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लाल किला ( दिल्ली रेड फोर्ट) – लाल किले का इतिहास- red fort dehli history in hindi

भारत की राजधानी दिल्ली के पुरानी दिल्ली इलाके में स्थित ऐतिहासिक मुगलकालीन किला है ” लाल किला”। लाल पत्थर से निर्मित इस किले को पांचवें मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने सन् 1939 ई° में बनवाया था । इसकी लाल रंग की दीवारों के कारण इसे लाल किला कहा जाता है। लाल किला मुग़ल बादशाह शाहजहाँ की नई राजधानी शाहजहाँनाबाद का महल था  । यह (दिल्ली शहर) की सातवीं मुस्लिम नगरी थी । शाहजहाँ ने अपनी राजधानी आगरा को बदलकर दिल्ली में ट्रांसफर कर दी थी । शासन की प्रतिष्ठा बढ़ाने हेतु साथ ही अपनी नये नये निर्माण कराने की महत्वकांक्षा के चलते इसमें उसकी मुख्य रूचि थी।

 

लाल किला के सुंदर दृश्य
लाल किले के सुंदर दृश्य

 

यह किला भी ताजमहल और आगरा किले की तरह ही यमुना नदी के किनारे स्थित है । इस ऐतिहासिक किले को सन् 2007 में यूनेस्को द्वारा एक विश्व धरोहर के रूप में चयनित किया गया था। इसके दो द्वार है दिल्ली दरवाजा ओर लाहौर दरवाजा । लाहौर दरवाजा इसका मुख्य द्वार है जहाँ से प्रतिवर्ष भारत के प्रधानमंत्री स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त को देश की जनता को संम्बोधित करते है।लाल किला दिल्ली का सबसे व सबसे बड़ा पर्यटन स्थल है। जो लाखों देशी और विदेशी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। किले के अन्दर बने कुछ मुख्य स्थान है जो मुग़ल सम्राज्य की शाही रिहायशी का सबूत पैश करते है।

लाल किला नक्कारखाना

लाहौर गेट से चट्टा चौक तक आने वाली सडक से लगे खुले मैदान के पूर्वी ओर नक्कारखाना है । यह संगीतज्ञों हेतु बने महल का मुख्य द्वार है । जहाँ संगीत कला का आयोजन होता था।

दीवान-ए-आम

इस गेट के पार एक और खुला मैदान है जो कि मूलतः दीवान-ए-आम का प्रागंण हुआ करता था । यहाँ बादशाह के लिए भव्य सिंहासन बना है।यहाँ बादशाह जनसाधारण की शिकायतों का निवारण करते थे। इसकी सुंदर कलाकृति अद्भुत है।

नहर-ए-बहिश्त

राजगद्दी के पीछे की ओर शाही नीजि कक्ष स्थापित है । इस क्षेत्र में पूर्वी छोर पर ऊचे चबूतरे पर बने गुम्बद्दार इमारतों की कतार है । जिनसे यमुना नदी का किनारा दिखाई पड़ता है। यह मण्डप एक छोटी नहर से जुड़े है । जिसे नहर-ए-बहिश्त कहते है। जो सभी कक्षों के मध्य से जाती है । किले के पूर्वोत्तर छोर पर बने शाह बुर्ज पर यमुना से पानी चढाया जाता है जहाँ से इस नहर को जल आपूर्ति होती है।

जनाना

महल के दो दक्षिणवर्ती कक्ष महिलाओं हेतु बने है । जिन्हें जनाना कहते है।

मुमताज महल

मुमताज महल यह कक्ष अब संग्रहालय बना हुआ है जहाँ मुगल काल तथा अंग्रेज़ी शासन तमाम वस्तुओं के दर्शन किये जा सकते है।

रंग महल

रंग महल की छत में संगमरमर तथा सोने की पर्त से सुंदर नक्काशी की गई है । यहाँ संगमरमर से बना सुंदर सरोवर है जिसमें जिसमें नहर-ए-बहिश्त से जल आता है।

खास महल

दक्षिण से तिसरा मण्डप है खास महल। इसमें शाही कक्ष बने है। इनमें राजशी शयन कक्ष, प्राथना कक्ष एक बरामदा और मुसम्गन बुर्ज बने है । इस बुर्ज से बादशाह जनता को दर्शन देते थे।

दीवान-ए-खास

अगला मण्डप है दीवान-ए-खास जो बादशाह का नीजि सभा कक्ष था। यहाँ बैठकर राजा अपने मंत्रिमंडल से विचार विमर्श करते थे । इसकी बनावट में पुष्पीय आकृतियां बनी है जो सोने की परत से मढी है तथा  बहुमूल्य रत्न जड़ें थे जिन्हें अब निकालकर आर्टिफिशियल लगा दिये गए है।

जामा मस्जिद दिल्ली का इतिहास

हमाम

अगला कक्ष हमाम के नाम से जाना जाता है जोकि राजसी स्नानागार था । यह कक्ष तूर्की शैली में बना है । इसमें संगमरमर मे मुग़ल अलंकरण एवं रंगीन पाषाण भी जड़ें है।

मोती मस्जिद

हमाम के पश्चिम में मोती मस्जिद बनी है । यह सन 1659 में औरंगजेब ने बनवाई थी । यह औरंगजेब की नीजि मस्जिद थी । यह एक छोटी सी तीन गुम्बद वाली मस्जिद है जिसे संगमरमर से तराशा गया है । इसका मुख्य फलक तीन महराबों से युक्त है । जोकि आंगन में उतरता है जहाँ फूलों का बागीचा है।

हयात बख्श बाग़

मस्जिद के उत्तर में औपचारिक उध्धान है जिसे हयात बख्श बाग़ कहते है। इसका अर्थ है जीवनदायी उध्धान। यह दो शासन काल में बनाया गया है एवं एक तीसरा बाद में अंतिम मुग़ल सम्राट बहादुरशाह जफ़र द्वारा 1842 में बनवाया था।

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