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बेगम हजरत महल का जीवन परिचय

बेगम हजरत महल का जीवन परिचय

बेगम हजरत महल लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह की शरीक-ए-हयात (पत्नी) थी। उनके शौहर वाजिद अली शाह विलासिता और ऐयाशी की जीती जागती मूर्ती थे। हजरत महल की अपनी एक अलग दुनिया थी। और वह उसी दुनिया में खोई रहती थी।

बेगम हजरत महल कौन थी? उनका जन्म कब और कहा हुआ था? इस संबंध में किसी प्रकार का कोई पुख्ता प्रमाण प्राप्त नही है। उनके जीवन के संबंध में केवल इतना ही पता चलता है कि उनकी कब्र नेपाल की राजधानी काठमांडू में सडक के किनारे बनी हुई है। इससे ज्ञात होता है की बेगम हजरत महल जीवन के अंतिम दिनो में काठमांडू चली गई थी। और वही उनका निधन हुआ था।

 

नबेगम हजरत महल का अंग्रेजो के खिलाफ युद्ध का काल्पिनिक चित्र
बेगम हजरत महल का अंग्रेजो के खिलाफ युद्ध का काल्पिनिक चित्र

 

हजरत महल एक वीरह्रदय स्त्री थी। वे महलो में अवश्य रहती थी, उनका जीवन दास दासियो के बीच अवश्य व्यतीत होता था, पर जब समय आया तो वे बाहर निकलने से नही झिझकी। उन्होने बाहर निकलकर हाथो में तलवार ग्रहण की और घोडे तथा हाथी पर सवार होकर अंग्रेजो के साथ युद्ध भी किया। उन्होने युद्ध में जो ववीरता दिखाई थी, उसकी प्रशंसा अंग्रेज इतिहासकारो ने भी की है।

एक अंग्रेज इतिहासकार ने लिखा है कि हजरत महल वाजिद अली शाहकी बेगम बनने से पहले एक नर्तकी थी। उनका विवाह वाजिद अली शाह से किस प्यकार हुआ? इस संबंध में कुछ पता नही चलता, परंतु इतना अवश्य है कि वे एक सहासी स्त्री थी। उन्होने हाथी पर सवार होकर लखनऊ रेजीडेंसी पर आक्रमण करके अंग्रेज सेनापतियो की नाक में दम कर दिया था।

बेगम हजरत महल के पति वाजिद अली शाह एक विलासी नवाब थे। पहले वे मुगल बादशाह के अधीन थे। परंतु जब मुगलो का शासन कमजोर हुआ तो उन्होने इसका लाभ उठाकर अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया था। और लखनऊ उनकी राजधानी थी।

 

वाजिद अली शाह सदा रास रंग में डूबे रहते थे। वे अपने मंत्रियो से दो दो तीन तीन सप्ताह के बाद मिलते थे। और वो भी थोडी देर के लिए। नही तो उनके दिन रात का अधिकांश समय नाचने गाने वालो के बीच गुजरता था। वे ताश, संतरंजौर गंजीफा भी खूब खेलते थे। इनके खिलाडी उन्हे हमेशा घेरे रहते थे। राज्य में कहा क्या हो रहा है इसका उन्हें बिल्कुल पता नही रहता था।

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उन दिनो ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से गवर्नर जनरल के पद पर लॉर्ड डलहौजी नियुक्त था। वह बडा ही क्रूर और निर्मम अंग्रेज था। वह एक एक करके सभी देसी रियासतो पर अपना अधिकार स्थापित करता जा रहा था। सभी राजाओ को अपना गुलाम बनाता जा रहा था। अवध की नवाबी पर भी उसकी बुरी दृष्टि पड गई। उसने नवाब वाजिद अली शाह को निक्मा करार देकर गिरफतार कर लियाऔर कलकत्ता लेजाकर नजरबंद कर दिया। डलहौजी ने वाजिद अली शाह के 11 वर्षीय पुत्र को गद्दी पर बैठाया। पर वह तो एक नादान बालक था। डलहौजी उसे गद्दी पर बिठाकर अवध की नवाबी पर अपना अधिकार करना चाहता था। मगर उअहे पता नही था कि वाजिद अली शाह की पत्नी बेगम हजरत महल बारूद के समान है। उनके रहते उसकी चाल सरलता से सफल न हो सकेगी।

 

हजरत महल डलहौजी की चाल को समझ गई। उन्होने आगे बढकर अपने बेटे की ओर से शासन की बागडोर अपने हाथ में ले ली। वह स्वंय राज काज के कार्य देखने लगी। डलहौजी ने उनके इस कदम का विरोध किया। परंतु हजरत महल ने उसके विरोध की परवाह न की।

 

बेगम हजरत महल और 1857 की क्रांति

 

1857 के दिन थे। जब सारे भारत मे स्वत्रंता की आग जल रही थी। सभी छोटे बडे नगरो और गांवो में मुक्ति आंदोलन के सैनिक मौजूद थे। और अंग्रेजो को हानि पहुचाने में संग्लन थे। लखनऊ ओर उसके बाहर भी स्वत्रंता सेनानी चारो ओर फैले हुए थे। उन्होने बेगम हजरत महल को अपने नेता के पद पर प्रतिष्ठित किया। हजरत महल ने उसे स्वीकार कर लिया क्योकि वह अपने पति को नजरबंद करने ओर उन पर अत्याचार करने को कैसे भूल सकती थी।

हजरत महल ने मुक्ति संग्राम के सेनानियो के लिए अपना खजाना खोल दिया। उन्होने धन और जन से क्रांतिकारियो की बहुत सहायता की। केवल धन और जन से ही नही वे स्वयं भी रण के मैदान में क्रांतिकारियो के साथ उपस्थित रही और मिलकर अंग्रेजो से युद्ध किया।

मौलवी अहमदशाह ने बडी अनन्यता के साथ बेगम का साथ दिया। अहमदशाह एक मौलवी थे। जो पहले फैजाबाद में रहते थे। बाद में लखनऊ आकर रहने लगे थे। वे बडे ही शूरवीर और अनुभवी थे। 1857 के युद्ध में उन्होने जो शोर्य दिखाया था वह उन्ही के योग्य था।

मौलवी अहमदशाह और हजरत महल ने अंग्रेजो का लखनऊ में रहना मुश्किल कर दिया। उधर नाना साहब कानपुर में अंग्रेजो का काल बने हुए थे। कानपुर और लखनऊ दोनो जगह से अंग्रेज भागने लगे थे। यदि समय पर उन्हें नई सहायता न मिलती तो इसमें कोई संदेह नही है कि कानपुर और अवध से अंग्रेजो का सफाया हो जाता और फिर पुरे भारत में अंग्रेजो का सफाया होने में भी देर न लगती।

 

नई सहायता के आ जाने के कारण अंग्रेजो के पैर जम गए। अंग्रेज फौज ने क्रातिकारियो का डटकर मुकाबला किया। जिसका परिणाम यह हुआ कि मुक्ति सेना का मोर्चा टूट गया। लखनऊ और कानपुर में भी अंग्रेजो ने मुक्ति सेना को पराजित कर डाला। मुक्ति सेना के सैनिक तितर बितर हो गए।

 

कई महीने बीत गए पर सेना में सक्रियता उत्पन्न नही हुई। ऊधर अंग्रेज अपने पैर जमाते जा रहे थे। हजरत महल ने क्रातिकारी सेना की एक सभा बुलाई। उन्होने उस सभा में भाषण देते हुए कहा कि :– साफ साफ जवाब दो। तुम लोग अंग्रेजो से लडना चाहते हो या नही। यदि तुम लोग न लडोगे तो मै लडूंगी। मैं गोली और गोलो पर सो जाऊंगी पर लखनऊ अंग्रेजो को नही दूंगी।

 

बेगम हजरत महल केओजस्वी भाषण का क्रांतिकारियो पर बहुत प्रभाव पडा। उन्होने अंग्रेजो से युद्ध करने के संकल्प को फिर दोहराया। बेगम ने फिर से सेना संगठित की। और फिर मुक्ति सेना और अंग्रेजो में घमासान युद्ध हुआ। उस युद्ध में स्वयं बेगम ने हाथी पर सवार होकर सेना संचालन किया था। परंतु दुर्भाग्यवश मुक्ति सेना को हार का सामना करना पडा और लखनऊ पर अंग्रेजो ने अधिकार कर लिया।

 

इन्ही दिनो एक विश्वासघासी ने मौलाना अहमदशाह का कत्ल कर उनका सिर काटकर अंग्रेजो के पास भेज दिया। हजरत महल अब अकेली रह गई। उनके लिए अब यही एक रास्ता बचा था की वह लखनऊ छोड दे। उनके हितैषियो ने भी उन्हें यही सलाह दी।

उधर कानपुर और इलाहाबाद का भी मोर्चा टूट चुका था। मेरठ और दिल्ली में भी अंग्रेज सेना ने क्रातिकारियो को कुचल दिया था। अंग्रेजो ने मुगल बादशाह बहादुरशाह को गिरफतार कर रंगून भेज दिया था।

डर हुआ की कही अंग्रेज हजरत महल को बंदी न बना ले। अत: उन्होने अपने बेटे के साथ लखनऊ छोड दिया। उन्होने नेपाल जाने का प्रयत्न किया। पहले तो नेपाल के राणा जंगबहादुर ने हजरत महल को नेपाल में प्रवेश की अनुमति नही दी। परंतु बाद में वह मान गए। बेगम कांठमांडू में जाकर रहने लगी। वे काठमांडू में कितने दिन रही कुछ कहा नही जा सकता। पर यह तै सच है कि उन्होने काठमांडू में ही अपने जीवन की अंतिम सांस ली।

जब भी 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा की जाएगी। बेगम हजरत महल के नाम का उल्लेख बडे आदर के साथ किया जाएगा। उनकी देशभक्ति शोर्य और वीरता ने इतिहास के पन्नो पर उन्हें हमेशा हमेशा के लिए अमर बना दिया

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