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द्वारकाधीश मंदिर का इतिहास – द्वारका धाम – द्वारकापुरी

हिन्दू धर्म में चार दिशाओ के चारो धाम का बहुत बडा महत्व माना जाता है। और चारो दिशाओ के ये चारो धाम भारत में ही स्थित है। हिन्दू धर्म से जुडा हर व्यक्ति अपने जीवन में एक बार चारो दिशाओ के धामो की यात्रा करके अपने जीवन को सफल बनाने के लिए लायलित रहता है। ये चारो धाम इस प्रकार है– बद्रीनाथ धाम यह उत्तर दिशा का धाम है। द्वारका धाम यह पश्चिम दिशा का धाम है। रामेश्वरम धाम यह दक्षिण दिशा का धाम है। जगन्नाथपुरी धाम यह पूर्व दिशा का धाम है। अपने पिछले दो लेखो में हम बद्रीनाथ धाम और रामेश्वरम धाम की यात्रा महत्व व इतिहास का वर्णन कर चुके है। आप इनके नाम पर क्लिक करके इनके बारे में भी पढ सकते है। इसी यात्रा के क्रम को आगे बढाते हुए, अपने इस लेख में हम पश्चिम दिशा के द्वारका धाम की यात्रा करेगे और द्वारकाधीश टेम्पल के दर्शन करेगें।

 

द्वारकाधीश मंदिर और द्वारका के सुंदर दृश्य
द्वारकाधीश मंदिर और द्वारका के सुंदर दृश्य

 

द्वारका की गणना धामो में तो होती ही है। इसके साथ साथ द्वारका की गणना सप्तपुरियो में भी होती है। परंतु आज द्वारका नाम से कई स्थान कहे जाते है। दो स्थान मूल द्वारका के नाम से विख्यात है। एक “गोमती द्वारका”  और दूसरा “बेट द्वारका” 

ऐसा कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण के अंतर्धान होते ही द्वारका समुंद्र में डूब गई थी। केवल भगवान का निजी मंदिर समुंद्र में नही डूबा था। गोमती द्वारका और बेट द्वारका एक ही विशाल द्वारकापुरी के अंश है। ऐसा मानने में कोई दोष नही है। द्वारका के समुंद्र में डूब जाने के बाद लोगो ने कई स्थानो पर द्वारका का अनुमान करके मंदिर बनवाए। और जब वर्तमान द्वारका की प्रतिष्ठा हो गई, तब उन अनुमानित स्थलो को मूल द्वारका कहा जाने लगा।

वर्तमान द्वारकापुरी गोमती द्वारका कही जाती है। यह नगरी प्राचीन द्वारका के स्थान पर प्राचीन कुशस्थली में ही स्थित है। यहा अब भी प्राचीन द्वारका। के अनेक चिन्ह रेत के नीचे से यदा-कदा मिल जाते है। यह नगरी गुजरात राज्य के काठियावाड में पश्चिम समुंद्र तट पर स्थित है। यहा भगवान श्रीकृष्ण का द्वारकाधीश नामक प्रसिद्ध मंदिर है।

 

द्वारका के बारे में

 

द्वारका भगवान श्रीकृष्ण की नगरी है। मथुरा को छोडने के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने द्वारका को बसाया था। यही पर उनका महल था। उनकी बसाई हुई नगरी तो समुद्र में विलीन हो गई थी। जिसके तथ्यो को आज भी कुछ इतिहासकार, वैज्ञानिक, गोताखोरो की मदद से तलाशने में जुटे है। मूल द्वारका कहां और कौनसी है। यह आज तक रहस्य बना हुआ है। कुछ लोग गोमती को द्वारका मानते है और बेट को द्वारका पुरी तथा कुछ लोगो का मानना इससे उलटा है वो बेट को मूल द्वारका मानते है। सबसे सही मत यह माना जाता है कि गोमती मूल द्वारका है। तथा भगवन लीला का यह सम्मपूर्ण स्थल द्वारकापुरी है। जो वर्तमान द्वारका नगरी है।

यह नगरी गुजरात राज्य की प्रसिद्ध नगरी है। तथा द्वारका के नाम पर ही इस जिले का नाम भी देवभूमि द्वारका रखा गया था। यह द्वारका नगरी एक चार दीवारी के अंदर बसी हुई है। इस चार दीवारी के अंदर अनेक मंदिरो का समूह है। जिसमे भगवान श्रीकृष्ण का प्रसिद्द व मुख्य द्वारकाधीश मंदिर भी है।

 

मित्रो! द्वारका धाम की यात्रा पर जाने से पहले द्वारकाधाम के माहात्मय को समझ लेते है। आखिर मनुष्य को द्वारकाधीश के दर्शन पूजन करने से क्या फल मिलता है।

द्वारका धाम, द्वारकापुरी, या द्वारकाधीश मंदिर का माहात्मय

 

हिन्दू धर्म के पवित्र ग्रंथों में इस धाम का महत्व बहुत बडा माना है। इस धाम की यात्रा से मनुष्य के जीवन के सभी पाप नष्ट हो जाते है। तथा वह गंगा जल जितना पवित्र हो जाता है। धर्म ग्रंथ स्कंदपुराण के अनुसार– द्वारका के प्रभाव से कीट-पतंग, पशु पक्षी तथा सर्प आदि योनियों में पडे हूए समस्त पापी भी मुक्त हो जाते है। इस पवित्र धाम की महिमा के बारे में यहा तक कहा जाता है, कि जो मनुष्य द्वारकावासी के दर्शन या स्पर्श करके भी बडे बडे पापो से मुक्त हो स्वर्ग लोक में निवास करते है। वायु द्वारा उडाई हुई धूल के कण के स्पर्श में आने वाले मनुष्य भी पाप मुक्त हो जाता है। इसी से ही अनुमान लगाया जा सकता है कि जो मनुष्य साक्षात द्वारका के दर्शन, जप, दान, तप आदि करे तो उसे कितना फल मिलता होगा। द्वारका सब क्षेत्रो और तीर्थो से उत्तम कही गई है। यहा किए गए होम, जप, दान, तप आदि सब भगवान श्रीकृष्ण के समीप कोटिगुना एवं अक्षय होते है।

 

द्वारकाधीश के महात्मय को जानने के बाद आइए अब द्वारकापुरी की धार्मिक पृष्ठभूमि पर भी कुछ ध्यान आकर्षित कर लेते है।

 

द्वारकाधाम की धार्मिक पृष्ठभूमि

 

धार्मिक ग्रंथों व पुराणो के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरकाल में शांतिपूर्वक एकांत क्षेत्र में रहने के उद्देश्य से सौराष्ट्र में समुंद्र तट पर द्वारकापुरी नामक नगरी बसाकर आस पास के क्षेत्र में अपना राज्य स्थापित किया था। उन्होने विश्वकर्मा द्वारा समुंद्र में ( कुशथली द्वीप में) द्वारकापुरी बनवायी और मथुरा से सब यादवो को यहाँ ले आए। श्रीकृष्ण के अंतर्ध्यान होने के पश्चात द्वारका समुद्र में डूब गई। केवल भगवान श्रीकृष्ण का निज भवन नही डूबा। वज्रनाथ ने वही श्रीरणछोडराय के मंदिर की प्रतिष्ठा की।

यह स्थान बहुत महत्व वाला है। यहा मर्दादितसागर भगवान श्रीकृष्ण के चरणो को धोया करता था। यही कंचन और रत्नजडित मंदिर की सिढियो पर खडे होकर दीन हीन सुदामा ने मित्रता की दुहाई दी थी। यही पर सुदामा का नाम सुनते ही भगवान श्रीकृष्ण नंगे पावं उठकर मित्र से मिलने उठकर भागे थे। इसी नगरी में वियोगिनी मीरा ने अपने प्रियतम के चरणो पर अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे।

सतयुग में महाराज रैवत ने समुंद्र के मध्य की भूमि पर कुश बिछाकर यज्ञ किए थे। जिससे इसे कुशथली कहा गया है। बाद में यहा कुश नामक दानव ने उपद्रव किया। जिसे मारने के लिए ब्रह्माजी राजा बलि के यहा से त्रिविक्रम भगवान ले आए। जब दानव शस्त्रो से नही मरा, तब भगवान ने उसे मूर्ति में गाढकर उसके उपर उसी की आराध्य कुशेश्वर लिंग मूर्ति स्थापित कर दी। दैत्य के प्राथना करने पर भगवान ने उसे वरदान दिया कि, कुशेश्वर का जो दर्शन नही करेगा उसकी द्वारका यात्रा का आधा पुण्य उस दैत्य को मिलेगा।

एक दिन दुर्वासाजी द्वारका आए। उन्होने बिना कारण ही रूकमणी जी को श्रीकृष्ण से वियोग होने का शाप दे दिया। जब रूकमणिजी बहुत दुखी हुई तो भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे वियोग काल में मेरी मूर्ति का पूजन कर सकेगी। कहा जाता है कि वह मूर्ति वही श्रीरणछोडराय की मूर्ति है।

इनके आलावा भी इस स्थान के अनेक धार्मिक महत्व वर्णन अनेक ग्रंथो में भरे पडे है जिनका वर्णन यहां करना संभव नही है। कुल मिलाकर देखा जाए तो इस स्थान के कण कण में देवता वास करते है। चलिए अब इस तीर्थ के दर्शन कर लेते है।

 

द्वारकाधीश मंदिर

यह द्वारका का मुख्य द्वारकाधीश मंदिर है। जिसे श्रीरणछोडरायजी का मंदिर भी कहते है। यह मंदिर एक चारदीवारी के बीच में स्थित है। जिसके चारो ओर द्वार है। यह मंदिर सात मंजिला और शिखरयुक्त है। मंदिर की चोटी पर एक बहुत बडा ध्वज फहराया होता है। यह ध्वज विश्व का सबसे बडा ध्वज माना जाता है। जिसे चढाते समय यहा महोत्सव होता है। यह मंदिर 40 वर्गफुट लंबा और चौडा है। तथा 140 फुट ऊंचा है। मंदिर के फर्श पर सफेद व नीले संगमरमर के टुकडो को कलात्मक ढंग से लगाया गया है। श्रीरणछोडराय जी की मूर्ति, तथा मंदिर के द्वार में सोने चांदी का काम किया गया है। भगवान श्रीकृष्ण की इस मूर्ति के नाम के पिछे एक कथा है। कहा जाता है कि- भगवान श्रीकृष्ण कालयवन के विरूद्ध युद्ध से भागकर द्विरका पहुंचे। जिसके कारण उनका नाम रणछोडजी पडा।

मंदिर में मुख्यपीठ पर श्रीरणछोडरायजी की चतुर्भुज मूर्ति है। मंदिर के ऊपर चौथी मंजिल में अम्बाजी की मूर्ति है।

द्वारका की रणछोडराय की मूल मूर्ति तो बोडाणा भक्त डाकोर ले गए। वह अब डाकोर में है। उसके छ: महिने बाद दूसरी मूर्ति लाडवा ग्राम के पास एक वापी में मिली। वही मूर्ति अब मंदिर में विराजमान है।

 

गोमती

द्वारका में पश्चिम और दक्षिण दिशा में एक बडा खाल है। जिसमे समुंद्र का जल भरा रहता है। इसे गोमती कहते है। यह कोई नदी नही है। इसी के कारण इस द्वारका को गोमती द्वारका कहते है। गोमती के तट पर नौ पक्के घाट बने है।

 

निष्पाप सरोवर

यह एक छोटा सा सरोवर है। जो सरकारी घाट के पास है। यह गोमती के खारे जल से भरा रहता है। यात्री पहले निष्पाप सरैवर में स्नान करके तब गोमती स्नान करते है। यहा पिंडदान भी किया जाता है।

इन धामो के बारे में भी जाने–

बद्रीनाथ धाम की यात्रा

रामेश्वरम धाम की यात्रा

आइए अब बेट द्वारका के दर्शन कर लेते है।

बेट द्वारका

गोमती द्वारका से 20 मील पूर्वोउत्तर कच्छ की खाडी में एक छोटा द्विप है। बेट (द्विप) होने के कारण इसे बेट द्वारका कहते है।

श्रीकृष्ण महल

इस द्विप में एक विशाल चौक में दुमंजिले तीन महल तथा तीन मंजिले पांच महल है। द्वार से होकर सीधे पूर्व की ओर जाने पर दाहिनी ओर श्रीकृष्ण भगवान का महल मिलता है। इसमे पूर्व की ओर प्रद्युमन का मंदिर है। तथा मध्य में श्रीरणछोडरायजी का मंदिर है। और इस महल की परिक्रमा में ओर भी कई मंदिर है। जो दर्शनीय है।

 

 

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