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यमुनोत्री धाम यात्रा – यमुनोत्री की कहानी – यमुनोत्री यात्रा के 10 महत्वपूर्ण टिप्स

भारत के राज्य उत्तराखंड को देव भूमी के नाम से भी जाना जाता है क्योकि इस पावन धरती पर देवताओ का वास रहा है यहा की पवित्र धरती के कण कण में देवता निवास करते है। यह राज्य पवित्र चार धाम यात्रा  का भी स्थल है। जिनका हिन्दु धर्म में बहुत बडा महत्व है। चार धाम यातत्रा के अंतर्गत आने वाले धाम गंगोत्री,यमुनोत्री, केदारनाथ, बदरीनाथ, है। अपनी इस पोस्ट के अंतर्गत हम चार धाम यात्रा के एक पवित्र धाम यमुनोत्री धाम यात्रा की संम्पूर्ण जानकारी हिन्दी में साझा करेगें। इस पोस्ट के अंतर्गत हम जानेगें:-

  • यमुनोत्री धाम यात्रा का महत्व क्या है
  • यमुनोत्री धाम कि धार्मिक पृष्ठभूमी
  • यमुनोत्री की कहानी
  • यमुनोत्री धाम कैसे पहुंचे
  • यमुनोत्री धाम यात्रा में कया क्या सावधानिया बरते
  • यमुनोत्री धाम यात्रा में धाम के दर्शन कैसे करे
  • यमुनोत्री धाम के कपाट कब खुलते है।
  • यमुनोत्री धाम के कपाट कब बंद होते है।
  • यमुनोत्री धाम कपाट बंद होने के बाद मांं यमुनोत्री पुजा कहा होती है।
  • यमुनोत्री के पैदल मार्ग की दूरी किलोमीटर में

 

यमुनोत्री धाम यात्रा
यमुनोत्री धाम के सुंदर दृश्य
यमुनोत्री धाम यात्रा का महत्व

हिन्दु धर्म में कई नदियो जैसे गंगा, यमुना, सरस्वती आदि कई नदियो को पवित्र व देवी माना जाता है।और इनकी पूजा अर्चना की जाती है। यमुनोत्री धाम यमुना का उदगम स्थल है। यहा पर एक मंदिर में यम जिनके बारे में कहा जाता है कि यह देवी यमुना के भाई थे कि मूर्ति के साथ यमुना देवी की मूर्ति स्थापित है। यमुना सूर्य भगवान की पुत्री है। ये भी गंगा की ही तरह हिमालय से जन्मी है। इसलिए इन्हें भी गंगा की तरह ही बहुत पवित्र माना जाता है। यमुना के स्मरण मात्र से ही पापो का नाश होकर मन पवित्र हो जाता है। यमुनोत्री का स्थान समुंद्र तल से लगभग दस हजार फुट की उचांई पर स्थित है। यहा स्थित यमुनोत्री मंदिर का निर्माण टिहरी के महाराजा प्रतापशाह ने करवाया था। सूर्य पुत्री यमराज – सहोदरा व कृष्णप्रिया कालिंदी का यह उदगम स्थान अत्यंत भव्य तथा आकर्षक है। इस स्थान की शोभा और उर्जस्विता अद्भुत है। यहा मंदिर में यमुना की प्रतिमा है। यहु पर पंडे धधधार्मिक कृत्य वव तर्पण आदि करते है।

यमनोत्री में गर्म जल के कुंड

यहा यमुनोत्री देवी मंदिर के अलावा कई गर्म पानी के कुंड है। जिनका जल खोलता रहता है। यत्री कपडे में चावल बाधंकर इनमें डुबो देते है और वे पक जाते है। इस प्रकार यहा भोजन बनाने के लिए चूल्हा नही जलाना पडता।

इन कुंडो में स्नान करना संभव नही है और यमुना का जल इतना ठंडा है कि उसमे भी स्नान करना मुश्किल होता है। इस लिए यहा गर्म व ठंडे जल को मिलाकर स्नान करने के लिए कई कुंड बने है। बहुत ऊंचाई पर कलिन्दगिरी से हिम पिघलकर कई धाराओ में गिरता है। कलिन्द पर्वत से निकलने के कारण यमुना जी को कालिंदी भी कहा जाता है। यहा ठंड इतना रहता है कि बार बार झरनो का पानी जमता पिघलता है। ऐसे शीत स्थान में गर्म पानी का झरना और कुंड का पानी वो भी उबलता हुआ जिसमें अगर हाथ डाला जाए तो फफोले पड जाएं एक चमत्कार है। यहा के प्रमुख कुंडो में सूर्य कुंड, गौरी कुंड, तथा सप्तश्रषि कुंड प्रमुख है।

यमनोत्री की कहानी – यमनोत्री धाम की कथा

कहा जाता है कि महर्षि असित का आश्रम यही था। वे नित्य स्नान करने गंगाजी जाते थे और यही निवास करते थे। वृद्धावस्था में उनके लिए दुर्गम पर्वतीय मार्ग नित्य पार करना कठिन हो गया। तब गंगाजी ने अपना एक छोटा सा झरना ऋषि के आश्रम के पास प्रकट कर दिया। वह उज्जवल जटा का झरना आज भी वहा है। हिमिलय में गंगा और यमुना की धाराएं एक हो गई होती  यदि मध्य में दंड पर्वत न आ जाता। देहरादून के समीप ही दोनो धाराएं बहुत पास आ जाती है।

एक अन्य कथा के अनुसार सूर्य की पत्नी छाया से यमुना व यमराज पैदा हुए थे। यमुना नदी के रूप में पृथ्वी पर बहने लगी तथा यम को मृत्यु लोक मिला। कहा जाता है कि यमुना ने अपने भाई यमराज से भाईदूज के अवसर पर वरदान मांगा कि इस दिन जो यमुना में स्नान करे उसे यमलोक न जाना पडे। इसलिए माना जाता है कि जो कोई भी मां यमुना के पवित्र जल में स्नान करता है। वह आकाल मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है। और मोक्षं को प्राप्त करता है। इसी किंदवति के चलते यहा हजारो की संख्या में श्रृद्धालु यहा आते है।

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यमनोत्री के कपाट खुलने का समय

यमनोत्री मंदिर के कपाट अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर खोले जाते है। तथा कार्तिक के महिने में यम द्वितीय के दिन बंद कर दिए जाते है। क्यो शीतकालीन ऋतु के समय यहा अधिक बर्फबारी होती है जिसके कारण मार्ग अवरूद्ध हो जाता है तथा अधिक सर्दी के कारण यहा रहना भी कठिन होता है। शीतकाल के छ: महिनो के लिए खरसाली गांव के पंडित मां यमनोत्री की पूजा अपने गांव में ही करते है। फिर अक्षय तृतीय को भव्य चांदी की डोली सजाकर तथा हजारो श्रृद्धालु शामिल होकर विधिविधान के साथ यमुनोत्र धाम के कपाट खोलते है।

 

यमुनोत्री धाम यात्रा
यमुनोत्री धाम के सुंदर दृश्य

यमुनोत्री धाम यात्रा का मार्ग परिचय

यमुनोत्री यात्रा का प्रवेशद्वार ऋषिकेश है। यहा से यमुनोत्री मोटर मार्ग की दूरी 227 किलोमीटर है। ऋषिकेश से नरेन्द्रनगर, आगराखाल, चंबा, उत्तरकाशी, धरासु होते हुए फुलचट्टी तक कार द्वारा पहुचां जा सकता है। इससे आगे के यमुनोत्री धाम तक 8 किलोमीटर का पगडंडी रास्ता पैदल तय करना पडता है। वेसै यात्रियो की सुविधा के लिए यहा पालकी और खच्चरो की सुविधा है। जिसमे यात्री।कुछ शुल्क देकर सुविधा का लाभ उठा सकते है

यमुनोत्री धाम यात्रा की विशेष बाते और टिप्स
  • यदि यमुनोत्री, गंगोत्री, बदरीनाथ और केदारनाथ की पूरी यात्रा करनी हो तो यमुनोत्री से यात्रा प्रारंभ करे।
  • यदि इनमे से किसी एक दो स्थान पर जाना हो तो यात्रा ऋषिकेश से आरंभ करे
  • उत्तराखंड की पूरी यात्रा के दौरान रबड के जूते या स्पोर्टस शूज का इस्तेमाल करे जो फिसलने वाले न हो
  • पैदल यात्रा के दौरान हाथ में छडी या डंडा अवश्यक रखे
  • यात्रा के दौरान अपने साथ रेन कोट अवश्य रखे। छाते से पैदल मार्ग पर यात्रा के दौरान असुविधा हो सकती है।
  • किसी अनजान फल, शाक या पत्ती को न छुएं । वे विषैले भी हो सकते है
  • यात्रा के दौरान हल्का समान रखे। तथा पीठ पिछे टांगने वाले पिठठू बैग का ही इस्तेमाल करे
  • सांस व अस्थमा के मरीज पैदल चढाई न करे। अपने साथ उचीत दवाईया, फर्स्ट एड बॉक्स, पानी की बोतल अपने साथ अवश्य रखे
  • प्यास लगने पर झरने का पानी सीधे न पीएं। इससे हिल डायरिया होने का भय ररहता है।
  • मिश्री, किशमिश, इमली व सूखे आलुबुखारे अपने साथ रखे। जी घबराने पर इनका प्रयोग किया जा सकता है।
  • मार्ग में कहीं कही जहरीली मक्खी होती है। इनके काटने से फफोले हो जाते है। अत: सावधान रहे। समय पर डेटॉल व टिंक्चर का प्रयोग करें
  • यहा सर्दी बहुत होती है इसलिए ऊनी व गर्म वस्त्र का प्रयोग करें

 

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