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मल्लिकार्जुन मंदिर की कहानी – मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का इतिहास हिन्दी में

प्रिय पाठको पिछली ज्योतिर्लिंग दर्शन श्रृंख्ला में हमने महाराष्ट् के भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की यात्रा की और उसके इतिहास व स्थापत्य और उसकी कहानी के बारे में विस्तार से जाना है। इस पोस्ट मे हम बारहा ज्योतिर्लिंगों में से एक ओर महत्वपूर्ण व प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की यात्रा करेगें और उसके बारे जानेगें कि – मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की कहानी, मल्लिकार्जुन मंदिर का इतिहास, मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की कहानी, मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का महत्व, इसके अलावा मल्लिकार्जुन मंदिर की कहानी, मल्लिकार्जुन टेम्पल का स्थापना कब हुई, मल्लिकार्जुन मंदिर का निर्माण किसने करवाया, दक्षिण का कैलाश किसे कहा जाता है। गणेश जी के विवाह की रोचक कथा, गणेश जी का विवाह किससे हुआ, गणेश जी का विवाह कैसे हुआ आदि सभी सवालो के जवाब हम इस पोस्ट मे जानेगें।

मल्लिकार्जुन

ज्योतिर्लिंग तीर्थ का

महत्व

भारत के राज्य आंध्र प्रदेश में शैल पर्वत श्रृंखला है। इस शैल पर्वत को दक्षिण का कैलाश भी कहा जाता है। शैल पर्वत से निकलने वाली कृष्णा नदी के तट पर मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग को द्धितीय ज्योतिर्लिंग के रूप मे माना जाता है। जो भगवान शिव के अवतार है। जिसका वर्णन स्कंदपुराण,महाभारत ,शिव पुराण तथा पद्मपुराण आदि ग्रंथो मे मिलता जिसके दर्शन मात्र से ही भक्तो का  अभिष्ट फल मिलता है। महाभारत में तो यहां तक लिखा है कि जो प्राणी श्री शैल पर्वत पर जाकर भगवान शिव का पूजन करता है। तो उसे अश्वमेध यज्ञ के बराबर फल मिलता है। इतना ही नही ग्रंथों में बतलाई गई महिमा के अनुसार शैल शिखर के दर्शन मात्र से ही इंसान सब कष्टो से मुक्ति पा लेता है तथा अनंत सुख की प्राप्ति होती है। यहां 51 शक्तिपीठो मे से एक शक्ति पीठ भी है

मल्लिकार्जुन मंदिर के सुंदर दृश्य
मल्लिकार्जुन मंदिर के सुंदर दृश्य

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की कहानी

मल्लिकार्जुन मंदिर ज्योतिर्लिंग का इतिहास

धार्मिक पृष्टभूमि की कथा के अनुसार एक बार शंकर सुवन  श्री गणेश जी और स्वामी कार्तिकेय जी जब विवाह के लिए आपस मे लडने लगे। दोनो ही यह चाहते थे कि उनका विवाह पहले हो। अंत मे शंकर जी ने दोनो के झगडे को शांत करने के लिए यह शर्त रखी कि दोनो मे से जो पहले पृथवी की परिक्रमा कर डालेगा उसी का विवाह पहले होगा । यह सुनते ही स्वामी कार्तिकेय तो परिक्रमा के लिए दौड पडे परन्तु गणेश जी भारी शरीर होने के कारण नही दौड सकते थे परंतु वे शरीर से ही भारी थे किन्तु बुद्धि से तेज थे। उन्होने तुरंत एक उपाय निकाला। उन्होने माता पार्वती व पिता भगवान शंकर को आसन पर बैठाकर उन्ही की सात बार परिक्रमा कर डाली और माता पिता का पूजन किया। इस प्रकार वे पृथ्वी की परिक्रमा का फल पाने के अधिकारी हो गए। जब काफी समय पश्चात स्वामी कार्तिकेय पृथ्वी की परिक्रमा करके लौटे । तबतक गणेश जी का विवाह सिद्धि और बुद्धि नामक कन्याओ से हो चुका था। तथा उनकी दोनो पत्नियो की गोद मे क्षेम व लाभ नामक पुत्र भी खेलने लगे थे। इससे स्वामी कार्तिकेय अपने माता पिता शिव पार्वती से रूठ गए और कौंच पर्वत पर चले गये। शिव पार्वती उन्हे मनाने वहां पहुँचे किन्तु उनके आने का समाचार पाकर वह वहा से भी चले गये मानी जाता है कि कौंच पर्वत पर शंक़र जी ज्योतिर्लिंग के रूप मे प्रकट हुए थे तभी से यह ज्योतिर्लिंग मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के रूप मे विख्यात हुआ। अब आप सोच रहे होगें कि इसका नाम मल्लिकार्जुन क्यो पडा हम आपको बता दे कि यहां पार्वती जी का नाम मल्लिका देवी है और शिव जी का नाम अर्जुन है। इसलिए इस स्थान का नाम मल्लिकार्जुन पडा।

मल्लिकार्जुन मंदिर का स्थापत्य – मल्लिकार्जुन टेम्पल की निर्माण शैली

दक्षिणी मंदिरो की तरह यह एक पुराना मंदिर है। एक ऊंची पत्थर से निर्मित चारदीवारी के मध्य मे स्थित है। जिस पर हाथी घोडो की की कलाकृति बनी हई है। इस परकोटे मे चारों ओर द्धार है। जिनपर गोपुर बने है। प्राकार के भीतर एक और प्राकार है। दूसरे प्राकार के भीतर मल्लिकार्जुन का निज मंदिर है यह मंदिर बहुत बडा नही है। मंदिर के गर्भगृह में लगभग आठ उंगल ऊंचा शिवलिंग स्थापित है। मंदिर के पूर्विद्धार के सामने सभा मंडप है। जहा शिवरात्रि पर शिव पार्वती विवाह उत्सव होता है। मंदिर के पिछे कि ओर पार्वती देवी का मंदिर स्थित है। मंदिर के पूर्विद्धार से कृष्णा नदी तक एक मार्ग गया है जिसे पीताल गंगा कहते है। पाताल गंगा की मंदिर से दूरी लगभग तीन किलोमीटर है। जो कि आधा मार्ग समान्य है और आधा मार्ग बहुत कठीन माना जाता है आधे मार्ग मे नीचे उतने क़े लिए लगभग 842 सीढीयां बनी है। जो इस मार्ग को कठीन बनाती है। इसके अलावा यहा पास ही में त्रिवेणी घाट भी है।  यहां दो नाले कृष्णा नदी मे आकर मिलते है। इस स्थल को त्रिवेणी घाट कहते है।

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कहां ठहरे:-

मंदिर के समीप यात्रियों के ठहरने के लिए धर्मशाला टूरिस्ट हाउस व छोटे छोटे मकान जिनमे ठहरने की सुविधा है। मेले के समय भीड होने के कारण यहा ठहरने में कष्ट होता है। उस समय यहां स्थित छोटें छोटे मंदिरो मे भी ठहरने की व्यवस्था हो जाती है।

मल्लिकार्जुन मंदिर ज्योतिर्लिंग कैसे पहुँचे

काचीगुडा लाइन पर  कर्नूल टाउन स्टेशन से शैल की दूरी 77 मील है तथा दूसरी हुबली लाइंन पर नजदीकी रेलवे स्टेशन नंदयाल है। जहा से शैल की दूरी 71 मील है । समान्य समय में बसे आत्माकूर तक ही जाती है। गंटूर से शैल की दूरी 217 मील है गंुटूर और तिरूपति से यहा के लिए सिधी बस सेवा है।

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