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लोहागर्ल धाम राजस्थान – लोहागर्ल तीर्थ जहाँ भीम की विजयमयी गदा पानी बन गई

लोहागर्ल धाम राजस्थान – लोहागर्ल तीर्थ जहाँ भीम की विजयमयी गदा पानी बन गई

है शौनक जी! श्री लोहागर्ल की गंगा और बदरिकाश्रम की गंगा में मुझे कोई भेद प्रतीत नहीं होता है। यह सर्वथा सत्य वचन है। यह जिस तीर्थराज की स्तुति है वह राजस्थान राज्य का प्रसिद्ध लोकतीर्थ लोहागर्ल है। यह भारत की भूमि के अनेक तीर्थों में अपना प्रमुख स्थान रखता है। इस महत्वपूर्ण धार्मिक तीर्थ स्थान की पवित्र धरती पर अनेक ऋषि महाऋषियों ने समय समय पर कठिन तपश्चर्या कर अपने लोकोत्तर प्रभाव का परिचय दिया है।

लोहागर्ल तीर्थ का इतिहास

लोहागर्ल शब्द की व्योपत्ति करते हुए महार्षि व्यास जी कहते है वस्तृत: यह एक तपो वस्यात् पापानों सत्रिरोधखम् यत्तल् लोहागर्ल नाम तीर्थ गहयतम भुवि! अर्थात लोह अर्गला की भांति जो मानव- मानस में पाप पुंज का प्रवेश न होने दे वहीं लोहागर्ल है।

लोहागर्ल धाम के सुंदर दृश्य
लोहागर्ल धाम के सुंदर दृश्य

इस लोहागर्ल का मुख्य तीर्थ स्थान अर्बुदांचल की उच्च पर्वत श्रेणियों से समावेष्ठित होने के कारण अन्नया ग्रंथों मे जो गुह्यतम तीर्थ विश्लेक्षण पाया जाता हैं। वह सार्थक है। धर्म शास्त्र के प्राचीन ग्रंथ हेमाद्रि मे चतुदर्श गुह्यविलसीते भार से कह कर इसी गणना गुप्त तीर्थों मे कि है। इस तीर्थ का का धार्मिक महत्व जिस प्रकार अधिक है। उसी प्रकार प्राकृतिक सौंदर्य भी कुछ कम नहीं है। यह क्षेत्र हरे भरे धने वनों से सुशोभित है। पर्वतीय उपत्यकाओं की रमणीयता सचमुच चित्ताकर्षक है। ऊंची ऊंची पर्वत श्रेणिया हरीतिमा से आच्छादित होने के कारण सैलानियों और भक्तों को बरबस मुग्ध किये बिना नहीं रहती।


लोहागर्ल तीर्थ का वर्णन जिन जिन धर्म ग्रंथों में मिलता है उनमें स्कंदपुराण तथा बाराहपुराण का नाम विशेषत्या उल्लेखनीय है। स्कंदपुराण के रेवा खंड में महर्षि परशुरामकृत विष्णु यज्ञ प्रकरण में स्पष्टयता लोहागर्ल की ओर संकेत हैं। महाऋषि परशुराम जी ने निखिलक्षाय संहारजन्य पाप का प्राश्चित करने के लिए इसी क्षेत्र में वैष्णव यज्ञ किया था। कहते है कि इस यज्ञ मे आमंत्रित इंद्र आदि देवतागण भी यहां की रमणीयता देख कर यज्ञ समाप्ति के बाद चिरकाल तक यही तप करते रहे।

बराहपुराण मे भी लोहागर्ल तीर्थ का उल्लेख मिलता हैं। सिद्धवट के समीप म्लेच्छों की बस्ती के बीच में लोहागर्ल नाम का मेरा निवास स्थान है। जो अर्बुदांचल के शिखरों से परित समाच्छादित है। इसमें पन्द्रह अवान्तर तीर्थ और है। इसका विस्तार बीस कोस मे है। उत्तर दिशा मे मेरा निवास है। ब्रह्मा, स्कंद, रूद्र, अश्विनीकुमार, इंद्र, मरूदगण, आदित्य, चन्द्रमा, वृहस्पति आदि समस्त देवताओं का यहा निवास है। मैं इस क्षेत्र की सुदर्शन चक्र द्वारा सर्वदा रक्षा करता हूँ। मेरे इस नित्य निवास पर जब जब दानव आक्रमण करते है। तब तब ही वैष्णवी माया के प्रभाव से में उनको शीघ्र परास्त करता हूँ। लोहे की अर्गला की भांति पर्वत श्रेणी इस तीर्थ को रोके हुए है। अतः इसका नाम लोहागर्ल है। एक धारा यहां पर लाल रंग के जल की गिरती है। उसके निकट जो सात दिन निवास कर प्रातः सांय स्नान करता है। वह साधक ब्रह्मलोक को अनायास प्राप्त कर लेता है।

लोहागर्ल धाम के सुंदर दृश्य
लोहागर्ल धाम के सुंदर दृश्य


यह तीर्थ सीकर से उदयपुर नीम का थाना जाने वाली सडक पर रघुनाथगढ़ से 7-8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। नवलगढ़ से उदयपुर जाने वाली बसों के मार्ग में भी आता हैं। भाद्र मास की अमावस्या को इस स्थान पर बडा मेला भी लगता है। इसी समय श्रृद्धालु लोग इस पर्वत की परिक्रमा करते है। लोहागर्ल की परिक्रमा मार्ग 24 कोस है। परिक्रमा मार्ग में कई महत्वपूर्ण स्थल पडते है। जैसे:–


सूर्य कुंड:- सूर्य कुंड लोहागर्ल मंदिर तीर्थ का प्रमुख सरोवर है। इसका उल्लेख पुराणों में ब्रह्मा ह्यद या ब्रह्मसरोवर के रूप मे आया है। युधिष्ठिर आदि पांडव जब अपनी गोत्र हत्या के पाप का प्राश्चित करने के लिए तीर्थाटन कर रहे थे तो ऋषियों ने कहा था कि जिस जल में डुबोने से भीम की गदा गल जाये वहीं स्नान दान करने से तुम्हारी गोत्र हत्या का पाप दूर होगा। यही वह तीर्थ है जहां भीम की विजयमयी गदा गल कर पानी हो गई थी।

बाराह कुंड:– बाराह कुंड इस तीर्थ का दूसरा महत्वपूर्ण स्थान है। जिसका बाराहपुराण में लाल रंग की धारा के रूप में उल्लेख मिलता है।

ज्ञानवापी:– ज्ञानवापी के स्थान पर वह पुरातन वटवृक्ष था जिसका उल्लेख वायुपुराण में है। किसी समय ब्रह्मसर यहां तक था।

चेतनदास की बावड़ी:– चेतनदास की बावड़ी महात्मा चेतन दास की अक्षय कीर्ति का स्मारक है।तथा करोडी कंकोटक तीर्थ है। यहां गर्म जल का झरना है।

अन्य महत्वपूर्ण स्थान:– इन प्रमुख स्थानों के अलावा यहां शाहकुम्भरी प्रसिद्ध सिद्ध पीठ है। तथा इसके पास ही शंकर की आराधना का श्रेष्ठ स्थल रावणेश्वर है। और नागकुंड इस तीर्थ का सर्वोच्च जल प्रपात है जो अत्यंत दर्शनीय स्थान है। यहां सर्पों का बाहुल्य है। सर्पों के विष को झाडने वाले भी इस स्थान के आसपास बहुत है। इसके अलावा परिक्रमा मार्ग मे टपकेश्वर एक परम रमणीय स्थान है। यहां एक पर्वत गुफा की छत से बूंद बूंद पानी शिवलिंग पर गिरता है। और वहीं एक कुंड मे जमा होता है। जिसमे यात्री लोग स्नान करते है। इसके अलावा शोभावती इस परिक्रमा पर्वत की दक्षिणी ढाल में बहने वाली एक पवित्र नदी है। जो ढीढवाणा तक जाती है। रघुनाथ गढ से आगे जहाँ प्रदक्षिणा समाप्त होती है वहां पर खरकुंड तीर्थ है। भगवान आदि वाराह के खुराघात से इसकी उत्पत्ति बताई गई है। इस प्रकार लोहागर्ल राजस्थान का एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थान है जहां हजारों की संख्या में भक्त और सैलानी आते जाते रहते है।

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