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Touris place, religious place, history, and biography information in hindi

दार्जिलिंग ( एक यादगार सफ़र )

आफिस के काम का बोझ   शहर की भीड़ भाड़ और चिलचिलाती गर्मी से मन उब गया तो हमनें लम्बी यात्रा का मन बनाया और पूर्वी हिमालय की गोद में दार्जलिंग के लिए चल पड़े । पश्चिम बंगाल के उत्तरी छोर पर स्थित इस मनोरम स्थल तक पहुँचने के लिए दिल्ली से हमें गांहारी रेल मार्ग पर स्थित न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन पहुंचना था । न्यू जलपाईगुड़ी से हम सिलिगुड़ी पहुँचे । सिलिगुड़ी अपने आप में कोई पर्यटन स्थल तो नहीं है । लेकिन इसे कई पर्यटन स्थलों का प्रवेश द्वार कहा जाता है । यहाँ से दार्जलिंग के लिए टैक्सी जीप बस और टॉय ट्रेने जाती है । घुमावदार पहाडी मार्ग की यात्रा के लिए टॉय ट्रेन हमें सबसे अच्छा विकल्प लगा ओर सिलिगुड़ी जंक्शन से अगले दिन सुबह की पहली ट्रेन से हम दार्जिलिंग के लिए चल पड़े।

टॉय ट्रेन (खिलौना गाड़ी का सफ़र)

 

लगभग दस किलोमीटर का मैदानी रास्ता तय करने के बाद टॉय ट्रेन पर्वतीय मार्ग पर ब ढती है । देवदार, ताड और बांस आदि के पेड़ों से भरे इस मार्ग पर यह अनोखी ट्रेन ठुमक- ठुमक कर चल रही थी । लगभग 15 किमी प्रति घंटा की धीमी गति से चलती ट्रेन से पर्यटकों को प्राकति के मनोरम दृश्य देखने का भरपूर आनंद मिलता है । दार्जलिंग हिमालयन रेलवे की इस यात्रा में सबसे ज्यादा प्रसन्नता इस बात की होतीं है कि हम उस रेलगाड़ी से यात्रा कर रहे है । जिसे यूनेस्को से विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त है । मार्ग में तिनधरिया स्टेशन के पास टॉयट्रेन एक वृत्ताकार लूप से गुजरती है । प्राकृति की सुंदरता के दुर्लभ दृश्य यही से शुरू होते है । पहाड़ की ढलानों पर फैली हरियाली के बीच से होकर कई छोटे बड़े गांवों को पार करती ट्रेन आगे बढती रहती है । इसके साथ ही सड़क मार्ग भी चलता रहता है । कई स्थानों पर तो रेलवे लाइन और सड़क मार्ग एक दूसरे को काटती हुई चलती है । पूरे मार्ग पर 132 क्रासिंग है और सभी अनियंत्रित है । इसी कारण पर्यटकों को यहाँ के स्थानीय जीवन की झलक बराबर नज़र आती रहती है । कुर्सियांग पहुंच कर तो सब कुछ रेलवे लाइन के एकदम निकट लगने लगता है । सैलानियों को यह देखकर आश्चर्य होता है कि रेलगाड़ी मानों दुकानों और घरों को एकदम छुकर निकल रही हो । यहाँ के लोगों को इस सबसे असुविधा नहीं होती क्योंकि रेलगाड़ी की गति बहुत कम होती है । चलती गाड़ी में उतरना चढना इन लोगों के लिए शगल नहीं बल्कि रूटीन है । इस अनोखी खिलौना रेलगाड़ी की शुरुआत 122 वर्ष पूर्व हुई थी । पहले इस पूरे मार्ग पर भाप इंजन का प्रयोग होता था । अब पुराने पड गये भाप इंजनो की सुरक्षा तथा रेलपथ की ऐतिहासिकता को बरकरार रखने के उद्देश्य से इस मार्ग पर विकल्प के रूप में डीजल इंजन का प्रयोग होता है ।

गहरी घाटियों दूर तक फैले चाय बागान कृत्रिम फूलों और छोटी छोटी सुरंगों को पार करती जब यह ट्रेन धूम स्टेशन पहुचती है तो पर्यटक रोमांचित हो उठते है । इस रोमांच का एक कारण यह है कि 7408 फुट की उचाई पर स्थित यह स्टेशन संसार के नैरोगेज रेलपथ का दूसरा सबसे उंचा स्टेशन है । दूसरा कारण है धूम के निकट स्थित बतासिया लूप । इस लूप का चक्कर काटते समय ट्रेन की खिड़की से दिखते मनोरम दृश्य तो जैसे सम्मोहित कर लेते है । धूम के बाद दार्जिलिंग की ओर बढते हुए ट्रेन नीचे की ओर बढती है क्योंकि दार्जिलिंग की उँचाई धूम से कम है । चारो ओर प्राकति के मनोहारी दृश्य को देखते हुए सफर के दोरान थकान की ओर ध्यान नहीं गया किन्तु दार्जिलिंग स्टेशन पर उतरते ही हमें थकान का अहसास हुआ  । होटल स्टेशन से अधिक दूर न था इसलिए तुरंत सामान उठाकर हम होटल आ गए  । अगले दिन साइट सीन तैयार करने के अलावा हमनें विश्राम करना उचित समझा।
बागान दार्जिलिंग

होटल मैनेजर ने हमारे लिए जीप से स्थानीय टूर बुक करा दिया था । जीप में हमारे साथ दो युगल ओर भी थे । कुछ देर में जीप मुख्य मार्ग पर आ गई जहाँ तक नजर जाती हमें चाय बागान ही बागान नज़र आते इस बागान को निकट से देखने का अवसर तब मिला जब ड्राइवर ने जीप हैप्पी वैली टी स्टेट पर रोकी । यहाँ हमनें देखा की चाय की पत्तियाँ कैसे चुनी जाती है तीन फुट उँचे झाडिनुमा पौधों के बीच काम करते स्त्री- पुरूष किस तेजी से सही पत्ती चुनकर पीठ पर लटकी टोकरी मे डालते है । चाय के ये बागान जहाँ दार्जिलिंग की पहाड़ी सोन्दर्य में गहरा हरा रंग भरते है वहीं यहाँ की अर्थव्यवस्था में भी महत्वपूर्ण योगदान करते है । इन पहाड़ों से जंगलों को हटाकर 1840 में यहाँ चाय की खेती शुरू की गयी थी। आज यहाँ की उपज दार्जिलिंग चाय दुनिया भर में इतनी प्रसिद्ध है कि इसे पूरब की शेम्पेन की उपमा दी जाती हैं । इस क्षेत्र में छोटे बड़े 78 चाय बागान है । इनमे चाय की कई किस्में पैदा की जाती है । कुर्सियांग के निकट कैसल्टन टी स्टेट की चाय तो इतनी उच्च गुणवत्ता की होतीं है कि अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में उसकी कीमत दस हज़ार रूपये प्रति किलोग्राम भी छू चुकी है ।

हिमालय दर्शन (छोटा हिमालय)

हैप्पी वैली टी स्टेट से निकलकर हम हिमालय पर्वतरोहण संस्थान पहुचे । हिमालय के शिखरों को छू लेने की चाह रखने वालों को यहाँ पर्वत रोहण का प्रशिक्षण दिया जाता है । इसकी स्थापना एवरेस्ट पर पहली बार फतह के बाद की गई थी । शेरपा लेन सिंह लम्बे अरसे तक इस संस्थान के निदेशक रहे । संस्थान में एक महत्वपूर्ण संग्रहालय भी है जिसमें हिमालय के दर्शन आपको यही हो जाते है । इसमें पर्वत रोहण के दोरान उपयोग में आने वाले कई नये पुराने उपकरण पोशाकें कई पर्वतरोहियों की यादगार वस्तुएं और रोमांचित चित्र प्रदर्शित किए गए है । एवरेस्ट विजय से पूर्व के प्रयासों का इतिहास तथा वृहत्तर हिमालय का सुंदर माडल भी यहाँ देखने को मिलता है । इसके साथ ही नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम है । इस अनूठे संग्रहालय में हिमालय क्षेत्र में पाए जाने वाले करीब 4300 प्राणियों का इतिहास क्रम दर्ज है । हिमालय क्षेत्र के पशु पक्षियों की सैकड़ों प्रजातियों के नमूनो के अलावा खास अथस्क और चट्टानों के नमूने भी यहाँ पर्यटकों को आकर्षित करते है । इसके निकट ही स्थित है पझजा नायडू हिमालयन चिड़िया घर जो बच्चों को ही नहीं बडों को भी बहुत पसंद आता है । पर्वतों पर रहने वाले कई दुर्लभ प्राणी यहाँ देखने को मिलते है । इनमें खास है – लाल पाडा , साइबेरियन टाइगर, स्नो ल्योपार्ड, हिमालयन काला भालू , इनके साथ ही पहाड़ी उल्लू याक हिरण तथा कई तरह् के पहाड़ी पक्षी भी यहाँ देखें जा सकते है।

जॉय राइड का आनंद

हमारा अगला दर्शनीय स्थल था उत्तर भारत का पहला रच्चु मार्ग – रंगीत वैली रोपवे । जिस समय हम यहाँ पहुचे काफ़ी भीड़ थी । यहाँ मोटे तारो पर झूलती ट्राली में बैठकर पर्यटक नीचे सिंगला बाज़ार तक जाकर उपर आते है । रंगीत घाटी के ढलानों के निकट मंडराते आवारा बादलो को छूते हुए नीचे जाने और आने का अलग ही रोमांचक अनुभव होता है । रंगीत वैली रोपवे की जॉय राइड का आनंद लेने के बाद तिब्बत शरणार्थी सहायता केंद्र पहुचे । तिब्बत पूनर्वास के लिए 1959 में स्थापित किए गये इस केंद्र पर हमनें देखा कि किस तरह इन शरणार्थियों ने मेहनत और लगन के बल पर स्वंय को स्वावलंबी बनाया उनके द्वारा बनाएं गए ऊनी कपड़े गलीचे हाथ की कारागरी वाली लकड़ी की चीजें ओर ज्वेलरी आदि यहाँ आने वाले पर्यटक जरूर खरीदना चाहते है । दूनिया का सबसे उँचा ओर सबसे छोटा लेबांग रेसकोर्स भी दार्जिलिंग में ही है । यहाँ शरद व बसंत ऋतु में घुड़दौड़ का आयोजन भी किया जाता है । लॉयड वनस्पति उधान पर्वतीय वनस्पतियों का भंडार है । लगभग 40 एकड में फैले इस उधान में पहाड़ी पेड पौधों फूल संग्रह पर्यट को को मुग्ध कर देता है यहाँ की ग्रीन हाउस भी देखने  योग्य है । आस – पास की जगहो की घुमक्कड़ी के बाद हम लोग वापस होटल आ गये।

 

 

 

ताजमहल का इतिहास

सूर्य नमस्कार

अगले दिन बहुत जल्दी उठकर हमें तैयार होना पड़ा क्योंकि मुंह अंधेरे ही हमें दार्जिलिंग से 13 किमी दूर टाइगर हिल्स पहुचना था । समुद्र तल से 8482 फु ट की उचाई पर स्थित टाइगर हिल्स सूर्योदय के अदभुत नजारे के लिए प्रसिद्ध है । सुबह चार बजे ही जीप हमारे होटल के सामने आ पहुची । ठंड से ठिठुरते हुए हम टाइगर हिल्स के लिए निकल पड़े । वहाँ दूर तक टैक्सियों जीप की कतार लगी थी । वहाँ पहुचे पर्यटकों का हुजूम देखकर लगा जैसे पूरा देश ही सूर्य के स्वागत में टाइगर हिल्स आ गया है   । ड्राइवर ने हमें बताया की यहाँ रोज ही ऐसी भीड़ रहती हैं । हांलाकि कभी कभी मौसम खराब होने पर सैलानियों को निराश लौटना पड़ता है । यह हमारा सौभाग्य था कि उस दिन मौसम साफ था । कुछ देर बाद ही आकाश से कालिमा छटने लगी और उजाला बढने लगा  । सभी बैचेनी से उस पल की प्रतिक्षा करने लगे जब बाल अरूण के दर्शन होगे  कुछ क्षण बाद ही नारंगी गोले का किनारा नज़र आने लगा ओर देखते ही देखते उदय होता सूर्य अपनी नारंगी छटा बिखेरने लगा । इसका प्रभाव सामने खड़ी पर्वत श्रंखला पर साफ दिख रहा था । कंचनजंघा और अन्य हिम शिखरों पर सूर्य की पहली किरण ने अपना नारंगी रंग फैला दिया जो कुछ क्षण बाद ही सुनहरे रंग में परिवर्तित हो गया सूर्य की किरणे कुछ तेज हुई तो ऐ सा लगने लगा कि पर्वतों पर चांदी की वर्षा हो गयी हो । पहाड़ों की ऐसी ही खूबसूरती को निहारने के लिए हम काफ़ी देर तक रूके वही हमें पता चला की यदि मौसम साफ होता है तो यहाँ से एवरेस्ट की चोटी के भी दर्शन हो जाते है । हम तो बस कंचनजंघा के दर्शन ही कर सके जिसे स्थानीय लोग देवी के समान मानते है  टाइगर हिल्स  के निकट ही एक टूरिस्ट लॉज है

संग्रह पांडुलिपियाँ , बौद्ध मठ

टईगर हिल्स से वापस आते हुए हमनें आकर्षक सेचल झील भी देखी यह एक पिकनिक स्पॉट है । वहां से हम मॉनेस्ट्री देखने पहुचे । यह दार्जिलिंग का एक प्रसिद्ध और सुंदर बौद्ध मठ है । यहाँ स्थापित मैत्रयी बुद्ध की उंची सुनहरी प्रतिमा अत्यंत मनभावन है । इस प्राचीन मठ में कई पांडुलिपियों और बौद्ध ग्रंथों का संग्रह है । दुनिया भर से तमाम श्रद्धालु और शौधार्थी खास तौर से इसे ही देखने के लिये दार्जिलिंग आते है । मठ से कुछ ही दूरी पर बतासिया लूप में युद्ध स्मारक है । यह स्मारक शहीद सैनिकों की याद में बनवाया गया था । मार्ग में हमनें प्रसिद्ध आर्ट गैलरी देखी और धीरधाम मंदिर के दर्शन भी किए ।

मालरोड़ ( खानपान और शोपिंग )

दोपहर बाद हम मालरोड़ चौरास्ता की रौनक का लुफ्त उठाने चल दिये । रास्ते में लाडेन सा रोड और नेहरू मार्ग पर कई होटल रेस्टोरेंट और बार है यहाँ इंडियन चाइनीज और कांटिनेंटल भोजन के अलावा सैलानी तिब्बती भोजन का स्वाद ले सकते है । रास्ते में अच्छा खासा बाज़ार है । चौरास्ता पर भी कुछ अच्छे शोरूम रेस्टोरेंट और फास्ट फूड़ पार्लर है । यही एक मार्ग मालरोड़ कहलाता है । दार्जिलिंग का चौरास्ता शिमला के स्केंडल प्वाइंट के समान है । देश – विदेश से आने वाले पर्यटको के कारण वहां हर समय चहल पहल बनी रहती है । यहाँ एक छोटा सा उधान भी है । मालरोड़ पर पर्यटक घुड़सवारी का भी आनंद ले सकते है । अगर आपको पैदल चलने का शौक है तो यहाँ से कुछ ही दूरी पर स्थित भोटिया बस्ती मॉनेस्ट्री ,सैट एसाइड प्वाइंट , अॉब्जर्वटरी हिल्स और काली मंदिर भी देख सकते है यही पिस के बाजारों में अच्छे शोरूम या दुकानों पर शोपिंग का शौक भी पूरा किया जा सकता है । पश्चिम बंगाल की मंजूषा एम्पोरियम भी नेहरू मार्ग पर है । हाथ से बनायी गई यहाँ की अनुपम कलात्मक वस्तुओं और उनके बहुरंगी परंपरिक डिज़ाइन से मिली जुली पर्वतीय संस्कृति की झलक साफ नज़र आती है जिन्हें आप खरीदें बिना नहीं रह सकते । इनमें खास है – आभूषण, दीवालगीर, फायर स्क्रीन, भूटानी चित्र, तिब्बती मुखोटे, थैले, बांस की सुंदर कारागरी की वस्तुएं लकड़ी के आकर्षण पार्टिशन आदि । इनके अलावा बुने हुए ऊनी कपड़े और कालीन आदि यहाँ मिलते है । महात्मा बुद्ध के जीवन को चित्रत करती थंका चित्रकारी भी सैलानियों को बहुत पसंद आती है ।

मिरिक ( धुंध को चीरते हुए)

मिरिक और कलिम्पोंग देखें बगैर दार्जिलिंग का सफर अधुरा सा लगता है । अगली सुबह जब हम होटल से बाहर निकले तो हर तरफ कुहासा छाया हुआ था । साढ़े छ बजे जब कुहासा छंटने लगा तब हमारी बस मिरिक के लिए चली । रास्ते भर सडक के दोनों ओर कभी चाय बागान नजर आते कभी हरे भरे जंगल करीब ढाई घंटे में हमारी बस मिरिक पहुँच गई । ठहरने की व्यवस्था हमनें पहले ही टूरिस्ट लॉज में कर रखी थी । घुमावदार रास्तों की थकान मिटाने के बाद हम अपनी स्मृतियों और कैमरे में मिरिक का सौंदर्य कैद करने के लिए निकल पड़े । समुद्र तल से 5800 फुट की उचाई पर बसा यह छोटा सा पर्यटन स्थल करीब साढे तीन सौ फुट के दायरे में फैला है । हर तरफ पहाड़ों से घीरी छोटी सी मनोरम घाटी में स्थित मिरिक भीड़भाड़ से अलग एक शांतिपूर्ण सैरगाह है । घूमने के लिए यहाँ किसी वाहन की भी जरूरत नहीं होती जहाँ चाहे पैदल ही  निकल जायें प्राकति आपके स्वागत में बांहें पसारे नजर आयेगी । यहाँ का मुख्य आकषर्ण है । झिलमिल सौंदर्य वाली मिरिक झील इसकी सुंदरता का आलम यह है कि जिस ओर से भी देखें यह अलग रूप में ही नज़र आयेगी । इसलिए पर्यटक झील के किनारे बनें तीन किमी से भी लम्बे पैदल रास्ते पर चहलकदमी करते हुए इसे हर दिशा से निहारते है । झील पर बनें पुल से झील में पर्वतो और पेडों का प्रतिबिंब नजर आता है । यह प्रतिबिंब यहाँ आने वाले पर्यटकों का मन मोह लेता है । बारहों महीने झर-झर करते झरनों और बरसाती पानी से लबालब भरी झील में सैलानी बोटिंग का भी भरपुर आंनद लेतें है ।
दूसरा दिन भी हमनें मिरिक में ही बिताया । कुहासा और ठंड के कारण हम काफी देर से लॉज के बाहर निकले यहाँ आसपास की पहाडियों पर चाय के बागान के अलावा संतरों के बाग भी है । इन बागों में संतरों से लदे पेड़ देखने के लिए दो किमी दूर पैदल या घोड़ों से जाया जा सकता है । यह एक संतरा उत्पादक क्षेत्र भी है । यहाँ से बंगाल और आसपास के राज्यों में संतरा भेजा जाता है । आसपास के कुछ इलाकों में यहाँ इलायची की खेती भी की जाती है । यहाँ भी कुछ व्यू प्वाइंट है जहाँ से पर्वतीय और मैदानी इलाकों के खूबसूरत नजारे देखने को मिलते है । देवी स्थान पर देवी मंदिर के साथ भगवान शिव और हनुमान जी के मंदिर भी दर्शनीय है । वास्तव में शहर की गहमागहमी से परे कुछ दिन गुजारने  हो तो मिरिक जैसी शांत और रमणीक सैरगाह शायद ही कोई और हो।

कलिम्पोंग( फूलों की घाटी)

मिरिक से कलिम्पोंग तक का मनोहारी सफर हमनें टैक्सी से किया । रास्ते में तिस्ता नदी की खुबसूरती ने हमें बहुत प्रभावित किया । ड्राइवर ने बताया की तिस्ता के तट पर जनवरी में बैनी मेले के अवसर पर बहुत पर्यटक आते है । उस समय लेपचा और भोटिया नववर्ष मनाया जाता है । इसके बाद फरवरी में तिब्बती नववर्ष पर भी इस क्षेत्र में उत्सवी माहौल रहता है । इनके अलावा बुद्ध पूणिमा, दुर्गा पूजा और दिवाली भी यहाँ धूमधाम से मनायी जाती है । तिस्ता ब्रिज पार करके टैक्सी फिर उपर की ओर  बढने लगी। रास्ते में एक जगह  टैक्सी रोककर ड्राइवर ने हमें एक कुदरती नजारा देखने को कहा । उस व्यू प्वाइंट से हमें तिस्ता और रंगीत नदियों के संगम का अनुभव दृश्य देखने को मिला । विभिन्न दिशाओं से पहाड़ों से उतरती ये नदियाँ एक दूसरे में आ समाती है । यह दृश्य अत्यंत मनोहारी है । वहां से कुछ देर बाद ही हम कलिम्पोंग पहुँच गये । यहाँ एक अच्छा सा होटल देख हमनें उसमें चैक इन किया । 4100 फुट की उचाई पर बसा यह शहर मिरिक जैसा शांत तो नहीं है लेकिन दार्जिलिंग जैसी भीड़ भी यहाँ नहीं है । इस छोटे से शहर में पर्यटकों को सिक्किमी, भूटानी और तिब्बती संस्कृति का मिला जुला असर देखने को मिलता है । किसी जमाने में यह सिक्किम का ही हिस्सा था । तब यह तिब्बत से सिक्किम के वयापार का बड़ा केंद्र था । कलिम्पोंग में  साइट सीन अधिक नहीं है।

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