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ताजमहल का इतिहास – आगरा का इतिहास – ताजमहल के 10 रहस्य

प्रिय पाठको अपनी इस पोस्ट में हम भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के एक ऐसे शहर की यात्रा करेगें जिसको मुहब्बत का शहर के नाम से भी लोग पुकारते है जहां मुहब्बत का एक ऐसा नयाब तौफा है जो पूरे विश्व में कही ओर देखने को नही मिलता है और ना ही दौबारा बनाया जा सकता है। जिसको दुनिया के आठ अजुबो में भी शामिल किया गया है। और हकीकत में ही यह कला का बेजोड नमुना है। अब तो आप समझ ही गए होगें की हम किसकी बात कर रहे है। जी हां! हम बात कर रहे है उत्तर प्रदेश के खुबसूरत शहर आगरा की और इस खुबसूरत शहर में स्थित मौहब्बत की उस खुबसूरत और नयाब इमारत ताजमहल की। जिसको मुगल वंश के शासक शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज महल की याद में उसकी मृत्यु के उपरांत बनवाया था। तो अपनी इस पोस्ट में हम ताजमहल का इतिहास और आगरा का इतिहास के साथ साथ जानेगें कि :-

  • ताजमहल का निर्माण कब हुआ?
  • ताजमहल का निर्माण किसने करवाया?
  • ताजमहल का निर्माण क्यो करवाया गया?
  • ताजमहल को किस मिस्त्री या कारीगर ने वनाया?
  • ताजमहल की लागत?
  • ताजमहल की निर्माण शैली क्या है?
  • ताजमल का रहस्य क्या है?
  • ताजमहल का सच क्या है?
  • ताजमहल के खुलने का समय
  • ताजमहल का शुल्क?
  • ताजमहल के विवाद के बारे में
  • आगरा का प्राचीन इतिहास
  • आगरा को किसने बसाया
  • आगरा के दर्शनीय स्थल
  • आगरा के आस पास के दर्शनीय स्थल
  • ताजमहल का इतिहास

इन जैसे बहुत से सवाल आपके जहन में घुम रहे होगें। अपनी इस पोस्ट में हम अपने इन सभी सवालो के जवाव जानेगें और साथ ही साथ इस खुबसूरत इमारत और शहर की अन्य ऐतिहासिक इमारतो की सैर करेगें और उनके बारे में विस्तार से जानेगें। आगरा शहर की यात्रा पर जाने से पहले हम आगरा का इतिहास और ताजमहल का इतिहास जान लेते है। उसके बाद हम इन खुबससूरत इमारतो के दर्शन करेगें।

ताजमहल का इतिहास
ताजमहल का सुंदर दृश्य

 आगरा का इतिहास हिन्दी में – आगरा का प्राचीन इतिहास

आगरा एक ऐतिहासिक नगर है। इतिहास में आगरा का प्रथम उल्लेख महाभारत के समय से माना जाता है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में यहा एक बहुत बडा जंगल था। जिसे राजा उग्रसेन जो कंस के पिता थे, ने साफ करवाकर इस नगर की नींंव रखी थी। और अपने नाम पर इस नगर का नाम उग्रसेन रखा था। बाद में इसे अग्रबाण या अग्रवन के नाम से जाना जाता था। कुछ लोगो का यह भी मानना है की पहले इसे आर्यगृह के नाम से भी पुकारते थे। और बाद में यह आगरा के नाम से जाना जाने लगा। यह भी कहा जाता है की इस नगर को सबसे पहले आगरा नाम क्लॉडियस टॉलमी ने दिया था जो एक भूगोलविद थे और अपने विश्व भ्रमण के दौरान यहा आए थे।

यह तो आगरा का प्राचीन इतिहास था जो पूर्ण रूप से प्रमाणिक तो नही है कुछ तत्थ और अनुमानो के आधार पर है। आगरा के इतिहास के प्रामाणिक तत्थ मुगलकाल से मिलते है। प्रमाणिक तत्थो के आधार पर आगरा की नींव लोदी वंश के दुसरे शासक सिकंदर शाह लोदी ने 1504 ई° में रखी थी। सिकंदर शाह लोदी दिल्ली के सुल्तान बहलुल खान लोदी का पुत्र था। 1489 में अपने पिता की मृत्यु के बाद वह लोदी वंश का दूसरा शासक बना। और 1489 से 1517 तक वह दिल्ली का सुल्तान बना रहा। लोदी ने ग्वालियर का किला हासिल करने की कोशिस की और उसने पांच बार ग्वालियर पर आक्रमण भी किए। लेकिन हर बार उसे ग्वालियर के महाराज मानसिह से विफलता ही मिली। लेकिन ग्वालियर को हासिल करने की उसकी महत्वकाक्षां इतनी अधिक थी की उसने ग्वालियर से पहले छावनी बनाने का निर्णय लिया और वर्तमान में जिस जगह आज आगरा यहा छावनी बनाने का निर्णय लिया गया। उसने इस स्थान को दिल्ली के बाद भारत की दूसरी राजधानी के तौर पर विकसित करना शुरू कर दिया। क्योकि दिल्ली से ग्वालियर जाने में बहुत समय लगता था। सिकंदर लोदी के समय में इस स्थान को भारत का शिराज के नाम से जाना जाने लगा था।

कुछ समय बाद सिकंदर लोदी ने एक बार फिर ग्वालियर पर आक्रमण किया लेकिन इस बार भी उसे हार का सामना करना पडा। 1517 में सिकंदर लोदी की मृत्यु हो गयी। और दिल्ली की सलतनत सिकंदर लोदी के पुत्र इब्राहिम लोदी के पास आ गई। इब्राहिम लोदी ने 1517 से 1526 तक दिल्ली पर राज्य किया। पिता की मृत्यु के बाद इब्रहिम लोदी ने भी ग्वालियर पर कब्जा करना चाहा और जिसमे वो कामयाब भी रहा। और बिना किसी युद्ध के राजा मानसिंह ने इब्राहिम लोदी की अधिनता स्वीकार कर ली। इब्राहिम लोदी की मृत्यु के बाद भारत में मुगलो का शासन शुरू हुआ। और आगरा मुगलो को भी खुब भाया और उन्होने आगरा को अपनी राजधानी बनाया। और इस शहर में कई ऐतिहासिक इमारतो का निर्माण कराया। कुछ समय यह शहर हिन्दू राजाओ के अधिन भी रहा लेकिन मुगलो ने फिर इसे हासिल कर लिया।

1526 से 1571 तक आगरा मुगलो की राजधानी रहा। 1571 से 1585 तक मुगलो ने फतेहपुर सिकरी को अपनी राजधानी बनाया और वहा ऐतिहासिक किले का निर्माण कराया। उसके बाद 1585 से 1598 तक मुगलो ने लाहौर को अपनी राजधानी बनाया। लाहौर के बाद एक बार फिर आगरा को 1598 से 1648 तक मुगलो की राजधानी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। 1648 के बाद मुगलो ने अपनी राजधानी दिल्ली बनाई जो 1857 मुगल सम्राज्य के अत तक रही। इसके बाद भारत में अंग्रेजो का शासन हो गया। उसके बाद अंग्रेजो द्वारा भी इस शहर में एक प्रेसीडेंसी बनवायी गई और 1947 के बाद यह शहर भारत के संविधान के अधिन हो गया।

अब तक के अपने लेख में हमने आगरा शहर का इतिहास जाना अब हम अपने लेख के अगले भाग में ताजमहल के इतिहास और ताजमह के बनने की कहानी ( दांस्ता ) व शाहजहां और मुमताज महल की मुहब्बत की कहानी के बारे में जानेगें

ताजमहल का इतिहास

ताजमहल का इतिहास:- वैसे तो ताजमहल के निर्माण का कार्य तो 1631 में शुरू हुआ था। परंतु इसके इतिहास की शुरूआत माना जाए तो मुगलवंश के पांचवे शासक शाहजहां से शुरू होती है। जिसने इस अनमोल नगीने का निर्माण कराया था। शाहजहां को निर्माताओ का राजकुमार भी कहा जाता है। जिसने अपने शासनकाल में अनेक इमारतो का निर्माण करवाया। शाहजहां के द्वारा बनाई गई इमारतो में दिल्ली का लाल किला, दीवाने आम, दीवाने खास, दिल्ली की जामा मस्जिद, आगरा की मोती मस्जिद, आगरा का ताजमहल आदि प्रमुख है। इससे यह साबित होता है की शाहजहां को भव्य निर्माण कराने का बहुत शौक था।

ताजमहल का इतिहास

शाहजहां का विवाह 20 वर्ष की आयु मे नूरजहां के भाई आसफ खां की पुत्री आरजुमन्द बानो से सन् 1611 ई° में हुआ था। जो बाद में मुमताज महल के नाम से जानी जाने लगी। मुमताज महल के बाद शाहजहां की और भी पत्निया हुई। परंतु शाहजहां अन्य पत्नियो के मुकाबले मुमताज महल को अधिक प्यार करते थे। शाहजहां ने दूसरी पत्नियो के मुकाबले मुमताज महल को ज्यादा अधिकार भी दे रखे थे। शाहजहां मुमताज महल से बेइंतहा मौहब्बत करने लगे थे।

ताजमहल का इतिहास

मुमताज महल की मृत्यु 1631 में अपने चौदहवे बच्चे को जन्म देते समय हो गई। मुमताज महल के शव को उस समय शाहजहां के चाचा दानियाल द्वारा तापी नदी के तट पर जैनाबाद गार्डन में दफनाया गया था। मुमताज की मृत्यु का शाहजहा को काफी दुख हुआ। वह एकांत में रहने लगे। शाहजहां बुरहानपुर के पीछे ही अपने सैन्य दल के साथ रहने लगे और वही रहते हुए उन्होने मुमताज महल कि याद में एक मकबरा बनाने की योजना बनाई। और फिर दिसंबर 1631 को मुमताज महल के शव को जैनाबाद की कब्र से निकाल कर एक सोने से बने ताबूत में रखकर यमुना नदी के तट पर एक छोटे से घर में रखा गया। जब मकबरा तैयार हो गया तो उसमे मुमताज महल के शव को दफनाया गया। और इसका नाम मुमताज महल रखा गया जो आगे चलकर ताजमहल के नाम से पुरी दुनिया में जाना जाने लगा। जो आज भी अपनी मुहब्बत की निशानी, सुंदरता और स्थापत्य कला का लौहा सारी दुनिया से मनवा रहा है।

ताजमहल का इतिहास
ताजमहल का सुंदर दृश्य

प्रिय पाठको अब तक अपने इस लेख में हमने आगरा के इतिहास और ताजमहल का इतिहास व ताजमहल से जुडी उस मुहब्बत की कहानी के बारे में जाना जिसकी वजह से दुनिया का यह आठवा अजुबा आज हमारे देश भारत की शान-ओ-शौकत में चार चांद लगा रहा है। अपने इस लेख को आगे बढाते हुए अब हम जानेगे कि ताजमहल का निर्माण कैसे हुआ? और साथ ही साथ इसकी स्थापत्य शैली के बारे में भी जानेगें

ताजमहल का निर्माण कैसे हुआ

डिजाइनर और वास्तुकार

ताजमहल का इतिहास और ताजमहल की मुहब्बत की दांस्ता जितनी खुबसूरत और रोचक है। उतनी ही रोचक ताजमहल के बनने की की दास्तांं है। 1631 में इस भव्य इमारत के बनाने की योजना बनाई गई थी। सर्वप्रथम इसके आर्किटेक्स, डिजाइन और पर्यवेक्षण के लिए एक टीम बनाई गई। जिसमे शिराज (इरान) के अमानत खान जो मुख्य सुलेखक थे। दिल्ली के चिरंजीलाल जो किमती पत्थरो के जानकार और मुख्य सजावटी मूर्तिकार थे। मुहम्मद हनीफ राजगारो के मुख्य पर्यवेक्षक थे और अब्दुल करीम मैमूर खान और मकरामत खान निर्माण स्थल पर दैनिक निर्माण के आर्थिक प्रबंधक थे। और इस कमेटी के मुख्य अधिक्षक उस्ताद खान लाहौरी को नियुक्त किया गया। कहते है कि ताजमहल का नक्शा खुद शाजहां ने बनाया था (यह अगल बात है कि इसके लिए उसने उस समय के इंजिनिंयरो, वास्तुकारो, शिल्पकारो की मदद ली हो। कुछ इतिहिसकार मानते है कि नक्सा बनाने के लिए नवीस उस्ताद इंशा की मदद मुख्य रूप में ली गई थी ) ताजमहल के लिए जगह का चुनाव भी खुद शाहजहां ने ही किया था। जगह का चुनाव यमुना नदी के तट पर किया गया ताकि आगरा के किले से जब भी शाहजहां को मुमताज की याद आये तो वह किले से ही ताजमहल का दिदार कर सके। जिस स्थान का चयन किया गया वह जगह आमेर के राजा की थी जिनसे शाहजहां वह जगहा खरीदी और बदले में आमेर के राजा को उस जमीन के टुकडे से चार गुना ज्यादा जमीन दी गई थी। मुहब्बत की इस विशाल इमारत को बनाने के लिए 20 हजार मजदूरो और चुन चुन कर बेहतरीन राजगीरो को उत्तर भारत से भर्ती किया क्या। इन मजदूरो और कामगारो के रहने के मुमताजाबाद बसाया गया। भारी समानो और पत्थरो के बडे बडे बलॉक को ढोने के लिए 1000 हाथियो और बैलो को लगाया गया था। 20-30 बैलो वाली गाडियो से बडे बडे पत्थरो को लाया जाता था। ताजमहल मे जडे हीरे रत्न व किमती व मूल्यवान पत्थरो को विदेशो से मगंवाया गया था। ऐसा नही है की ताजमहल यूहीं बनकर तैयार हो गया यह एक बहुत बडा प्रोजैक्ट था जिस पर पूरे तरिके व युद्ध स्तर पर कार्य किया गया था। जिसकी आर्थिक देखरेख के लिए एक कोषाध्यकक्ष भी नियुक्त किया गया था। ताजमहल को बनाने में उस समय के चार करोड, चौरासी लाख, पैंसठ हजार एक सौ छियासठ रूपए की लागत आई थी ( 48465166)।

अब तक के अपने इस लेख में हमने आगरा का इतिहास, ताजमहल का इतिहास, और इस खुबसूरत इमारत में अपना योगदान देने वालो के बारे में भी जाना चलिए अब इस मुहब्बत की यादगार और ऐतिहासिक इमारत की सैर यानि ताजमहल दर्शन करते है।

ताजमहल दर्शन – ताजमहल का इतिहास

ताजमहल कैसे पहुंचे

ताजमहल दर्शन के लिए सबसे पहले ताजमहल पहुंचते है। आगरा भारत का एक प्रमुख शहर है। इसलिए हवाई मार्ग हो या रेल मार्ग हो या फिर सडक मार्ग। आगरा भारत वर्ष के सभी प्रमुख शहरो से सभी मार्ग द्वारा भंलिभांति जुडा है। अगर आप हवाई मार्ग द्वारा आगरा जा रहे है तो आगरा का पंडित दीनदयाल उपध्याय हवाई अड्डा ताज महल से 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां से आप आसानी से टैक्सी या आटो द्वारा आसानी से ताजमहल पहुंच सकते है। महानगर होने के नाते यहा काफी ट्रेफिक रहता है। जिसके कारण आपको आगरा एयर पोर्ट से ताजमहल पहुंचने में लगभग 40 मिनट लग सकते है अगर ट्रेफिक ना हो तो यह मार्ग सिर्फ 20-25 मिनट का है।

यदि आप रेल मार्ग द्वारा आगरा जा रहे है तो आगरा फोर्ट रेलवे स्टेशन से ताजमहल की दूरी लगभग 2.5 किलोमीटर है। रेलवे स्टेशन से ताजमहल के लिए आटो और रिक्शा वालो की काफी भीड लगी रहती है। अगर आपके पास भारी लगेज नही है तो आप आगरा के किले का बाहरी भाग के दर्शन करते हुए किले के सामने से होते हुए शिवाजी चौक से ताजमहल पहुंच सकते है। शिवाजी चौक से ताजमहल का सेप्रेट रास्ता गया है जो पश्चिमी गेट पर जाता है। कार, टैक्सी या आटो से आने वाले यात्री भी इसी मार्ग से जाते है। इसी सेपरेट मार्ग पर कुछ दूरी पर ताजमह कार पार्किग है।

अगर आप कार द्वारा दिल्ली से आगरा जा रहे है तो नोयडा आगरा एक्सप्रेसवे से जा सकते है। यह सुविधाजनक व फास्टेट रूट है। इसके आलावा आप दिल्ली से मथुरा होते हुए पुराने हाइवे से भी आगरा पहुंच सकते है।

ताजमहल कार पार्किग से ताजमहल की दूरी लगभग 700-800 मीटर है। आप चाहे एयर पोर्ट से टैक्सी से जाएं या रेलवे स्टेशन से आटो से जाएं या फिर अपनी कार से जाएं पहुंचना आपको कार पार्किग में ही है। कार पार्किंग पर पहुंचते ही आपको ऊंट गाडी और बैट्री गाडी वाले घेर लेगें। क्योकि कार पार्किंग से ताजमहल के बीच की इस दूरी में बैट्री गाडयां व ऊंट गाडियां चलती है। जो बीस से तीस रूपये प्रति सवारी लेते है। कार पार्किग से आगे किसी भी तरह के प्राइवेट वाहनो के जाने की अनुमति होती है। आप कार पार्किग से ताजमहल गेट तक पैदल भी जा सकते है। 700 मीटर की दूरी कोई ज्यादा नही होती है।

ताजमहल का इतिहास
ताजमहल में आपका दोस्त

ताजमहल के अंदर क्या क्या ले जा सकते है?

मार्ग के रास्ते में स्थित अमानती घर में आप अपना सामान रख सकते है। क्योकि ताजमहल के अंदर किसी भी प्रकार का अटेची, बेग ( हैंड बेग को छोडकर) किसी भी तरह का खाने पीने का सामान खाना, बिस्कुट, चिपस, पान, बीडी, सिगरेट ( पानी की बोतल को छोडकर) किसी भी तरह का हथियार चाकू व नशीले पदार्थ आदि अंदर ले जाना मना है। मोबाइल और कैमरा ले जा सकते है। बाकि आपके पास जो समान है उसे आप अमानती घर में सुरक्षित रख सकते है।

ताजमहल का टिकट

अमानती घर से थोडी दूर और पैदल चलने पर पश्चिमी द्वार आ जाता है। जिसके बाई ओर टिकट घर है। अगर आप विदेशी है तो विदेशियो के लिए ताजमहल का टिकट 1000 रूपये है ( यह टिकट आगरा में स्थित पर्यटन विभाग की सभी इमारतो के लिए वैद्य है) भारतीयो के लिए ताजमहल का टिकट 40 रूपये है( जो केवल ताजमहल के लिए वैद्य है)

यही टिकट खिडकी के पास ही आपको शूज कववर बेचने वाले भी मिल जाऐगें। उनसे आप बीस रूपए देकर शूज कवर खरीद ले क्योकि ताजमहल के संगमरमर के चबुतरे पर जूते चप्पल लेकर जाना मना है। वही टिकट खिडकी के पास आपको गाइड और फोटोग्राफर घेर लेगें जो आपको कई तरह के प्रलोभन भी देंगें  (जैसे कि – जैसे की सॉटकट से अंदर ले जाना का) क्योकि एंट्री गेट पर चैकिंग प्वाइंट पर काफी लम्बी कतार होती है। या तो आप उनसे सही व पहले ही मोल भाव कर तय कर ले या फिर टिकट कांटर से पर्यटन विभाग द्वारा गाइड हायर कर सकते है। चैकिंग प्वाइंट पर महिला, पुरूष व विदेशियो की अलग अलग लाइने होती है। यहां ज्यादा समय नही लगता 20-25 मिनट में आप अंदर पहुंच सकते है।

अंदर पहुंचने पर जिस स्थान पर हम पहुंचते है वह जिलौ खाना ( forecourt ) कहलाता है यह ताजमहल के मुख्य गेट के सामने का सुंदर गार्डन है। जो चकौर आकार का है। और इसकी चारो दिशाओ में चार दरवाजे है तीन दरवाजे बाहर शहर की ओर जाते है तथा एक बडा दरवाजा ताजमहल कि ओर जाता है। ताजमहल का इतिहास तो हमने समझ लिया आइए ताजमहल की स्थिति को ताजमहल के नक्शे के माध्यम से समझते है।

 

ताजमहल का इतिहास ताजमहल का नक्शा
ताजमहल का नक्शा

 

  1. यह पश्चिमी दरवाजा है। जिससे आप चैकिंग प्रक्रिया से गुजर अंदर प्रवेश करते है। वर्तमान समय में अंदर प्रवेश का पश्चिमी और पूर्वी दरवाजे से है। बाहर आप दक्षिण गेट से भी निकल सकते है। यह दरवाजा मेहराबनुमा व लाल बलुआ पत्थर से बना है। इसकी बगल में फतेहपुरी मस्जिद भी शायद इसी वजह से यह दरवाजा फतेहपुरी कहलाता है या फिर शायद दरवाजे की वजह से मस्जिद का नाम भी फतेहपुरी पडा।
  2. यह दक्षिणी दरवाजा है। जो ताजगंज बाजार की ओर है। यह दरवाजा भी लाल बलुआ पत्थर से बना हुआ है। और मेहराबनुमा है। परंतु पूर्वी और पश्चिमी दरवाजे हल्का सा भिन्न दिखाई पडता है। इसे सिद्धी दरवाजा कहते है।

  3. यह दरवाजा पश्चिमी दरवाजे के ठीक सामने की ओर है। यह दरवाजा दशहरा रोड की तरफ से आने पर पडता है। यह दरवाजा हूबहू पश्चिमी दरवाजे जैसा ही बना हुआ इसकी बनावट में भी लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग किया गया है।

  4. यह चारो दरवाजो के बीच का भाग है। जिसे जिलौ खाना ( forecourt) कहते है। यह मकबरे के द्वार के सामने का खुबसूरत गार्डन है। जिसमे दरवाजो को जोडने वाले पथमार्ग बने है बाकी हिस्से में हरी मखमली घास व सुंदर सजावटी फूल पौधे लगे है।

  5. यह बडा दरवाजा है जो उत्तर की दिशा में दक्षिणी दरवाजे के ठीक सामने पडता है। यह दरवाजा तीनो दरवाजो से बडा और आलीशान है। यह मकबरे का मुख्य द्वार है। जो लाल बलुआ पत्थर से बना है और संगमरमर से शानदार चित्रकारी की गई है। यह दरवाजा ” दरवाजा-ए-रोजा कहलाता है। इस दरवाजे से अंदर जाते ही सबसे पहली नजर मुहब्बत की उस बेस्किमती इमारत ताजमहल पर पडती है। दरवाजे से बाहर निकलते ही पर्यटक कुछ देर वही रूकने पर मजबूर हो जाते है और फिर ताजमहल के विभिन्न एंगल पर फेल्फी और फोटो लेने का दौर शुरू हो जाता है। ताजमहल का इतिहास

  6. दरवाजा ए रोजा पार करने पर कुछ सीढिया नीचे की ओर उतरती जो आपको चार बाग शैली से निर्मित ताज गार्डन में पहुंचाती है।  जिसमे हरी मखमली घास व सुंदर सजावटी पौधो के साथ नहर व फव्वारे है। जैसा कि ऊपर दिए गए नक्शे में दिखाई दे रहा है।

  7. ऊपर नक्शे में जो प्लस के चिन्ह जैसा गार्डन में दिखाई दे रहा है यह ताज गार्डन के अंदर स्थित लगभग एक हाथ गहरी नहरें  है। इन नहरो के अंदर फव्वारे लगे और इन नहरो के साथ साथ दोनो तरफ पथ मार्ग भी मकबरे तक जाता है।

  8. जैसा की आप नक्शे में देख रहे है प्लस के चिन्ह के बीच में जो चकौर सा दिखाई दे रहा है यह एक बडा फव्वारा है। अगर सरल भाषा में समझा जाए तो यह पानी का टेंक है जिससे नहरो की सिचांई होती है। इस पॉड के मध्य में बडा फव्वारा लगा हुआ है और जब यह चलता है तो बडा ही सुंदर दिखाई पडता है।

  9.  यह एक वर्गाकार संगमरमर का ऊचा चबूतरा है जिस पर मुख्य मकबरा बना हुआ नक्शे में जहा हमने एरो केंद्रित किया है यहां से इस चबूतरे पर चढने के लिए दोनो ओर को सीढीयां बनी है

  10. यह ताजमल का गुम्बद है जिसके नीचे गर्भगृह में शाहजहां और मुमताज की कब्रे है। यह मकबरा संगभरमर का बना है जिसमे किमती रत्न जडे गए है व बहुमुल्य पत्थरो की कारीगरी की गई है। मकबरे के द्वार पर कुरान की आयते भी लिखी गई है। ताजमहल का इतिहास

  11. यह संगमरमर से निर्मित ऊंचे मीनार है जो वर्गाकार चबूतरे के चारो कोनो पर है। और इस मकबरे की सुंदरता में चार चांद लगाते है।

  12. यह ताजमल के एक ओर साइड की तरफ मस्जिद है। जो लाल बलुआ पत्थर से बनी है और जिसमे सफेद संगमरमर की कारीगरी कि गई है।

  13. ताजमहल के दूसरी साइड की तरफ मेहमान खाना है।

  14. यह ताज महल के पिछे का भाग है जहां यमुना नदी बहती है।

अब तक के अपने इस लेख में हमने आगरा का इतिहास, ताजमहल का इतिहास और मुहब्बत की दास्तांं व नक्शे के माध्यम से ताजमहल को समझा और उसके दर्शन किए। आगे ताजमहल का इतिहास और आगरा के इतिहास से जुडे आगरा के अन्य दर्शनीय स्थलो की सैर करेगें

आगरा का लाल किला

जिस स्थान पर आगरा का किला है, बहुत पहले यहाँ बादलगढ का किला हुआ करता था। समय के साथ साथ वह किला नष्ट हो गया था। मुगल सम्राट अकबर ने 1563 ई° से 1573 ई° तक लगभग 8 वर्षो में बादलगढ किले के ध्वंसावशेषो पर इस किले का निर्माण करवाया था। इस किले में अकबरी महल, जहांगीरी महल, प्राचीर तथा प्रवेश द्वार अकबर ने बनवाये थे जबकि शीश महल, खास महल, दीवाने आम और दीवाने खास तक मोती मस्जिद का निर्माण अकबर के पोते सम्राट शाहजहां ने करवाया था।

इस किले में दिल्ली दरवाजा, अमरसिंह दरवाजा, दरियाई दरवाजा तथा दर्शनी दरवाजा नामक चार दरवाजे है। पर्यटको के लिए प्रवेश द्वार के रूप में अमर सिंह दरवाजा ही खुला होता है। किले के अंदर तीन मस्जिदे है — मीना मस्जिद, शाही मस्जिद और नगीना मस्जिद जो दर्शनीय है।

ताजमहल का इतिहास
आगरा के लाल किले में आपका दोस्त

रामबाग

यह बाग अपनी हरियाली और सुंदरता से पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। बाबर द्वारा बनाए गए इस बाग के ब्रे में कहा जाता है कि यह भारत का पहला मुगल उद्यान था। इस बाग के सौंदर्य को पास बहती यमुना नदी और भी मनमोहक बना देता है।

एतमादुद्दौला का मकबरा

ताजमहल का इतिहास और आगरा के इतिहास में यह प्रमुख दर्शनीय इमारत है। इसे नूरजहां ने अपने पिता मिर्जा ग्यासुद्दीन बेग की याद में सन् 1622 से 1628 के बीच बनवाया था। यह भव्य एंव खूबसूरत इमारत सफेद पत्थर से बनी है। यहा पत्थरो में की गई महीन नक्काशी तथा आकर्षक पच्चीकारी देखने लायक है। यह सुंदर इमारत एक खूबसूरत आयताकार बगीचे से घिरी हुई है। इसमें बनी जालियां तथा विभिन्न वनस्पतियो के रंगो से बनी चित्रकारी खखासतौर से देखने योग्य है। इससे जहांगीर और नूरजहां का चित्रकला प्रेम बखूबी उजागर होता है।

चीनी का रोजा

यह एक मकबरा है। इसे सन् 1618 में जहांगीर ने अपने वजीर एंव प्रमुख कवि शकूरउल्ला खां की याद में बनवाया था। इस मकबरे में चीनी मिट्टी की टाइल्स का अधिक उपयोग किया गया है। इसी वजह से यह मकबरा चीनी का रोजा के नाम से जाना जाता है।

स्वामी बाग

यह आगरा से 8 किलोमीटर दूर राधा स्वामी संप्रदाय के प्रवर्तक का भव्य सफेद रंग का स्मारक है। यहा बेलबूटो की नक्काशी और पिच्चकारी दर्शनीय है।

जामा मस्जिद

इसका निर्माण शाहजहां की सबसे प्रिय पुत्री जहाआरा ने सन् 1648 में करवाया था। सफेद तथा लाल पत्थरो से बनी यह इमारत आगरा किले के पास बाजार में स्थित है।

सिकंदरा भवन

सम्राट सिकंदर लोधी ने सन् 1492 ई° में आगरा पर विजय पाई थी। और इस स्थान पर अपनी राजधानी बनाई थी। अपने नाम पर सिकंदर लोधी ने इस जगह का नाम सिकंदरा रखा था। यह स्थान आगरा से मथुरा रोड पर पांच मील की दूरी पर है। सम्राट अकबर को यह जगह बहुत पसंद आई थी। उनकी दिली इच्छा थी कि उन्हें यही पर दफनाया जाए। सन् 1605 में अकबर की मृत्यु होने पर उन्हें इसी स्थान पर दफनाया गया था। हांलाकि इस मकबरे का निर्माण अकबर ने अपने जीते जी करवाना शुरू कर दिया था। लेकिन इसे पूरा करवाया था जहांगीर ने। लगभग 16 लाख रूपये की लागत से बना यह मकबरा सन् 1613 में बनकर तैयार हुआ था। इस मकबरे के चारो कोनो पर सफेद पत्थर की चार खूबसूरत मीनारे है। इमारत में हिंदू तथा मुस्लिम स्थापत्य कला का खूबसूरत मिश्रण है।

फतेहपुर सीकरी

फतेहपुर सीकरी आगरा से लगभग 39 किलोमीटर दूर राजस्थान की सीमा से सटा एक पर्यटन स्थल है। इसका निर्माण मुगल बादशाह अकबर ने अपनी राजधानी के रूप में सन् 1564 में शुरू  कराया था। लेकिन उस वक्त पानी की कमी होने के कारण इस शहर को छोडकर आगरा को अपनी राजधानी घोषित कर दिया था। यहा का किला भव्य व दर्शनीय है।

प्रिय पाठको अबतक के अपने इस लेख में हमने ताजमहल का इतिहास, आगरा का इतिहास, आगरा के दर्शनीय स्थल, ताजमहल की स्तिथि के साथ साथ ताजमहल की सैर भी की अब हम ताजमहल के रहस्य और ताजमहल के विवाद के बारे में भी जानेगे

 ताजमहल के रहस्य

    • आपको यह जानकर हैरानी होगी की ताजमहल का आधार ( नीव) लकडी पर टिकी है। इस लकडी की खासियत यह है कि यह लकडी जितनी पानी में रहती है उतनी ही ज्यादा मजबूत होती है। यमुना नदी का पानी आज भी इस लकडी को मजबूत करता है।
    • ताजमहल की छत में एक छेद है जिसमे से बरसात के समय आज भी पानी टपकता है। इसके बारे में एक दंतकथा प्रचलित है कहा जाता है कि शाहजहां ने ताजमहल बनने के बाद सभी कारीगरो के हाथ कटवाने का ऐलान कर दिया था। ऐसा माना जाता है कि शाहजहां चाहते थे कि ऐसी खूबसूरत इमारत दुबारा न बनाई जा सके। शाहजहां के इस फैसले से कारीगर नाराज हो गए। जिसके फलस्वरूप कारीगरो ने जानबूझकर ताजमहल के गुम्बद में एक छेद छोड दिया था। हांलाकि इस कहानी का कोई ऐतिहासिक सत्य नही है। ताजमहल का इतिहास में बस यह एक प्रचलित कथा है।
    • सन् 1983 में ताजमहल को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर घोसित किया गया।
    • ताजमहल का इतिहास का सबसे बडा पुस्कार है कि ताजमहल दुनिया के सात अजूबो में शामिल है।
    • ताजमहल में लगेेे फव्वारे किसी भी पाइप लाईन से नही जुडे है। बल्कि हर फव्वारे के नीचे एक तांबे का टैंक बना हुआ है। जो सभी एक ही समय पर भरते है और दबाब बनने पर एक साथ सभी फव्वारे चल जाते है।
    • ताजमहल वर्ल्ड में एक दिन में सबसे ज्यादा देखी जानी वाली इमारत है। ताजमहल को एक दिन में लगभग 12000 सैलानी देखते है।
    • ताजमहल की कलाकृति में 28 तरह के किमती पत्थरो को लगाया गया है।
    • ताजमल की चारो मीनारे एक दूसरे की ओर झूकी हुई है।
    • शाहजहां ने जब पहली बार ताजमहल का दीदार किया तो उसने कहा ” ये सिर्फ प्यार की कहानी बयां नही करेगा। बल्कि उन सबको दोष मुक्त भी करेगा जो इस पाक जमीं पर अपने कदम रखेगें और चांद सितारे इसकी गवाही देंगें।
  • द्वितीय विश्व युद्ध 1971 भारत पाक युद्ध के समय इस भव्य इमारत को सुरक्षा की दृष्टि से ताजमहल के चारो ओर बासं का सुरक्षा घेरा बनाकर उसे हरे रंग की चादर से ढक दिया गया था।

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