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देवगढ़ का इतिहास – दशावतार मंदिर, जैन मंदिर, किला कि जानकारी हिन्दी में

देवगढ़ का इतिहास – दशावतार मंदिर, जैन मंदिर, किला कि जानकारी हिन्दी में

देवगढ़ उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में बेतवा नदी के किनारे स्थित है। यह ललितपुर से दक्षिण पश्चिम में 31 किलोमीटर की दूरी पर है। वहां तक पक्की सड़क जाती है। प्रतिदिन बसे जाती है। ललितपुर से देवगढ़ जाने का मार्ग इस प्रकार है– ललितपुर से जीरौन 16 किलोमीटर वहां से जाखलौन 6 किलोमीटर वहां से सैपुरा 3 किलोमीटर सेपुरा से देवगढ़ 6 किलोमीटर। मार्ग पहाड़ी घाटियों से होकर जाता है। देवगढ़ एक छोटा सा गांव है जिसमें ज्यादा आबादी नहीं है। यह बेतवा नदी के मुहाने पर निचाई पर बसा हुआ है। विंध्यापर्वत की श्रेणियों को काटकर बेतवा नदी ने यहां बडे़ ही सुंदर दृश्य अवस्थित किये है।

 

देवगढ़ क्यों प्रसिद्ध है, और इसे किस लिए जाना जाता है तथा क्षेत्र की स्थिति




यह स्थान यहां स्थित देवगढ़ का किला, देवगढ़ जैन मंदिर समूह, देवगढ़ दशावतार मंदिर आदि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, कला, आदि के मिश्रण का केंद्र है। जो इसे विश्व प्रसिद्धि दिलाता है। यह एक जैन तीर्थ, हिन्दू तीर्थ, तथा ऐतिहासिक पर्यटन स्थल है। देवगढ़ का इतिहास में बहुत ही ख़ास स्थान रहा है। यह ऐतिहासिक दृष्टि से भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। देवगढ़ का प्राचीन किला जिस पर्वत पर है। बेतवा नदी ठीक उसके 400 फुट नीचे से बहती है। यह पहाड़ उत्तर दक्षिण में लगभग एक मील लंबा और पूर्व पश्चिम में लगभग 6 फर्लांग चौड़ा है। इस पहाडी के नीचे एक दिगंबर जैन धर्मशाला, दिगंबर जैन मंदिर, और साहू जैन संग्रहालय है। संग्रहालय की स्थापना साहू जैन ट्रस्ट की ओर से सन् 1968 में हुई थी। धर्मशाला के बराबर में ही वन विभाग गेस्ट हाउस है। गांव के उत्तर में प्रसिद्ध दशावतार मंदिर और शासकीय संग्रहालय है। पूर्व में पहाड़ी पर उसके दक्षिण पश्चिमी कोने में किले के भितर जैन मंदिर और अन्य जैन स्मारकों का समूह है। किले पर पहुंचने के लिए पूर्व की ओर रास्ता बना हुआ है। रास्ते में एक तालाब भी है। पहाड़ पर जाने के लिए पक्का रोड है। बस और कार ठीक द्वार तक चहुंच जाती है।

 

देवगढ़ का इतिहास – देवगढ़ हिस्ट्री इन हिन्दी



गुर्जर प्रतिहार नरेश भोजदेव के शासन कालीन संवत् 919 के शिलालेखों से पता चलता है कि पहले इस स्थान का नाम लुअच्छागिरि था। 12वी शताब्दी में चंदेलवंशी राजा कीर्ति वर्मा के मंत्री वत्सराज ने इस स्थान पर एक नवीन किले का निर्माण कराया था। और अपने स्वामी के नाम पर इसका नाम कीर्तिगिरि रखा था। संम्भवतः 12-13वीं शताब्दी में इस स्थान का नाम देवगढ़ पड़ गया। देवगढ़ के इस नाम करण का कारण क्या है। इस संबंध में विद्वानों में एक मंत नहीं है। श्री पूर्णचन्द्र मुखर्जी का अभिमत है कि इस स्थान पर सन् 850 से 969 तक देववंश का शासन रहा इसलिए इस गढ़ को देवगढ़ कहा जाने लगा। किन्तु यह मान्यता निर्दोष नहीं है। क्योंकि इस काल में यहां गुर्जर प्रतिहार वंशी राजाओं का राज्य था।
एक दूसरी मान्यता के अनुसार यहां एक स्तंभ पर वि.संवत् 919 का एक अभिलेख है। उसके अनुसार उस स्तंभ के प्रतिष्ठायक आचार्य कमल देव के शिष्य श्री देव है जो बड़े प्रभावशाली थे। उन्होंने यहां भटटारक गढ़ी की स्थापना की थी। अतः यह स्थान भट्टारकों का गढ़ रहा है। और उनके नाम के अंत में देव शब्द रहता था। इस कारण इस स्थान का नाम देवगढ़ प्रसिद्ध हो गया। एक तीसरी मान्यता जो अधिक प्रभावी प्रतीत होती है, यह कि यहां असंख्य देव मूर्तियां है। इसलिए इसका नाम देवघर पड़ा जो आगे चलकर देवगढ़ में परिवर्तित हो गया।

देवगढ़ के सुंदर दृश्य
देवगढ़ के सुंदर दृश्य




देवगढ़ नाम के संबंध में एक किंवदंती भी बहुत प्रचलित है। जिसके अनुसार देवपत और खेमपत नामक दो भाई थे। उनके पास एक पारसमणि थी, जिसके प्रभाव से वे असंख्य धन के स्वामी बन गये थे। उस धन से उन्होंने देवगढ़ का किला और मंदिर बनवाये। तत्कालीन राजा को जब जब इस पारसमणि का पता चला तो उसने देवगढ़ पर आक्रमण करके उस पर अपना अधिकार कर लिया, किंतु उसे पारसमणि नहीं प्राप्त हो सकी क्योंकि उसे तो उन धर्मात्मा भाईयों ने बेतवा नदी के गहरे जल में फेंक दिया था। संभंवतः उसी देवपत के नाम पर इसका नाम देवगढ पड़ गया। ऐसी भी मान्यता है कि इस स्थान की रचना देवों ने की थी इसलिए इसे देवगढ़ कहा जाने लगा। ऐतिहासिक दृष्टि से देवपत और खेमपत कब हुए अथवा उपयुक्त किंवदंती में कितना सत्य है। यह तो विश्वास पूर्वक नहीं कहा जा सकता, किंतु यह निश्चित है कि बुंदेलखंड में ऐसा भी समय आया था, जब यहां जैनियों का पर्याप्त प्रभाव और वर्चस्व था। इसे हम इस प्रदेश स्वर्णकाल कह सकते है। क्योंकि इस समय काल को सभी दिशाओं में खुलकर विकास करने का पर्याप्त अवसर प्राप्त हुआ और कला विदों ने कठिन पाषाणों में सूक्ष्म ललित कला का अंकन करने का सफल प्रयत्न किया।


राजनीतिक स्थिति

उपयुक्त स्मारकों और देवालयों को देखकर सहज ही यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यहां पर कला और पुरातत्व की जो सम्पदा सुरक्षित है, वह अनुपम है। लगता है कि बुंदेलखंड में उस समय जैनों का पर्याप्त प्रभुत्व एवं प्रभाव रहा है। कला की दृष्टि से इसे हम इस प्रदेश का स्वर्ण काल कहे तो अनुचित नहीं होगा। इस प्रदेश पर किस वंश का कितने काल तक प्रभुत्व रहा पुरातात्विक मत के अनुसार हजारों वर्ष पहले यहां शबर जाति का आधिपत्य था। उसके पश्चात पांडवों (ईसा से 3 हजार वर्ष पूर्व), सहरी (समय अज्ञात), गोंड (समय अज्ञात), गुप्तवंश (300 से 600 ईसा), देववंश (950 से 961ई.), चंदेलवंश (1000 से 1210 ई.), मुगलवंश (1250 से 1600 ई.) बुंदेलवंश (1700 से1811 ई.) तत्पश्चात यहां अंग्रेजों का आधिपत्य रहा। सन् 1811 में महाराज सिंधिया ने अपनी फौज भेजकर इस पर आधिपत्य कर लिया। कुछ समय पश्चात महाराज सिंधिया से अंग्रेजों ने एक संधि की, जिसके अनुसार देवगढ़ अंग्रेजों ने ले लिया और उसके बदले चन्देरी महाराज सिंधिया को दे दिया।

देवगढ़ के किले की दीवार कब किसने बनवाई यह कहना कठिन है किंतु सुरक्षात्मक दृष्टि से यह दुर्ग अत्यंत सुदृढ़ है। इसकी दीवार की चौड़ाई 15 फुट है। यह बिना गारे और चूना के केवल पत्थर की बनी हुई है। इसमें बुर्ज और गोला चलाने के लिए भी छेद बने हुए है। किले के उत्तर पश्चिमी कोने में दीवार की मोटाई 21 फुट और लम्बाई 600 फुट है। हो सकता है यह दीवार किसी अन्य किले की रही हो जो नष्ट हो गया।

एक विशेष दिशा की ओर अब तक लोगों का ध्यान नहीं गया । देवगढ सुरक्षा गढ अवश्य रहा है। किंतु यह कभी किसी की राजधानी नहीं रहा। प्रकृति ने एक ओर बेतवा नदी और दूसरी और पहाड़ों की अभेद्य दीवार खडी करके जो इसे सुरक्षा प्रदान की है। उसके कारण विभिन्न राजवंशों ने इसे अभेद्य किले के रूप में रखा और उसकी रक्षा के लिए कुछ सेना भी रखी। किंतु यहां किले के भीतर राजमहल था। सैनिकों की बैरकों के कोई चिन्ह दिखाई नहीं पडते है। इसका उद्देश्य इतना ही हो सकता हैं कि इन देव मूर्तियों को सुरक्षित रखा जाये। राजवंशो ने इस किले पर आधिपत्य के जो भी प्रयत्न किये वे केवल इस गौरव के लिए कि वह उन असंख्य देव प्रतिमाओं का स्वामित्व अधिकारी है। जो कला वैभव और विपुल परिमाण की दृष्टि से देशभर में अनुपम है। संभव है इसकी भौगोलिक स्थिति के कारण यहां से इस क्षेत्र पर दृष्टि रखने के लिए इसका सैनिक महत्व भी रहा हो। ऐसा भी लगता है जब मुसलमान शासक यहां आये तो उन्होंने यहां की इस सांकृतिक निधि देव प्रतिमाओं का खुलकर विध्वंस किया। बुंदेलखंड में लोग कहा करते है कि देवगढ मे इतनी प्रतिमाएं है कि यदि एक बोरी भरकर चावल ले जाये और हर एक प्रतिमा के आगे एक चावल ही चढाते जाये तब भी चावल कम पड़ जायेंगे। आज यहां चारों और बिखरे हुए भग्नावशेषों को देखे तो उक्त बुंदेलखंडी कहावत असत्य नहीं जान पड़ती।

अभिलेखों की दृष्टि से देवगढ़

यहां लगभग 300 छोटे बडे अभिलेख प्राप्त हुए है। ये अभिलेख भित्तियों, स्तंभों और मूर्तियों पर उत्कीर्ण है। कुछ शिलालेखों पर भी अभिलिखित है। कुछ बेतवा नदी की तटवर्ती गुफाओं और पर्वत शिलाओं पर लिखे प्राप्त हुए है। अधिकांश लेख दान के अवसरों पर उत्कीर्ण कराये गये है। जैन स्मारकों के लेखों में सबसे प्राचीन संवत् 919 का है। यहा के एक अभिलेख की लीपि मौर्यकालीन ब्रह्मलिपि से बहुत मिलती जुलती है। यह अभिलेख शाहू जैन संग्रहालय में रखा हुआ है। नाहर घाटी और दशावतार मंदिर में दो अभिलेख ऐसे प्राप्त हुए है, जो गुप्त काल के है। संवत् 919 का एक अभिलेख गुर्जर प्रतिहार शासक भोज के काल का है। यह मंदिर नंबर 12 के अर्धमंडप में एक स्तंभ पर उत्कीर्ण है। संवत् 1121 में गुर्जर प्रतिहार शासक राज्यपाल द्वारा एक मठ का निर्माण किया गया। संवत् 1210 के एक लेख के अनुसार महासामंत उदयपाल ने मूर्तियों के निर्माण में आर्थिक सहयोग दिया था।

हिल्स जैन टेम्पलस के सुंदर दृश्य
हिल्स जैन टेम्पलस के सुंदर दृश्य



कुछ अभिलेखों में कुछ भौगौलिक नाम भी मिलते है। जैसे — चंदेरीगढ़, पालीगढ़, लुअच्छागिरि, गोपालगढ़, वेत्रवती, करनाटकी। कुछ अभिलेखों में कुछ ऐतिहासिक व्यक्तियों के नाम भी मिलते है। जिसमें अनेक इतिहास प्रसिद्ध घटनाओं के काल निरधारण में हमें सहायता मिलती है। इन महापूरूषो के नाम इस प्रकार है। गुर्जर प्रतिहार शासक भोजदेव, भोज का महासामंत विष्णुराव यचिन्द, राजपाल (गुर्जर प्रतिहार वंश के अंतिम शासकों में से एक), उदयपाल देव, सुल्तान महमूद (मालवा का शासक), उदयसिंह उदेल सिंह, देवी सिंह दुर्गा सिंह (बुंदेला शासक)

 

दिगंबर जैन क्षेत्र



पहाडी के नीचे जो धर्मशाला है उसके पास ही एक पुराना मंदिर दिखाई देता है। जिसे गुप्त मंदिर कहते है। यह गुप्तकालीन स्थापत्य कला के सुंदरतम नमूनों में से एक है। मंदिर की चाहरदीवारी और उसके चारों ओर के अवशेषों को देखने से प्रतीत होता है कि इसके चारों ओर और भी कई मंदिर रहे है। पहाड़ी की तलहटी में स्थित ये सब भवन, मंदिर, धर्मशाला, विश्रामगृह आदि अत्यंत मनोरम स्थान पर अवस्थित है। पीछे की ओर बेतवा नदी न केवल बहती हुई दिखाई देती है। अपितु उसकी कलकल ध्वनि भी कानों में पड़ती है। मंदिर समूह क्षेत्र जाने पर पहाड़ की चढाई समाप्त होते पहाड़ी की आधित्यकाओ को घेरे हुए एक विशाल दीवार मिलती है। जिसके पश्चिम में कुंज द्वार तथा पूर्व में हाथी दरवाजा है। किले की दिवार जगह जगह पर टूटी हुई है। इस दीवार के बीच में एक और दीवार है। जिसे दूसरा गेट कहते है। इसी के मध्य जैन स्मारक या जैन मंदिर है। दूसरे कोट के मध्य मे भी एक छोटी दीवार है जिसके अवशेष अब भी मिलते है। इस प्राचीर के मध्य भी एक दीवार बनायी गयी है। जिसके दोनों ओर खंडित अखंडित मूर्तियां पड़ी है। सभी मंदिर पत्थर के है। विशाल दीवार के दक्षिण पश्चिम में बारह मंदिर और दक्षिण में बेतवा के किनारे नाहर घाटी और राज घाटी है। यद्यपि यहां छोटे बडे़ 40 जैन मंदिर है। किंतु इनमें 31 मंदिरों का कला सौष्ठव उल्लेखनीय है। मंदिरों की अपेक्षा यहां की मूर्तियां शिल्पचातुर्य के उत्तम नमूने है। इन मंदिरों के अतिरिक्त 9 लघु मंदिर, 19 पाषाण स्तंभ और लगभग 500 अभिलेख है।

 

हिल्स जैन मंदिर

• मंदिर नं 1:– ऊपर जाते समय सीधे हाथ की ओर हमें पहला मंदिर मिलता है। यह मंदिर पूर्वाभिमुख है। यह चार चार स्तंभों की पंक्तियों पर आधारित एक मंडप के समान है। पुरातत्व विभाग ने स्तंभों की प्रथम पंक्ति में यहां मूर्तियां जड़ दी है। इनमें खडगासन और पद्मासन दोनों ही अवस्थाओं की मूर्तियां है। पश्चिम की दीवार पर पंच परमेठियो की मूर्तियां भिन्न भिन्न अवस्था में उकेरी हुई है।

• मंदिर नं 2:– मंदिर के मध्य में केवल दो स्तंभ खड़े हुए है। ये स्तंभ दीवार के अंग बन गए हैं। इस मंदिर के पश्चिम में एक द्वार है जो पत्थर की जाली से बंद है। इसके भीतर पद्मासन और खडगासन 10 मूर्तियां विराजमान है।

• मंदिर नं 3:– यह उत्तराभिमुख है। यह पूर्व पश्चिम की तीन ओर सात स्तंभों की चार पंक्तियों पर आधारित है। इसमें खुला मंडप और मंदिर है। आगे के भाग में दालान है। पहले यह मंदिर दो मंजिल का था, किंतु ऊपर की मंजिल गिर जाने से अब यह एक मंजिल का रह गया है। इस मंदिर के दो भाग है। पहले भाग में 11 खंडित मूर्तियां है। जिसमें भगवान पार्शवनाथ की मूर्ति अत्यंत भव्य है। दूसरे भाग में 26 शिलाफलक है उन पर मूर्तियां अंकित है।

• मंदिर नं 4:– यह 18 स्तंभों पर आधारित है। इन स्तंभों में से दो स्तंभ मंडप के अतंर्गत है। 12 को दीवार में चिन दिया गया है। शेष चार स्तंभ मंदिर के बीच में स्थित है। दीवारों में भीतर की ओर अनेक मूर्तियां जड़ी हुई हैं। बाहर स्तंभ में चारों ओर तीर्थंकरों और उपाध्यायों की पद्मासन मूर्तियां अंकित है। दाये स्तंभ में यह विभिन्न आसनों में अंकित है। शेष शैय्या पर लेटी तीर्थंकर की माता का अंकन अद्भुत है।

• मंदिर नं 5:– अत्यंत सुंदर सहस्त्रकूट चैत्यालय है। पूर्व और पश्चिम की ओर दो द्वार है। दोनों द्वारों पर सुंदर अलंकरण है। उत्तर और दक्षिण के द्वार के पाषाण मांडदार है। चैत्यालय में 1008 मूर्तियां बनी हुई है। मंदिर के द्वार पर चमरधारी यक्ष यक्षिणी और द्वारपाल की मूर्तियां बनी हुई है। ऐसा सुंदर मंदिर अन्य ही कही देखने को मिले।

• मंदिर नं 6:– यह चार स्तंभों पर बना हुआ है। इसमें सात तीर्थंकर मूर्तियां दीवार में जडी हुई है। इस मंदिर में एक मूर्ति भगवान पार्शवनाथ की है। जिसके सिर पर सर्पफण नहीं है। किन्तु दोनों ओर विशाल सर्प बने हुए। कहा जाता है कि पुरानी रीति यही है।

• मंदिर नं 7:– यह चार स्तंभों पर आधारित चारों ओर से खुला हुआ है। सीढियां उत्तर और दक्षिण में है। इसमें चरणों के दो फलक है।

• मंदिर नं 8:– यह आठ स्तंभों पर बना हुआ लम्बाकार मंडप है। इसमें तीन द्वार है। बायीं ओर के द्वार की चौखट के ऊपर पद्मासन तीर्थंकर मूर्ति अंकित है।

• मंदिर नं 9:– इसके आगे एक चबुतरा है। मंदिर का प्रवेश द्वार अलंकृत है। द्वार पर गंगा यमुना तथा अन्य देवी देवताओं का अंकन है। मंदिर में वेदी पर 12 शिलाफलकों पर विभिन्न मूर्तियां अंकित है।

• मंदिर नं 10:– यह चार स्तंभों पर आधारित गुमटीनुमा मंडप के रूप में बना हुआ है। इसके मध्य में एक पंक्ति में तीन चतुष्कोण स्तंभ है। इनमें प्रत्येक की गुमटी खंडित है। स्तंभ छः फुट ऊंचें है। जीर्णोद्धार के समय दो स्तंभों में तामपत्र मिले थे। इन तीनों स्तंभों के चारों ओर देवकुलिकाओ में तीर्थंकरो, साधु साध्वियों और श्रावकों की मूर्तियां और शिलालेख है।

• मंदिर नं 11:– यह दो मंजिला पंचायतन शैली का मंदिर है। आठ स्तंभों पर इसका मंडप बना हुआ है। प्रवेश द्वार सुंदर एवं अलंकृत है। इसमें एक महामंडप है। दीवारों में 12 स्तंभ चिने हुए है। 4 स्तंभ बीच में है। गर्भग्रह में तीर्थंकर मूर्तियां है। दूसरी मंजिल का द्वार भी अलंकृत है। उस पर मूर्तियां बनी हुई है। यहां 24 शिलाफलक है जिनमें 18 पर खडगासन और 6 पर पद्मासन तीर्थंकर मूर्तियां बनी हुई है। गर्भगृह में वेदी पर पांच मूर्तियां विराजमान है।

• मंदिर नं 12:– यह मंदिर देवगढ़ के सभी मंदिरों में महत्वपूर्ण है। और मुख्य मंदिर माना जाता है। यह पश्चिमाभिमुख है। पहले अर्धमंडप बना हुआ है, फिर मंडप आता है, जो छः छः खंम्भो की छः पंक्तियों पर आधारित है। बरामदे में बायी ओर 18 शिलाफलक है। दो पर पद्मासन और शेष पर खडगासन मूर्तियां है। यह बरामदा 42 वर्गफुट का है। इस मंदिर में भगवान शांतिनाथ की मूलनायक प्रतिमा विराजमान है। जो 12 फुट ऊंची खडगासन है। यह प्रतिमा अत्यंत चित्ताकर्षक और अतिशय सम्पन्न है।

• मंदिर नं 13:– यह उत्तराभिमुख है। इसके मंडप में 20 शिलापट्ट पर तीर्थंकर मूर्तियां है। गर्भगृह में चार वेदियों पर सात शिलापट्ट और आठ तीर्थंकर मूर्तियां है। यहां जो मूर्तियां है उनमें कैश कला विभिन्न शैलियां दर्शनीय है। देवगढ़ के मंदिरों में जो 18 प्रकार की केशकला के नमूने प्राप्त होते है। कहा जाता है कि यह ओर कही भी प्राप्त नहीं होते। यहां से ही इस कला को विदेशों में ले जाया गया। एक फलक के दोनों ओर खडगासन मूर्तियां है।

• मंदिर नं 14:– आठ स्तंभों पर मंडप है। फिर गर्भ गृह है। इसमे दो कमरे है। दाये कमरे में छः शिलापटटों पर 6 खडगासन मूर्तियां है। बायें कमरे में सात शिलाफलकों पर मूर्तियां है। कुल चार मूर्तियों पर लेख हैं।

• मंदिर नं 15:– यह पश्चिमाभिमुख है। आठ स्तंभों पर अर्ध मंडप बना हुआ है। यहां पांच शिलापट्ट है। चार शिलापटटों पर तीर्थंकर मूर्तियां है। तथा एक पर शिलालेख है। द्वार की चौखट कलापूर्ण है। महामंडप में 16 स्तंभ है। यहा 18 शिलाफलक है, 6 छोटी वेदिया है, दो पर एक एक पंक्ति का लेख है। चारो दिशाओं में एक एक गर्भगृह है। उत्तर के गर्भगृह में तीन मूर्तियां और मूर्ति खंड है। पूर्वी गर्भगृह में द्वार पर गंगा यमुना और द्वार के भीतर एक पद्मासन प्रतिमा तथा उसके दोनो ओर खडगासन प्रतिमा है। भगवान नेमिनाथ की मूर्ति अत्यंत भव्य है। दक्षिणी गर्भग्रह में बाहरी ओर दो खडगासन मूर्तियां है।

• मंदिर नं 16:– चार स्तंभों पर मंडप बना एक महामंडप है। जिसमे 6-6 खंम्भो की तीन पंक्तियां है। महामंडप में 25 विशाल शिलापट्ट है। आठ पर पद्मासन और सोलह पर खडगासन तीर्थंकर मूर्तियां है। एक शिलापट्ट पर अंबिका की मूर्ति है।

• मंदिर नं 17:– मंडप 8 स्तंभों पर खडा है। यहां तीन शिलापटटों पर खडगासन मूर्तियां है। महामंडप में 31 शिलाफलक है। 22 पर खडगासन और 9 पर पद्मासन मूर्तियां है।

• मंदिर नं 18:– यह दक्षिणाभिमुख है। इस मंदिर की शैली खुजराहों के मंदिरों की शैली से मिलती है। चबुतरे पर दो स्तंभ खड़े है। मंडप 8 खंभों पर आधारित है। मंडप में 3 फलको पर पद्यासन और चार पर खडगासन मूर्तियां बनी है। महामंडप के प्रवेशद्वार पर दो मर्दनिका अंकित है। तथा संगीत सभा का दृश्य बना हुआ है। यह मंडप 16 खंभों पर ठहरा हुआ है। इसमें 16 शिलाफलक है। गर्भगृह द्वार नीचा है। द्वार पर गंगा यमुना का अंकन है। गर्भगृह में पांच शिलापट्ट है एक सात फुट सात इंच की विशाल मूर्ति है।

• मंदिर नं 19:– यह दक्षिणाभिमुख है। मंडप में आठ स्तंभ है। प्रवेशद्वार पर गंगा यमुना, नाग नागिन, तीर्थंकर मूर्तियां तथा भरत और बाहुबली की मूर्तियों का सुंदर अंकन है। महामंडप में 16 स्तंभ है। 12 शिलाफलक रखे हुए है। इनमें से सात के शिष कटे हुए है। मंदिर के बरामदे में चारभुजी खड़ी हुई सरस्वती, पोदशभुजी गरूडासीन चक्रवेश्ररी, वृषभासीना, अष्टमुखी, ज्वालामलिनी, और पद्मावती की मूर्तियां बडी मनोज्ञ है। इनमे से एक पर वि. संवत् 1120 खुदा हुआ है।

• मंदिर नं 20:– यह दक्षिणाभिमुख है। प्रवेशद्वार पर गंगा यमुना और तीर्थंकर मूर्तियों का अंकन है। मंडप में 24 स्तंभ है। तथा 27 शिलापट्ट रखे है। इनमें 14 पर खडगासन और 13 पर पद्मासन प्रतिमाएं अंकित है। गर्भगृह में 5 शिलापट्ट है। जिनमें तीन पर पद्मासन और दो पर खडगासन मूर्तियां है। भगवान महावीर की पद्मासन प्रतिमा अत्यंत सुंदर है।

• मंदिर नं 21:– मंडप 8 स्तंभों पर आधारित है। यहा एक स्तंभ खंड रखा हुआ है। जिस पर 6 पंक्तियों का एक लेख है। मंडप में एक कायोत्सर्ग मूर्ति है जो खंडित है। पश्चिमी कक्ष में 8 शिलाफलक है। जिनमें तीन पर अभिलेख है। एक मूर्ति का सिर कटा हुआ है। पूर्वी कमरें में भी 8 शिलाफलक है। इसकी मूर्तियां बडी सुंदर है। किंतु चार मूर्तियों के सिर कटे हुए है। सन् 1949 में मूर्ति चोरो ने इस मंदिर को बहुत क्षति पहुंचाई अनेक मूर्तियों के सर काट ले गये।

• मंदिर नं 22:– यह दक्षिणाभिमुख है। मंडप दो स्तंभों और प्रवेशद्वार पर स्थित है। द्वार के ऊपर एक पंक्ति का लेख हैं। बहारी दीवारों पर शिखरा कृतियाँ बनी हुई है। गर्भगृह में तीन शिलापटटों पर 3 पद्मासन मूर्तियां बनी हुई है।

• मंदिर नं 23:– प्रवेशद्वार सुंदर है। गर्भगृह की वेदी सूनी है। यहा पांच शिलापट्ट है। तीन पर कायोत्सर्ग और एक पर पद्मासन तीर्थंकर मूर्तियां अंकित है, अन्य एक शिलापट्ट पर अंबिका की मूर्ति है।

• मंदिर नं 24:– मंडप से आगे द्वार है। जिस पर गंगा यमुना और तीर्थंकर मूर्तियों का भव्य अंकन है। द्वार के सिरदल पर एक पंक्ति का लेख है। गर्भगृह में 5 शिलापट्ट है। तीन पर पद्मासन एक पर खडगासन मूर्तियां है तथा एक पर धरणेन्द्र- पद्मावती बने हुए है।

• मंदिर नं 25:– यह पूर्वाभिमुख है। मंडप चार स्तंभों पर आधारित है। प्रवेशद्वार के ऊपर खडगासन पार्श्वनाथ का अंकन है। इसके बगल में एक पंक्ति का लेख है। गर्भगृह में 5 शिलाफलक है। जिनमें दो पर पद्मासन और तीन पर खडगासन प्रतिमाएं है।

• मंदिर नं 26:– यह पूर्वाभिमुख है। मंडप 8 स्तंभों पर खड़ा है। मंडप में 5 शिलापट्ट है। एक पर केवल भामंडल है। प्रवेशद्वार के सिरदल पर पांच फण वाली पार्श्वनाथ की मूर्ति है। गर्भगृह में कुल 12 स्तंभ है। यहा 13 शिलाफलक है। जिनमे सात पर अभिलेख है।

• मंदिर नं 27:– यह पूर्वाभिमुख है। मंडप दीवारों पर आधारित है। प्रवेशद्वार के सिरदल पर नेमिनाथ पद्मासन मुद्रा में आसीन है। उनके इधर उधर पार्शवनाथ है। दायी ओर एक पंक्ति का अभिलेख है। गर्भगृह के द्वार के ऊपर ऋषभदेव अंकित है। गर्भगृह में दो शिलापट्ट है। एक पर चौबीसी बनी है।

• मंदिर नं 28:– यह दक्षिणाभिमुख है। गर्भगृह दो सीढी उतरकर नीचाई पर है। इसमे सात शिलापट्ट है, जिनमे दो पर पद्मासन और पांच पर खडगासन मूर्तियाँ है। तीन पर लेख है। मंदिर पर शिखर है प्रवेशद्वार पर भव्य शिखर है। जीर्णोद्धार के समय यथावत मूर्ति लगा दी गई है।

• मंदिर नं 29:– यह पश्चिमाभिमुख है। सिरदल पर तीन तीर्थंकर मूर्तियां है। इसकी वेदी पर 6 शिलापट्ट है। इनमे से एक पर संवत् 1203 का लेख है। एक शिलाफलक पर चौबीसी है, और एक पर केवल भामंडल और सिद्धासन बना हुआ है।

• मंदिर नं 30:– यह पश्चिमाभिमुख है। मंडप 8 स्तंभों पर आधारित है। प्रवेशद्वार के ऊपर तीन तीर्थंकर मूर्तियां है। गर्भगृह में तीन वेदी बनी हुई है। इन पर 12 शिलापट्ट रखे हुए है। तीन पर लेख है। एक सिंहासन पर लेख खुदा हुआ है। इस पर कोई मूर्ति नहीं है।

• मंदिर नं 31:– यह दक्षिणाभिमुख है। प्रवेशद्वार के दोनों ओर गंगा यमुना का अंकन है। सिरदल पर वीणा पुस्तक धारिणी सरस्वती तथा शांतिनाथ की मूर्ति बनी हुई है। बायी ओर कोई देवी मूर्ति थी जो खंडित कर दी गई गर्भगृह की वेदी में एक शिलाफलक पर नेमिनाथ की मूर्ति है।

 

 

फोर्टस जैन मंदिरों के सुंदर दृश्य
फोर्टस जैन मंदिरों के सुंदर दृश्य

 

कुंजद्वार



यह द्वार पर्वत के पश्चिम की ओर है। और प्राचीन किले का मुख्य द्वार है। यह 19 फुट ऊंचा और दस फुट चौड़ा है। यह जीर्ण दशा में है। इस द्वार के दोनों और 5 फुट चौड़ी प्राचीन दीवार है। इसका तोरण भव्य और कलापूर्ण है। इस द्वार के दक्षिण में लगभग 100 गज की दूरी पर मुख्य सड़क और मंदिरों के बीच एक पक्का मार्ग बनाया गया है।

 

हाथी दरवाजा



देवगढ़ किले की पहली दीवार में पूर्व की और यह दरवाजा है। हाथियों का आवागमन इसी द्वार से होता था। इसलिए इस द्वार का नाम हाथी दरवाजा हो गया। द्वार के भीतर बायी ओर एक शिलाफलक 8 फुट की ऊचाई पर लगा हुआ है। इसमे उपाध्याय परमेष्ठी अंकित है। हाथ में ग्रंथ लिये हुए है किंतु वह कुछ खंडित हो गया है। इसके दोनो ओर अंजलिबद्ध साधु खड़े है। उनके हाथो में पीछी है उपध्याय के ऊपर पद्मासन में एक तथा उसके दोनो ओर खडगासन में एक एक तीर्थंकर प्रतिमा विराजमान है। किन्तु इसका मुंह खंडित है। इस प्रतिमा के कंधो पर जटाएँ बिखरी हुई है। श्रीवत्स और अष्ट प्रतिहार्य का अंकन बहुत भव्य है। इसके दोनों ओर एक एक पद्मासन तीर्थंकर मूर्ति है।


घाटियां



देवगढ़ में पर्वत के दक्षिण की ओर दो घाटियाँ है। इनमें से नाहर घाटी पहाडी की ऊची दीवार को काटकर बनाई गई है। इस घाटी में अनेक गुफाएं और शिलाओ पर अनेक देवकुलिकाएं बनी हुई है। यहा एक गुफा में संवत् 609 का एक शिलालेख मिला बताया जाता है। जो गुप्तकाल का प्रतीत होता है। यहा बेतवा नदी के तट पर उत्खनन में प्रागैतिहासिक काल के अस्थिपंजर प्राप्त हुए है। राज घाटी की गुफा में एक शिला लेख 1154 का है। इस को चंदेलवंशी राजा कीर्ति वर्मा के मंत्री वत्सराज ने उत्कीर्ण कराया था। और उसने अपने राजा के नाम पर इस स्थान का नाम कीर्तिगिरि रखा था।


अतिशय क्षेत्र



इस देवगढ़ जैन क्षेत्र के चमत्कारों के संबंध में भक्तजनों में अनेक प्रकार की किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। कुछ लोगो का विश्वास है क्षेत्र पर रात्रि के समय देव लोग पूजन के लिए आते है। वे आकर नृत्यगान पूर्वक पूजन करते है। कुछ ऐसे भी प्रत्यदर्शी भक्त लोग है जिन्होंने रात्रि के समय मंदिरों से नृत्य और गान की ध्वनि सुनी है। इसी प्रकार भगवान शांतिनाथ मनोकामना पूर्ण करते है। इसके अलावा भी अनेक प्रकार की किंवदंतियाँ यहा क्षेत्र के चमत्कारों को लेकर प्रचलित है। इस लिए यह क्षेत्र अतिशय क्षेत्र कहा जाता है।

 

दशावतार मंदिर

दशावतार मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। इससे पहले, मंदिर को पंचायतन मंदिर के रूप में जाना जाता था। यह सबसे पुराने पत्थर मंदिरों में से एक है जो आज भी जीवित है। मंदिर का निर्माण पत्थर और ईंट से किया गया था, जिसमें एक एकल पवित्र गर्भगृह था, जिसमें देवता के चित्र थे। हालांकि, माना जाता है कि मंदिर के गर्भगृह की मूर्ति कहीं और स्थानांतरित की गई है। मंदिर की भीतरी और बाहरी दीवारों पर भगवान विष्णु की मूर्तियां गढ़ी गई हैं। मंदिर में नक्काशीदार द्वार को सुशोभित करते हुए एक सर्प के आसन पर भगवान विष्णु की एक छवि देखी जा सकती है। मंदिर में भगवान विष्णु से जुड़ी कथाओं को प्रदर्शित करते हुए कई मूर्तियां हैं।

दशावतार मंदिर के सुंदर दृश्य
दशावतार मंदिर के सुंदर दृश्य



5 वीं शताब्दी के अंत में निर्मित दशावतार मंदिर देवगढ़ गुप्त वास्तुकला की अलंकृत और सुंदरता को दर्शाता है। इसे दशावतार मंदिर का नाम दिया गया है क्योंकि मंदिर भगवान विष्णु के दस अवतारों को प्रदर्शित करता है। गंगा और यमुना के चित्रों को नक्काशीदार द्वार पर देखा जा सकता है जो गर्भगृह की ओर जाता है। मंदिर की ओर और पीछे की दीवारें भगवान विष्णु के जीवन के कई पहलुओं से संबंधित नक्काशीदार पैनल प्रदर्शित करती हैं। प्लिंथ के ऊपर सीढ़ीदार तहखाने को मूर्तिकला पैनलों से सजाया गया है। गजेन्द्रमोक्ष पैनल की ओर की दीवारों के साथ तीन बड़े नक्काशीदार पैनल, नर नारायण तपस्या और अनन्तशायी विष्णु, वैष्णव पौराणिक कथाओं के दृश्यों को प्रदर्शित करते हैं।


5 वीं और 6 वीं शताब्दी में, दशावतार मंदिर देेेवगढ़ में पहली बार शिखर वास्तुकला की शुरुआत की गई थी। मंदिर का मुख पश्चिम में है, दक्षिण की ओर थोड़ा विचलन इस तरह से है कि यह सूर्य की किरणों को मंदिर में मुख्य मूर्ति पर गिरने में सक्षम बनाता है। नौ वर्गों के लेआउट में, दशावतार मंदिर देवगढ़ मध्य वर्ग में स्थित है। मंच के बाहर चारों सीढ़ियां मंदिर तक जाती हैं। मंदिर के लेआउट की व्याख्या उत्तर भारत के मंदिरों की पंचायतन शैली का प्रतिनिधित्व करने के लिए की गई है। मंदिर लगभग 45 फुट लंबा है। इस मंदिर में पाई गई एक अनोखी मूर्ति कृष्ण कथा को प्रदर्शित करती है जिसमें देवकी अपने पति वासुदेव को नए-नवेले कृष्ण को सौंपती है। इसे गुप्त काल की कला के सर्वश्रेष्ठ चित्रणों में से एक कहा जाता है।

 

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