

 

 

वृन्दावन में भगवान श्रीकृष्ण अपनी मधुर बंसी की धुन सुनाकर गोपियों को मोहित किया करते थे। और अपनी दिव्य तथा अन्तरंग बाल लीलाएं किया करते थे। उन्होंने यही पर गोपियों का चीरहरण किया था, तथा पूर्णमासी की अर्धरात्रि में गोपियों को रास लीला का परम सुख दिया था। उस रास लीला को देखने के लिए शिव महादेव एक गोपी का रूप धारण करके यहां आये थे। और अर्ध नारीश्वर कहलाये थे।

 

क्योंकि किसी भी पुरूष को रास लीला में आने की अनुमति नही थी। चंद्रमा भी रास लीला देखने के लिए रूक गया था। इसलिए वह रात्रि 6 महीने की हो गई थी। चंद्रमा ने मुग्ध होकर रास मंडल पर अमृत की वर्षा की थी।

 

 

वृन्दावन धाम के कण कण में, गली कूचों में, खेत खलिहानों में, बाग़ बगीचों में, यमुना के तट पर कृष्ण के प्रेम की मधुर मुरली की तान व्याप्त है। जो भक्तजनों को आज भी सुनाई देती है। और उन्हें आत्म विभोर कर देती है। जो कोई यहां आकर उस मधुर तान को सुन लेता है। उसका मन यही रम जाता है। और वापिस जाने का नाम नहीं लेता। भारतवासियों की तो बात ही क्या हजारों विदेशी युवक और युवतियां राधाकृष्ण के प्रेम मे रम कर सन्यासी भेष में यही रहने लगे है।

 

 

वृन्दावन की पवन पावन भूमि को पृथ्वी का गुप्त भाग भी कहा जाता है। यहां के कण कण में रंग उल्लास तथा जीवन रस भरा पड़ा है। कहते है कि अब भी चंद्रमा पूर्णमासी की रात्रि को यहाँ अमृत वर्षा करता है।

 

 

 

वृन्दावन के प्रसिद्ध मंदिरों के सुंदर दृश्य
वृन्दावन के प्रसिद्ध मंदिरों के सुंदर दृश्य

 

 

 

 

वृन्दावन के दर्शनीय स्थल, वृन्दावन के प्रमुख मंदिर

 

 

इस्कॉन मंदिर

 

इस मंदिर को श्रीकृष्ण बलराम मंदिर तथा अंग्रेजों का मंदिर भी कहा जाता है। वृन्दावन धाम में रमन रेती छटीकरा रोड़ पर विदेशियों ने यह मंदिर बनवाया है। इसलिए इसे अंग्रेजों का मंदिर भी कहा जाता है। यह मंदिर दस एकड़ भूमि में है, और दस एकड़ भूमि में आश्रम है। मंदिर में प्रवेश करते ही बहुत बड़ा सहन है। तथा एक बहुत बड़ा हॉल जैसा बरामदा है। इसमें बाईं तरफ गौयनिताई की मूर्ति है। बीच में श्रीकृष्ण बलराम जी की बहुत सुन्दर मूर्तियां है। और दाई तरफ राधाकृष्ण की मूर्तियां है। उनके साथ ललिता और विशाखा की मूर्तियां है। पश्चिम की ओर भक्त निदान्ता स्वामी की मूर्ति है।

 

यहां प्रातःकाल राधाकृष्ण की आरती होती हैं। यहां विदेशी भक्तों को भारतीय संस्कृति में देखा जा सकता है। कोई विदेशी हाथ में धूप दीप  लेकर आरती उतारता है। तो कोई घंटी बजाता है, कोई ढ़ोल मंजिरे बजाता है। और कितने ही विदेशी भक्त नाच नाच कय तथा झूम झूम कर आरती गाते है।

 

मंदिर के प्रांगण में एक बहुत बड़ा तमाल का वृक्ष है। तथा दीवारोंं पर बहुत सुंदर तस्वीरे बनाई गई है। मंदिर के पिछे गेस्ट हाउस तथा म्यूजियम है। और किताबों की दुकान है। यह मंदिर तथा गैस्ट हाऊस श्रीकृष्ण संघ द्वारा बनाया गया है। इस संघ ने भारत में तथा विदेशों में बहुत सारे राधाकृष्ण मंदिर बनवाये है।

 

 

 

बांके बिहारी जी मंदिर

 

वृन्दावन में प्राचीन मंदिरों की गणना में प्रमुख मंदिर बांके बिहारी जी तथा राधा माधव जी के मंदिर है। श्री ठाकुर बांके बिहारी जी महाराज मंदिर में राधा कृष्ण की प्राचीन मूर्तियां है। यह मंदिर स्वामी श्री हरिदास जी द्वारा बनवाया गया था। यह उनके वंशजों का निजी मंदिर है। इस मंदिर में प्रातः 9 बजे से रात 12बजे तक राजभोग और रात 9बजे से साढ़े नौ बजे तक झांकियां होती है। श्री बांके बिहारी जी के चरण दर्शन अक्षय तीज को होते है। इस मंदिर की मूर्ति बहुती ही चमत्कारी मानी जाती है।

 

 

श्री जानकी बल्लभ भगवान का मंदिर

 

इस मंदिर का निर्माण वेदान्त देशिक आश्रम के केसीघाट पर हुआ था। और इसकी स्थापना परमहंस स्वामी भगवान दास जी आचार्य द्वारा हुई थी। यह मंदिर रामानुज की बडकल शाखा से संम्बन्धित है। इस मंदिर में श्रीराम, लक्ष्मण तथा सीता माता की मूर्तियां है। मंदिर में संगमरमर लगवाया गया है, और इसका शिखर बहुत विशाल है।

 

 

 

श्री गोविंद जी का मंदिर

 

यह विशाल मंदिर लाल पत्थरों का बना हुआ है। और अति प्राचीन मंदिर है। इसे जयपुर के महाराज मानसिंह ने बनवाया था। औरंगजेब के समय में यहां की मूर्ति जयपुर पहुंचा दी गई थी। वहां पर आज भी गोविंद जी के नाम से प्रमुख मंदिर है। कहते है कि गोविंद जी का मंदिर सात मंजिला था। ऊपर की चार मंजिल बादशाही सेना द्वारा गिरा दी गई थी। वर्तमान मे यह मंदिर 3 मंजिल का है। और सरकार के पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है। इस मंदिर के पिछे गोविंद जी का नया मंदिर बनाया गया है। मंदिर में गोविंद जी की बहुत सुंदर मूर्ति है।

 

 

रंग जी का मंदिर

 

यह मंदिर सन् 1852 में सेठ लक्ष्मी चंद के भाई राधा कृष्ण और गोविंद दास ने बनवाया था। इसके बनने में 7 साल लग गये थे। इस मंदिर के प्रागण में 60 फुट ऊंचा सोने का खम्भा है। मंदिर के सात परकोटे है। तथा शिखर बहुत भव्य है। मंदिर में बहुत सुंदर मूर्तियां है। इस मंदिर में चैत्र में रथ मेला, श्रावण में हिंडोले, रक्षाबंधन पर गज ग्रह, भादो में जन्माष्टमी तथा लटठे का मेला तथा पौष में बैकुंठ मेला लगता है।

 

 

 

वृन्दावन के प्रसिद्ध मंदिरों के सुंदर दृश्य
वृन्दावन के प्रसिद्ध मंदिरों के सुंदर दृश्य

 

 

लाला बाबू का मंदिर

 

यह मंदिर मुर्शिदाबाद के जमींदार श्रीकृष्ण चंद्र ने 1869 में बनवाया था। श्रीकृष्ण चंद्र को ही लाला बाबू कहा जाता हैं। मंदिर में स्थापित देव मूर्ति बहुत सुंदर और दर्शनीय है।

 

 

कांच का मंदिर

रंग जी मंदिर के पूर्वी द्वार पर बना हुआ विजावर महाराज का शीशे का बना मंदिर भी वृंदावन का प्रसिद्ध और सुंदर मंदिर है। जो दूर से भक्तों को आकर्षित करता है।

 

 

गोदा मंदिर

 

यह मंदिर नया बना है। इस मंदिर में विभिन्न देवी देवताओं, ऋषि मुनियों, साधु संतो तथा महापुरुषों की सैकड़ों सुंदर मूर्तियां देखने योग्य हैं।

 

 

राधा गोविंद जी का मंदिर

 

यह मंदिर सन् 1960 में ग्वालियर के महाराज जियाजी राव सिंधिया ने बनवाया था। यह ब्रह्मचारी मंदिर के नाम से भी प्रसिद्ध है। इसमे ब्रह्मचारी जी रहते है।

 

 

राधा रमण जी का मंदिर

 

इस मंदिर में गुसाईयों की पूजा होती है। और बहुत सारे बंगाली शिष्य रहते है।

 

 

गोपेश्वर मंदिर

 

जब श्रीकृष्ण ने रास लीला की थी तो उस समय में महादेव जी गोपी का रूप धारण कर उसका आनंद लेने  आये थे। श्रीकृष्ण ने उनको पहचान कर गोपेश्वर नाम से पुकारा था। और अपने पास बुलाया था। यह मंदिर महादेव के उसी रूप को समर्पित है।

 

 

युगल किशोर जी का मंदिर

 

 

यह मंदिर जहांगीर बादशाह की अमलदारी में ठाकुर नानकरण चौहान ने बनवाया था। इस मंदिर का जगमोहन 32 वर्ग फुट है। यह मंदिर केसीघाट पर बना हुआ है।

 

 

शाह बिहारी लाल मंदिर

 

यह मंदिर लखनऊ के शाह बिहारी लाल के पुत्र शाह कुंदन लाल ने यमुना घाट पर रेतिया बाजार में बनवाया था। इस मंदिर का नाम ललिता कुंज है। इसे शाहजी का मंदिर या टेढ़े खम्भों वाला मंदिर भी कहा जाता है।

 

 

सवा मन सालिगराम जी का मंदिर

 

यह मंदिर बड़ा नहीं है। लेकिन इसमें सवा मन के सालिगराम की मूर्ति देखने योग्य है। यह मंदिर लोई बाजार में है।

 

 

 

मदनमोहन जी का मंदिर

 

यह मंदिर काली देह के निकट द्वादश टीले पर है। इस मंदिर को रूप सनातम गोस्वामी ने बनवाया था। मथुरा के एक चौबे श्री मदन मोहन जी ने उनकको एक मूर्ति सन् 1229 में माघ शुक्ल तृतीया को दी थी। गोस्वामी ने उसी मूर्ति को यहां प्रतिष्ठित किया था और स्वयं एक टटिया  बनाकर रहने लगे थे।

 

 

इन मंदिरों के अलावा भी वृन्दावन में अनेक दर्शनीय मंदिर है। जिनमे पागल बाबा का मंदिर, अकूर मंदिर, श्री अनंत बांके बिहारी मंदिर, गोपीनाथ जी का मंदिर, श्री जी मंदिर, कानपुर वाला मंदिर, मानस मंदिर, मीराबाई का मंदिर, रसिक बिहारी मंदिर, गोरे दाउ जी का मंदिर, अष्ट सखी मंदिर, तथा नंद भवन औद आनंद वृन्दावन देखने योग्य है।

 

 

 

वृन्दावन के प्रसिद्ध घाट

 

महंत घाट, रामगोपाल घाट, काली देह घाट, गौपाल घाट, नाभा घाट, प्रस्कंदन घाट, सूर्य घाट, कडिया घाट, युगल घाट, धूसर घाट, नया घाट, श्री जी घाट, श्रृंगार घाट, गंगा मोहन घाट, चीर घाट, केसीघाट, किशोरी घाट, पांडा घाट, हनुमान घाट, इमलीतला घाट आदि प्रमुख घाट है।

 

 

वृन्दावन के प्रमुख धार्मिक स्थान

 

काली देह, द्वादश आदित्य टीला, श्रृंगार वन, सेवा कुंज, चीर घाट, रास मंडल, वंशीवट, बेगुकूप, दादानल कुंड, ज्ञान गुदडी, राधा बाग, इमलीतला, टटिया स्थान, निधि वन, धीर समीर आदि प्रमुख धार्मिक स्थान है।

 

 

 

वृन्दावन के प्रमुख वन

 

वृन्दावन के सघन वन कुज फूलो से लदी बेलो तथा ऊचे ऊंचे  वृक्ष मनुष्य का मन मोह लेते है। बसंत ऋतु में यहा की सुंदरता देखने योग्य है। तथा सावन भादो की हरियाली आखों को ठंडक और ताजगी देती है।

अटल वन, निहार वन, गौचारण वन, कालिया वन, गोपाल वन, निकुंज वन, निधि वन, विहार वन, झूलन वन, गहर वन, पप्पड़ वन यहां के प्रमुख वन है।

 

 

 

 

 

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