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रणकपुर जैन मंदिर समूह – रणकपुर जैन तीर्थ का इतिहास

रणकपुर जैन मंदिर समूह – रणकपुर जैन तीर्थ का इतिहास

सभी लोक तीर्थों की अपनी धर्मगाथा होती है। लेकिन साहिस्यिक कर्मगाथा के रूप में रणकपुर सबसे अलग और अद्वितीय है। रणकपुर गांव राजस्थान के पाली जिले में अरावली पर्वत श्रृखलाओं के मध्य दिल्ली अहमदाबाद रेललाइन पर फालना स्टेशन से लगभग 22 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। वीर विनोद के अनुसार विक्रम संवत् 1490 में मेवाड़ के महाराणा कुम्भा का इस क्षेत्र पर अधिकार था। लेकिन आगे चलकर रणकपुर गांव मारवाड़ राज्य के अधीन रहा। राणापुर, राणाकपुर और रणकपुर के नाम से परिचित यह मंदिरमय गांव महाराणा कुम्भा की कला रूची का श्रेष्ठतम उदाहरण है। चित्तौड़ का किर्ति स्तंभ, कुम्भलमेर का किला, कुंभश्याम जी का मंदिर, अचलगढ़, बसंतगढ़ का किला, एकलिंगजी का जीर्णोद्धार, महाराणा कुम्भा की जीवन यात्रा के ऐसे बोलते पडाव है। जहाँ मूर्तियों के माध्यम से संस्कृति को जीवित रखा गया। संगीत कला और साहित्य के पारखी, विद्वान महाराणा कुम्भा द्वारा प्रेरित एवं निर्मित सभी मंदिर प्रस्तर के है। रणकपुर के जैन मंदिर भी उसी कला प्रेम का एक हिस्सा है।

नागर शैली से अलंकृत ऊंची पीठ पर अवस्थित तथा सोनाणा और सेवाडी के पत्थर से प्रयोगित इन मंदिरों में गर्भग्रह, सभामंडप, अर्धमंडप, प्रदक्षिणा पथ एवं आमलक शिखर की प्रधानता है। जैन मंदिरों के निर्माण की दृष्टि से भी यह समय बहुत ही महत्वपूर्ण रहा है। संवत् 1496 की बात है। जब पोखाल जातीय संघपति धरणाशाह ने 99 लाख रूपये की लागत से एक तिमंजिले चतुर्मुख जिन प्रासाद का निर्माण करवाया था। धरणाशाह भूतपूर्व सिरोही राज्य में नंदीपुर गांव के थे। वे समसामयिक राजनीतिक परिस्थितिवश बाद में मेरयाठ प्रदेश के अंतर्गत मालगढ़ नामक गाँव मे रहने लगे थे। जब महाराणा कुम्भा ने यह सुना कि धरणाशाह सपरिवार मालगढ़ में आ बसे है तो उन्होंने विश्वासपात्र सामंतों के माध्यम से धरणाशाह को राज्यसभा में बुलाकर अच्छा मान सम्मान दिया।

रणकपुर जैन तीर्थ स्थल का इतिहास

रणकपुर जैन मंदिर के सुंदर दृश्य
रणकपुर जैन मंदिर के सुंदर दृश्य




कहते है कि जिनेश्वर उपासक धरणाशाह ने एक रात स्वप्न में नालिनी गुल्म विमान देखा और तभी उसने इस आकृति का जिनप्रासाद बनवाने की प्रतिज्ञा ली। दूर दूर से चतुर शिल्पियों को बुलाया गया। प्रारंभिक रेखा चित्र तैयार किए गए। इनमें से मुंडारा गांव के देपाक नामक शिल्पकार ने त्रैलोक्य दीपक नामी इस मंदिर का सही स्वप्न चित्र तैयार किया। अतः उसे ही धरणाशाह ने प्रमुख कार्यकारी बनाया। धरणाशाह ने धूमधाम से धरणा विहार नामक चतुर्मुख आदिनाथ जिनालय की संवत् 1495 में नीवं डाली जो संवत् 1498 में पुरा हुआ।

सेवाडी प्रस्तरों से बने इस मंदिर का चतुष्कोण 48 हजार वर्ग फीट का है। जिस पर 24 रंगमंडप, 184 भूगृह, 84 शिखर और 1444 सुंदर स्तंभ है। चार दिशाओं में प्रवेश के चार विशाल द्वार है। जिनसे करीब 25 सीढियां चढकर मंदिर की प्रथम भूमिका आती है। आदिनाथ त्रैलोक्य दीपक मंदिर के सभी चार द्वारों के संग में एक बड़ा मंदिर है। इस प्रकार यहां के मंदिर समुदाय में 84 देवकुलिकाए है जिनकी निर्माण साधना देखने के लिए दूर दूर से असंख्य भक्त और पर्यटक आते है।




सोम सोभाग्य काव्य से पता चलता है कि रणकपुर के जैन मंदिर प्रतिष्ठान में धरणाशाह की कुमकुम पत्रियां पाकर कोई 52 संघ और 500 साधु आये थे। मंदिर के मध्य भाग में चतुर्मुख देव कुलिका है। जिसकी जंघा पर बनी मूर्तियां बडी मनोरम है। स्त्री मूर्तियां प्रायः नृत्यमय एव कानों में कुंडल व हाथों में कंगन पहिने है। हाथ वाली भैरव की मूर्ति के साथ साथ यहां नयनदेवी प्रतिमाएं और श्रृंगाररत नर्तकियों के रूप भी देखे जा सकते है। देवकुलिका के चारो तरफ रंग मंडपों में बांसुरी बजाती, घूंघरू बजाती, नृत्य करती आठ पुतलियां और 16 नर्तकियां है। स्तंभों पर हाथी, सिंह, घोडे और फूल बूटे अंकित है। तथा इस त्रैलोक्य दीपक मंदिर के पूर्विकोण में धर्मोनुरागी धरणाशाह की हाथ में माला सिर पर पग और गले में उत्तरीय पहिने मूर्ति है।

रणकपुर जैन मंदिर के सुंदर दृश्य
रणकपुर जैन मंदिर के सुंदर दृश्य




साथ ही रणकपुर के इस विशाल मंदिर समूह में देव प्रतिमाओं के अतिरिक्त अनेक महत्वपूर्ण शिलालेख है। जिनसे तत्कालीन इतिहास को जानने में मदद मिलती है। इतिहासकार फगुसैन के अनुसार उत्तरी भारत में कोई अन्य मंदिर ऐसा नहीं देखा गया है। जो इतना सुंदर और सुसज्जित हो। कर्नल जेम्स टॉड ने अपने पश्चिमी भारत के यात्रा वर्णन मैं स्पष्ट रूप से रणकपुर के कला वैभव को देखने की तीव्र लालसा व्यक्त की है। ऐसा सर्वमान्य रणकपुर तीर्थ राजस्थान में गोडावण क्षेत्र के पंच तीर्थों ( दणोराव, नाडलाई, नकाबोल, बरकांठा और रणकपुर) में से एक है। 17वी शताब्दी के हीर विजय सूरी नामक कृति में तो यहां तक कहा गया है।

गढ़ आबू नवि फरासियो, नु सुणियो हीर नो रास !
रणकपुर नर नवि गयो, तिष्ये गभार्वासा !!

अर्थात :– जिसने रणकपुर की यात्रा नहीं की उसका जन्म लेना ही व्यर्थ है। इसी तरह समय सुंदर जी के यात्रा स्तवन के अंतर्गत वर्णन मिलता है कि रणकपुर आदिनाथ प्रभु का पावन धाम है।


भगवान आदिनाथ का यह चौमुखा त्रैलोक्य दीपक मंदिर पहले सात मंजिल में बनने वाला था। पर किन्हीं कारणवश न बन सका। यहां यह भी उललेखनीय होगा कि मंदिर में विभिन्न जैन तीर्थ, तीर्थंकर और कला साहित्य के चित्रांकन के साथ साथ मिथुन, थुम्म मूर्तियों का अलंकरण भी है। जो मानव प्रकृति के रागात्मक स्वरूप की अनुभूति सूचक संज्ञा की पोषक गीतिका है।

रणकपुर जैन मंदिर के सुंदर दृश्य
रणकपुर जैन मंदिर के सुंदर दृश्य



अन्य बातो के साथ ही इस भव्य मंदिर के निर्माता धरणाशाह के संबंध मे एक रोचक दंतकथा सुनने में आती है। कहा जाता हैं कि एक दिन धरणाशाह ने घी में पडी मक्खी को निकालकर जूती पर रख ली। यह कृत्य किसी शिल्पकार ने देख लिया। शिल्पियों ने सोचा कि ऐसा कंजूस भला कैसे इतना बडा जिनालय बनवा रहा है। परीक्षा लेने हेतु शिल्पियों ने नीवं खोदते समय धरणाशाह से कहा कि नीवं पाटने में सर्वधातुओं का प्रयोग होगा नहीं तो इतना विशाल मंदिर केवल प्रस्तर की दीवारों पर नहीं ठहर पायेगा। धरणाशाह ने देखते देखते अतुल मात्रा मे सर्वधातु एकत्रित करवा दी, इस पर शिल्पियों ने सोचा कि मक्खी वाली घटना केवल कृपणाता की परिचायक न थी अपितु सार्थक बुद्धिमत्ता की घोतक थी।


रणकपुर का यह मंदिर चतुर्मुख प्रासाद भी कहलाता है, क्योंकि इसके चार कोणों में चार शिखरबद्ध देवकुलिकाए है। चतुष्क ठीक बीचोबीच में बना है। चार कोणों में चार महा मंडप है। चार रंग मंडप है और प्रत्येक वेदिका पर चार दिशाई शवेत प्रस्तर प्रतिमाएं है। या यो कहें कि इस मंदिर की हर प्रतिमा और खण्ड चतुर्मुखी है।



रणकपुर के इस मुख्य मंदिर से कुछ दूर पर प्रसिद्ध सूर्य मंदिर है। जिसमें सर्वत्र सूर्य को घोडों पर सवार बतलाते है। यह महाराणा कुम्भा द्वारा निर्मित माना जाता है। परंतु इतिहास इस संबंध में मौन है। इसमें सूर्यदेव के अतिरिक्त ब्रह्मा, विष्णु, महेश और गणेश जी की मूर्तियों के साथ साथ युद्धरत हाथी समूह भी दर्शाए गए है। इस प्रकार रणकपुर का यह अलौकिक मंदिर समूह महाराणा कुम्भा जैसे कला प्रेमी और धरणाशाह जैसे धर्मोनुरागियों की यश गंगा का पुण्य तीर्थ है जिस पर भारत के धर्म जगत को ही नहीं कला संगीत एवं साहित्य के पथ बंधुओं को भी गर्व है। मूलतः यही आकर राजस्थान की तत्कालीन सामंत शाही के उज्जवल पक्ष पर प्रशंसा हेतु हम सबको एक मत होना पडता है। आज भी इस कला एव धर्मतीर्थ पर असंख्य नर नारी भगवान आदिनाथ की अर्चना कर अपने को धन्य समझते है।

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