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जगन्नाथ पुरी धाम की यात्रा – जगन्नाथ पुरी का महत्व और प्रसिद्ध मंदिर

जगन्नाथ पुरी धाम की यात्रा – जगन्नाथ पुरी का महत्व और प्रसिद्ध मंदिर

श्री जगन्नाथ पुरी धाम चारों दिशाओं के चार पावन धामों मे से एक है। ऐसी मान्यता है कि बदरीनाथ धाम सतयुग का और उत्तर दिशा का धाम है। रामेश्वरम धाम त्रेतायुग और दक्षिण दिशा का धाम है। द्वारका धाम द्वापरयुग और पश्चिम दिशा का धाम है। तथा जगन्नाथ पुरी धाम कलियुग और पूर्व दिशा का पावन धाम है। आइए जानते है जगन्नाथ जी का धाम कहा है? जगन्नाथ पुरी धाम उडीसा राज्य के पुरी शहर मेें स्थित है। यह शहर भगवान जगन्नाथ के मंदिर के लिए जाना जाता है। यह एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। अपने इस लेख में हम जगन्नाथ पुरी धाम की यात्रा करेंगे और उसके बारें में विस्तार से जानेंगे

 

 

जहां वर्तमान मे जगन्नाथ पुरी धाम है, पहले यहां नीलाचल नामक पर्वत था, और नीलमाधव भगवान की मूर्ति इस पर्वत पर थी। इस मूर्ति की देवता लोग आराधना करते थे। माना जाता है कि यह पर्वत भूमि मे समा गया था और भगवान की वह मूर्ति देवता अपने देवलोक ले गए थे, परंतु इस क्षेत्र को उन्हीं की स्मृति में अब भी नीलाचल कहते है।

 

 

श्री जगन्नाथ पुरी के मंदिर के शिखर पर लगा चक्र नीलच्छत्र कहा जाता है। उस नीलच्छत्र के दर्शन जहां तक होते है, वह पुरा क्षेत्र जगन्नाथ पुरी है। इस क्षेत्र को अनेक अन्य नामो से भी जाना जाता है जैसे — श्री क्षेत्र, पुरूषोत्तम पुरी, तथा शंखक्षेत्र आदि। इस क्षेत्र को शंखक्षेत्र इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसकी आकृति शंख के समान है। इसे उडिडयानपीठ भी कहा जाता है। और 51 शक्तिपीठों में से यह एक शक्तिपीठ है। यहां देवी सती की नाभि गिरी थी।

 

 

 

 

जगन्नाथ पुरी की कथा (Story of Jagannath puri dham)

 

 

द्वापरयुग में द्वारका में श्रीकृष्ण की पटरानियों ने एक बार माता रोहिणी जी के भवन में जाकर उनसे आग्रह किया कि, वे श्याम सुंदर की व्रज लीला के गोपी प्रेम प्रसंग को सुनाएं। माता ने इस बात को टालने का बहुत प्रयत्न किया, किंतु पटरानियों के आग्रह के कारण उन्हें यह वर्णन सुनाने को प्रस्तुत होना पडा। उचित नही था कि सुभद्रा जी वहां रहें, इसलिए माता रोहिणी ने सुभद्रा जी को भवन के द्वार के बाहर खडा हो जाने को कहा। तथा साथ ही उन्हें आदेश दिया कि वे किसी को भीतर न आने दें।

 

 

संयोगवश उसी समय श्रीकृष्ण और बलराम वहां पधारे। सुभद्रा जी ने उन दोनों भाईयों को भीतर जाने से रोक दिया। बंद द्वार के भीतर जो व्रजप्रेम की वार्ता हो रही थी, उसे द्वार से बाहर से ज्यो की त्यो सुनकर तीनों के शरीर द्रवित होने लगे।

 

उसी समय देवर्षि नारदजी भी उधर आ निकले। उन्होंने उन तीनों को जब प्रेम द्रवित रूप में देखा तो उनसे प्राथना की, आप तीनों इसी रूप में विराजमान हो। श्रीकृष्ण ने उनकी प्रार्थना को स्वीकार किया और कहा – कलियुग मे इसी रूप में हम तीनों स्थित होगें।

 

 

 

जगन्नाथ पुरी की धार्मिक पृष्ठभूमि (Religious Background of Jagannath Puri)

 

 

 

प्रचलित कथा के अनुसार सतयुग में यहां एक वन था, जहां नीलाचल नाम का पर्वत था। इस पर्वत शिखर पर सबकी इच्छा पूर्ण करने वाला कल्पद्रुम वृक्ष खड़ा था। पर्वत के पश्चिम की ओर एक पवित्र जल स्रोत था। जिसका नाम रोहिणी था। इसके निकट नीलमणि धारण किएं हुए विष्णु भगवान की एक सुंदर मूर्ति थी, जिसे नीलमाधव कहा जाता था।

 

 

इस आश्चर्यजनक प्रतिमा की चर्चा अवंती के तत्कालीन राजा इंद्रद्युम्न ने सुनी। वह भगवान विष्णु का परम भक्त था। वह उस श्री विग्रह का दर्शन करने के प्रयत्न मे लग गया। शीघ्र ही उसे उस स्थान का पता भी चल गया, परंतु इससे पहले कि वह वहां पहुंच पाता, देवता उस श्री विग्रह को लेकर अपने लोक में चले गए। उसी समय आकाशवाणी हुई कि दारूब्रह्मरूप में तुम्हें जगन्नाथ जी के दर्शन होंगे।

 

महाराज इंद्रद्युम्न सपरिवार नीलाचल पर्वत के पास बस गए। एक दिन समुद्र में बहुत बडा काष्ठ (महादारू) बहकर आया। राजा ने उसे निकलवा लिया। उसने उस काष्ठ से भगवान विष्णु की मूर्ति बनवाने का निश्चय किया। उसी समय एक वृद्ध बढ़ई के रूप में स्वयं विश्वकर्मा उपस्थित हुए। उन्होंने मूर्ति बनाना स्वीकार तो कर लिया, लेकिन साथ ही यह शर्त रखी कि जिस गृह में बैठकर वे मूर्ति बनाएंगे, उसे तब तक न खोला जाएं, जब तक कि वे मूर्ति पूरी हो जाने की सूचना स्वयं न दे दें।

 

 

महाराज इंद्रद्युम्न ने इसे स्वीकार कर लिया। उस काष्ठ को लेकर विश्वकर्मा गुंडीचा मंदिर के स्थान पर भवन में बंद हो गए। जब कई दिन व्यतीत हो गए तो महारानी ने महाराज से कहा– लगता है, कि उस वृद्ध बढ़ई को कुछ हो गया है। वर्ना इतने दिनों तक कोई भूखा प्यासा भीतर बंद रह सकता है? आपको पता लगाना चाहिए।

 

 

महाराज को भी महारानी की बात ठीक लगी। उसने भवन का द्वार खुलवाकर अंदर देखा। वहां उसे वृद्ध बढ़ई तो न मिला, लेकिन श्रीकृष्ण, बलराम व सुभद्रा जी की अधूरी बनी हुई प्रतिमाएं पडी हुई मिली। उन अधूरी प्रतिमाओं को देखकर महाराज को बहुत दुख हुआ।

 

 

किंतु उसी समय आकाशवाणी हुई— चिंता मत करो राजन! हमारी इसी रूप में रहने की इच्छा है। मूर्तियों पर पवित्र द्रव्य रंग इत्यादि चढ़ाकर उन्हें प्रतिष्ठित कर दो।

 

इस आकाशवाणी के अनुसार वे ही मूर्तियां प्रतिष्ठित हो गई। गुंडीचा मंदिर के पास मूर्ति निर्माण हुआ था। अतः गुंडीचा मंदिर को ब्रह्मलोक या जनकपुर कहते है।

 

कहते है कि महाराज इंद्रद्युम्न ने बहुत बडा समारोह करके इन अपूर्ण मूर्तियों की स्थापना की थी। और भगवान जगन्नाथ के रूप में उनकी पूजा आरम्भ की थी। उनके साथ उनकी बहन सुभद्रा और भाई बलराम की मूर्ति की भी पूजा की। आषाढ़ मास मे इन मूर्तियों को बाहर निकाला गया और इनकी रथयात्रा का उत्सव किया गया। बहुत से लोगों के मन मे सवाल आता है कि जगन्नाथ रथयात्रा का उत्सव क्यों मनाया जाता है। यही कारण है, महाराज इंद्रद्युम्न के समय से आज तक यह परमपरा चली आ रही है। प्रति वर्ष आषाढ़ मास मे जगन्नाथ पुरी में रथयात्रा का भव्य आयोजन किया जाता है।

 

 

यह भी कहा जाता है कि महाराज इंद्रद्युम्न ने भगवान जगन्नाथ से वर मांडा था , कि उनके परिवार का कोई सदस्य मंदिर पर अपना अधिकार न जता सके। भगवान जगन्नाथ ने यह प्रार्थना स्वीकार कर ली और महाराज इंद्रद्युम्न संतानहीन होकर मरें। चूंकि महाराज का कोई उत्तराधिकारी नहीं था। इसलिए स्वंय जगन्नाथ जी ने महाराज का अंतिम संस्कार तथा वार्षिक श्राद्ध किया। यह वार्षिक श्राद्ध भक्तों द्वारा अभी भी प्रति वर्ष मार्गशीर्ष की चंद्र पूर्णिमा को मनाया जाता है।

 

 

कुछ लोग यह भी मानते है कि भगवान जगन्नाथ की पूजा तथा रथयात्रा बौद्धों के समय से प्रचलित है। परंतु इस पर भी मतभेद है। इतना अवश्य है कि रथयात्रा का उत्सव न केवल जगन्नाथ पुरी में होता है, बल्कि भुवनेश्वर में शिवजी के लिए, जयपुर में बिरजादेवी के लिए तथा दक्षिण भारत के अनेक मंदिरों में अन्य देवी देवताओं के लिए भी होता है।

 

 

 

श्री जगन्नाथ जी के महाप्रसाद की महिमा (The glory of Mahaprasad of Shri Jagannath ji)

 

 

श्री जगन्नाथ जी के महाप्रसाद की महिमा तो भुवन विख्यात है। महाप्रसाद में छूआछूत का दोष नही माना जाता। उच्छिष्टता दोष भी नहीं माना जाता। व्रत के दिनों भी उसे ग्रहण कर सकते है।  सच तो यह है कि भगवान का प्रसाद अन्न या प्रसाद नही हुआ करता। वह तो चिन्मय तत्व है। उसे पदार्थ मानकर विचार करना ही दोष की संज्ञा में आता है।

 

कहते है कि श्री बल्लभाचार्य महाप्रभु एक बार जब जगन्नाथ पुरी पधारे तो एकादशी व्रत के दिन उनकी निष्ठा की परीक्षा करने के लिए उनको किसी ने मंदिर में ही महाप्रसाद दे दिया। आचार्य ने महाप्रसाद हाथ में लेकर उसका स्तवन प्रारंभ किया और एकादशी के पूरे दिन तथा पूरी रात उनका स्तवन जारी रहा। दूसरे दिन द्वादशी में स्तवन समाप्त करके उन्होंने प्रसाद ग्रहण किया। इस प्रकार उन्होंने महाप्रसाद एवं एकादशी दोनों को समुचित आदर दिया।

 

 

एक ही थाल से महाप्रसाद ग्रहण करने की प्रथा आदिवासी शबरी के समय से चली आ रही है। इस कारण छूआछूत के अभाव को बौद्धधर्म का प्रभाव कहना गलत होगा। यह संभव है कि उनके तथा वैष्णव मत के प्रभाव से छूआछूत के बचे खुचे अवशेष भी समाप्त हो गए हों।

 

 

 

 

जगन्नाथ पुरी धाम के सुंदर दृश्य
जगन्नाथ पुरी धाम के सुंदर दृश्य

 

 

 

जगन्नाथ पुरी के वर्तमान मंदिर का निर्माण (Construction of the present temple of Jagannath Puri)

 

 

 

प्रचलित लोक कथा के अनुसार महाराज इंद्रद्युम्न ने जगन्नाथ पुरी का मंदिर बनवाया था। परंतु वह मंदिर उसके कुछ प्रतिद्वंद्वी राजाओं ने नष्ट कर दिया था। जगन्नाथपुरी के लेखागार में पाए गए वर्णन के अनुसार जगन्नाथ पुरी के वर्तमान मंदिर का निर्माण गंग वंश के सातवें राजा अनंग भीमदेव ने किया था। इस मंदिर का निर्माण 1198 ईसवीं में पूर्ण हुआ। कहा जाता है कि अनंग भीमदेव ने ब्रह्महत्या के प्रायश्चित के रूप में इस मंदिर का निर्माण किया तथा ब्राह्मणों को इसका पुजारी नियुक्त किया।

 

 

 

श्री जगन्नाथ पुरी के मंदिर, दर्शन, व दर्शनीय स्थल

 

 

Top places visit in Jagannath puri dham

 

 

 

श्री जगन्नाथ मंदिर (shri Jagannath temple)

 

 

भगवान श्री जगन्नाथ का मंदिर बहुत विशाल है। यह मंदिर जगन्नाथ पुरी धाम का मुख्य मंदिर है। मंदिर के घेरे में अनेक अन्य मंदिर भी है। मंदिर दो परकोटों के भीतर है। इनमें चारों ओर चार महाद्वार है। मुख्य मंदिर के तीन भाग है। सबसे ऊंचा भाग है- विमान या श्री मंदिर। इसी में श्री जगन्नाथ जी विराजमान है। उसके सामने जगमोहन है और जगमोहन के बाद मुखशाला नामक मंदिर है। मुखशाला के आगे भोगमंडप है। श्री जगन्नाथ के पूर्व में सिंहद्वार, दक्षिण में अश्वद्वार, पश्चिम में व्याघ्रद्वार और उत्तर में हस्तिद्वार है।

 

सिंहद्वार के सम्मुख कोणार्क से लाकर स्थापित किया उच्च अरूण स्तंभ है। इसकी प्रदक्षिणा करके, सिंहद्वार को प्रणाम करके द्वार में प्रवेश करने पर दाहिनी ओर पतितपावन श्री जगन्नाथ जी के विग्रह दृष्टिगोचर होते है। इनके दर्शन सभी के लिए सुलभ है। विधर्मी भी इनका दर्शन कर सकते है।

आगे एक छोटे मंदिर में विश्वनाथ लिंग है। कहा जाता है कि एक ब्राह्मण काशी जाना चाहते थे। श्री जगन्नाथ जी ने उन्हें स्वप्न मे आदेश दिया कि उक्त लिंग मूर्ति के अर्चन से ही उन्हें विश्वनाथ जी के पूजन का फल प्राप्त हो जाएगा। इसलिए माना जाता है कि इस लिंग की पूजा अर्चना से विश्वनाथ जी के समान फल प्राप्त होता है।

 

 

 

 

पच्चीस सीढियों का महत्व (Importance of twenty five stairs in jagannath puri temple)

 

 

 

श्री जगन्नाथ जी के मंदिर के दूसरे प्राकार के भीतर भीतर जाने से पूर्व 25 सीढियां चढ़नी पडती है। इन सीढ़ियों को प्राकृति के 25 विभागों का प्रतीक माना गया है। द्वितीय प्राकार के द्वार में प्रवेश करने से पूर्व दोनों ओर भगवत्प्रसाद का बाजार दिखाई देता हैं।

 

आगे अजाननाथ गणेश, बटेरा महादेव एवं पटमंगलादेवी के स्थान है। आगे सत्यनारायण भगवान का स्थान है। जिनकी सेवा अन्य धर्म भी करते है। थोडा ओर आगे वटवृक्ष है, जिसे कल्पवृक्ष भी कहते है। उसके नीचे बालमुकुंद के दर्शन होते है। वटवृक्ष की परिक्रमा की जाती है। वहां से आगे गणेश का मंदिर है। इन्हें सिद्ध गणेश जी कहते है। पास में पास में सर्वमंगला देवी तथा अन्य मंदिर है।

 

 

इनके अलावा भी जगन्नाथ पुरी के मुख्य मंदिर के घेरे मे अनेक मंदिर है। श्री जगन्नाथ जी निज मंदिर के द्वार के सामने मुक्तिमंडप है। इसे ब्रह्मासन कहते है। ब्रहमाजी पूर्व काल में यज्ञ के प्रधानाचार्य होकर यही विराजमान होते थे। इस मुक्तिमंडप में स्थानीय विद्वानों ब्राह्मणों के बैठने की परिपाटी है।

 

मुक्तिमंडप के पीछे की ओर मुक्तनरसिंह का मंदिर है। ये यहां के क्षेत्रपाल है। इस मंदिर के पास ही रोहिणी कुंड है। उसके समीप ही बिमलादेवी का मंदिर है। यह यहां का शक्तिपीठ है। जैन समुदाय के लोग इस विग्रह का सरस्वती नाम से पूजन करते है।

 

यहां से आगे सरस्वती जी का मंदिर है। इस मंदिर में श्री लक्ष्मी जी की मुख्य मूर्ति है। समीप ही शंकराचार्य जी तथा लक्षमीनारायण की मूर्तियां है। इसी मंदिर के जगमोहन में कथा तथा अन्य शास्त्र चर्चा होती है।

 

श्री लक्ष्मी जी के निकट सूर्य मंदिर है। मंदिर में सूर्य, चंद्र तथा इंद्र की छोटी छोटी मूर्तियां है। कोणार्क मंदिर से लाई हुई सूर्य भगवान की प्रतिमा इसी मंदिर में गुप्त स्थान मे रखी हुई है।

 

पास ही पातालेश्वर महादेव का मंदिर है। इनका बहुत बडा महात्म्य माना जाता है। यही पर उत्तरादेवी की मूर्ति है। यहां से पास ही ईशानेश्वर मंदिर है। इनको श्री जगन्नाथ जी का मामा भी कहते है। इस लिंग विग्रह के सम्मुख जो नंदी की मूर्ति है। उससे गुप्त गंगा का प्रवाह निकला है। वहा नख से आघात करने पर जल निकल आता है।

 

 

यहां से आगे निज मंदिर से एक द्वार बाहर जाता है। इस द्वार को वैकुंठ द्वार कहते है। वैकुंठद्वार के समीप वैकुंठेश्वर महादेव का मंदिर है। यहां बगीचा सा है। बारह वर्ष पर जब श्री जगन्नाथ जी का कलेवर परिवर्तन होता है। तब पुराने विग्रह को यही समाधी दी जाती हैं।

 

आगे जय विजय द्वार है। जहां जय, विजय की मूर्तियां है। इनका दर्शन करके , इनसे अनुमति लेकर तब निज मंदिर मे जाना उचित है।  इसी द्वार के समीप श्री जगन्नाथ जी का भंडारगृह है।

 

 

प्रायः मंदिर की परिक्रमा करके यात्री निज मंदिर के जगमोहन मे प्रवेश करते है। जगमोहन में गरूड स्तंभ भोगमंडप में है। श्री चैतन्य महाप्रभु यही से श्री जगन्नाथ जी के दर्शन करते थे। वहां एक छोटा सा गड्ढा भूमि है। कहा जाता है कि वह गड्ढा महाप्रभु के आंसुओं से भर जाया करता था। गरूड स्तंभ को दाहिने करके तथा जय विजय की मूर्तियों को प्रणाम करके तब आगे निज मंदिर मे जाना चाहिए।

 

 

निज मंदिर मे 16 फुट ऊंची एक वेदी है। इसे रत्नवेदी कहते है। वेदी के तीन ओर तीन फुट चौडी गली है। जिससे भक्त श्री जगन्नाथ जी की परिक्रमा करते हैं। इस वेदी पर श्री जगन्नाथ, सुभद्रा, तथा बलराम जी की मूख्य मूर्तियां स्थापित है। श्री जगन्नाथ जी का श्याम वर्ण है। वेदी पर एक ओर 6 फुट लंबा सुदर्शन चक्र प्रतिष्ठित है। यही पर नीलमाधव, लक्ष्मी तथा सरस्वती की छोटी मूर्तियां भी है।

 

श्री जगन्नाथ, सुभद्रा तथा बलराम जी की मूर्तियां अपूर्ण है। उनके हाथ पूरे नही बने है। मुख मंडल भी सम्पूर्ण निर्मित नही है। इसका कारण हमे पिछे श्री जगन्नाथ जी की कथा मे बता चुके है।

 

यात्री एक बार श्री जगन्नाथ जी के मंदिर में भीतर तक जाकर चरण स्पर्श कर सकते है। जगमोहन के दर्शन प्रायः रात्रि में पट द्वार बंद होने के अतिरिक्त सभी समय होते है। परंतु यहां की सेवा पद्धति इस प्रकार की है कि यह निश्चित नही होता कि किस समय भोग लगेगा। इसके बाद कब सबके लिए भीतर तक जाने की सुविधा प्राप्त होगी। अधिकतर रात्रि मे यह सुविधा होती है। दिन में भी एक समय पर सुविधा मिलती है, परंतु प्रतिदिन यह सुविधा मिलना निश्चित नही है। अभी तक के अपने लेख में हमने जगन्नाथ मंदिर की कहानी, जगन्नाथ मंदिर के दर्शन और जगन्नाथ मंदिर के कोने कोने के महत्व को जाना। आगे अपने इस लेख मे हम श्री जगन्नाथ भगवान की पूजा किस प्रकार करनी चाहिए यह जानेंगे।

 

 

 

 

श्री जगन्नाथ जी की पूजा विधि (Worship of Shri Jagannath ji)

 

 

 

श्रद्धालु भक्त मंदिर की भीतर और बाहर से परिक्रमा करते है। और भगवान जगन्नाथ तथा सुभद्रा व बलराम की मूर्ति के आगे नतमस्तक होते है। जगन्नाथ पुरी में लगभग 400 ब्राह्मण रसोइए 50 से अधिक प्रकार के चावलों का भात, सब्जी तथा मिठाईयां तैयार करते है। यह सब पहले भगवान जगन्नाथ को चढाया जाता है। तथा बाद मे भक्तों में भगवान जगन्नाथ का प्रसाद वितरित किया जाता है। कहा जाता है कि रथयात्रा के दिन श्रद्धालुओं की संख्या यहां 4-5 लाख तक पहुंच जाती है।

 

 

 

मंदिर में तीन प्रकार के भोग बनाएं जाते है। जगन्नाथ जी के भोग में सदा भात होता है। बलराम जी के भोग में खीर आदि तथा सुभद्रा के भोग में कई प्रकार के पकवान होते है। इन तीनों प्रकार के भोगों का निर्माण मंदिर में ही होता है। तथा इन्हें अलग अलग आकार की हांडियों में भरकर अलग अलग दामों मे मंदिर में बिक्री के लिए उपलब्ध काराया जाता है। भक्तगण इस तैयार प्रसाद को खरीद कर भगवान को भोग लगाते है।

 

 

 

श्री जगन्नाथ पुरी में स्नान के पवित्र स्थान (Holy place of bath in Shri Jagannath Puri)

 

 

 

श्री जगन्नाथ पुरी में स्नान करने के कई पवित्र स्थान है, जिनमें स्नान करके तीर्थ यात्री स्वयं को धन्य करते है। जगन्नाथ पुरी में स्नान के प्रमुख स्थान है:–

 

 

महोदधि (समुद्र) Mahoddhi

 

श्री जगन्नाथ जी के मंदिर से सीधा मार्ग समुंद्र तट की ओर गया है। यह स्नान का स्थान स्वर्गद्वार कहा जाता है। श्री जगन्नाथ मंदिर से स्वर्गद्वार एक मील की दूरी पर है।

 

 

 

रोहिणी कुंड (Rohini kund)

 

 

यह स्थान श्री जगन्नाथ जी मंदिर के परिसर के भीतर है। इसमें सुदर्शन चक्र की छाया पड़ती है। कहा जाता है कि एक कौआ अकस्मात इसमें गिर पडा था। इससे उसे सारुप्रमुक्ति प्राप्त हुई थी।

 

 

 

इंद्रद्युम्न सरोवर (Indraadyumna sarovar)

 

 

यह सरोवर मंदिर से लगभग डेढ़ मील पर गुंडिचा मंदिर (जनकपुर) के पास है।

 

 

मार्कण्डेय सरोवर (Markandeya sarovar)

 

यह सरोवर श्री जगन्नाथ जी के मंदिर से लगभग आधा मील दूर है।

 

 

चंदन तालाब (Chandan talab)

 

यह तालाब श्री जगन्नाथ जी के मंदिर से लगभग आधा मील दूर तथा मार्कण्डेय सरोवर के निकट है।

 

 

श्वेतगंगा सरोवर (Savetganga sarovar)

 

यह सरोवर स्वर्गद्वार समुद्र स्नान को जाने वाले मार्ग मे पडता है।

 

 

लोकनाथ सरोवर (Loknath sarovar)

 

यह सरोवर श्री लोकनाथ मंदिर के निकट स्थित है। श्री जगन्नाथ मंदिर से इसकी दूरी लगभग दो मील है।इसे हर पार्वती सर या शिवगंगा भी कहते है।

 

 

 

श्री जगन्नाथ पुरी की रथयात्रा व उत्सव (Shri jagannath puri rathayatra and festival)

 

 

 

रथ यात्रा (Rathayatra)

 

प्रति वर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीय को श्री जगन्नाथ जी की रथ यात्रा का महोत्सव होता है। यह जगन्नाथ पुरी का प्रधान यानी मुख्य महोत्सव है। इसमे तीन अत्यंत विशाल रथ होते है। पहले रथ पर श्री बलराम जी, दूसरे रथ पर सुभद्रा जी तथा तीसरे रथ पर श्री जगन्नाथ जी विराजमान होते है। ये रथ भक्तों द्वारा खीचें जाते है। जगन्नाथ मंदिर से यह यात्रा शुरू होती है तथा संध्या तक ये रथ गुंडिचा मंदिर पहुंच जाते है।

 

दूसरे दिन भगवान रथ से उतरकर मंदिर में पधारते है, और सात दिन तक वहीं विराजमान रहते है। दशमी को वहां से रथ पर लौटते है। इन नौ दिनों के श्री जगन्नाथ जी के दर्शन को आड़प दर्शन कहते है। इसका बहुत अधिक महत्व होता है।

 

 

 

चंदन यात्रा (Chandan yatra)

 

 

वैशाख शुक्ल तृतीया से ज्येष्ठ कृष्णा अष्टमी तक 21 दिन तक जगन्नाथ पुरी में चंदन यात्रा होती है। इस समय मदनमोहन, राम-कृष्ण, लक्ष्मी-सरस्वती, नीलकंठेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर, लोकनाथ, कपालमोचन, और जम्बेश्वर के उत्सव-विग्रह चंदन तालाब पर जाते है। वहां स्नान तथा नौका विहार होता है।

 

 

 

स्नान यात्रा (isnaan yatra)

 

ज्येष्ठ पूर्णिमा को श्री जगन्नाथ, सुभद्रा तथा बलराम जी की स्नान यात्रा का महोत्सव होता है। ये श्री विग्रह स्नान मंडप में जाते है। वहां उन्हें 108 घडों के जल से स्नान कराया जाता है। स्नान के पश्चात भगवान का गणेश- वेश मे श्रृंगार होता है। कहा जाता है कि इस अवसर पर श्री जगन्नाथ जी ने एक गणेशजी के भक्त को गणेश रूप में दर्शन दिया था। इसके बाद 15 दिन मंदिर बंद रहता है।

 

 

रूक्मिणी हरण लीला (Rukmani haran leela)

 

यह लीला उत्सव ज्येष्ठ शुक्ला एकादशी को मंदिर में ही होती है। जिसमें काफी संख्या में भक्तगण भाग लेते है।

 

 

सेवक उत्सव (Sevak utsav)

 

श्रावण की अमावस्या को श्री जगन्नाथ जी के सेवकों का उत्सव मनाया जाता है।

 

 

झूलन यात्रा (Jhoolan yatra)

 

श्रावण में शुक्ल पक्ष की दशमी से झूलन-यात्रा होती है। इन उत्सवों के अलावा जन्माष्टमी को जन्मोत्सव, भाद्रकृष्णा 11 को कालिय-दमन, भाद्र शुक्ला 11 को पार्श्व परिवर्तनोत्सव, वामन द्वादशी, आश्विन पूर्णिमा को सुदर्शन विजयोत्सव तथा नवरात्रों में विमला देवी के उत्सव मनाएं जाते है। इस प्रकार जगन्नाथ पुरी मंदिर में अधिकतर सभी पर्वों पर महोत्सव होते है।

 

 

 

 

जगन्नाथ पुरी धाम के अन्य मंदिर – जगन्नाथ पुरी धाम के दर्शनीय स्थल

 

Famous temple of Jagannath puri dham

 

 

 

गुंडिचा मंदिर (Gundicha temple jagannath puri)

 

श्री जगन्नाथ मंदिर के सामने से जो मुख्य मार्ग जाता है। उसी मार्ग पर लगभग डेढ़ मील की दूरी पर गुंडिचा मंदिर स्थित है। यह मंदिर जगन्नाथ पुरी में जगन्नाथ मंदिर के बाद दूसरा प्रमुख मंदिर है। गुंडिचा मंदिर में रथयात्रा के समय श्री जगन्नाथ जी विराजमान होते है। शेष समय मंदिर में कोई मूर्ति नही रहती। केवल मुख्य मंदिर के सभा भवन के अगले भाग में लक्ष्मी जी की मूर्ति रहती है।

गुंडिचा मंदिर के पास ही उत्तर-पूर्व कोण में इंद्रद्युम्न सरोवर है। तथा गुंडीचा मंदिर के पिछे ही सिद्ध हनुमानजी का प्राचीन मंदिर है।

 

 

एमार मठ (Amaar math)

 

 

यह मठ श्री जगन्नाथ जी के मंदिर के सिंहद्वार के सामने ही है। श्री रामानुजाचार्य जी का एक नाम एम्बीडीयम भी था। इसी नाम पर मठ का नाम पड़ा है। श्री रामानुजाचार्य यहां कुछ समय रहे थे। उनके आराध्य गोपाल जी का श्री विग्रह यहां है।

 

 

 

श्री राधाकांत मठ (Shri radhakant math)

 

 

श्री जगन्नाथ मंदिर से स्वर्गद्वार (समुद्र) की ओर जाने वाले मार्ग पर एक गली से होकर इस मठ तक पहुंचा जा सकता है। श्री चैतन्य महाप्रभु यहां 18 वर्ष रहे थे। यह श्री काशीमिश्र का भवन था। महाप्रभु के रहने पर यह गंभीरा मंदिर कहा जाने लगा और अब श्री राधाकान्त मठ कहा जाता है। इस मठ मे प्रवेश करते ही श्री राधाकान्त मंदिर मिलता है। उसमें श्री राधा-कृष्ण जी की मनोहर मूर्ति है। ओर अंदर जाने पर गंभीरा मंदिर है। जिस कोठरी में महाप्रभु 18 वर्ष महान विरह की उन्माद अवस्था में रहे। उसमें उनका चित्र, चरणपादुका, करवा, गुदड़ी, माला, आदि सुरक्षित है।

 

 

 

 

सिद्ध बकुल (Sidh bakul)

 

 

श्री राधाकांत मठ वाली गली से निकलकर कुछ आगे जाने पर एक गली में सिद्ध बकुल स्थान है। यह स्थान श्री हरिदास जी की भजन स्थली है। यहां पहले छाया नही थी। श्री चैतन्य महाप्रभु ने यहां बकुल की दातुन गाड़ दी थी। समय बीतने पर वह दातुन वृक्ष बन गई। यह अद्भुत वृक्ष है, वृक्ष और इसकी डालें तक खोखली है।

 

 

 

श्वेतकेशव मंदिर (Sawetkesav temple)

 

 

समुद्र की ओर जाने वाले मार्ग में ही आगे जाने पर श्वेतगंगा सरोवर मिलता है। वही पर श्वेतकेशव मंदिर है। श्री जगन्नाथ जी के साथ ही इस मंदिर की मूर्ति का भी कलेवर परिवर्तन होता है। यही श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रेम पात्र श्री वासुदेव सार्वभौम का आवास स्थान है।

 

 

 

गोवर्धन मठ (govardhan math)

 

 

समुद्र की ओर जाने वाले इसी मार्ग में आगे दाहिनी ओर क मार्ग श्री शंकराचार्य जी के गोवर्धन मठ को जाता है। आदि शंकराचार्य जी की चार प्रमुख पीठों में से यह एक पीठ है। यहां शंकराचार्य जी की मूर्ति तथा कई भगवद विग्रह मंदिर में है। इसके अतिरिक्त श्री राधाकांत मठ के पास एक शंकरानंद मठ है। श्री मदभागवत के टीकाकार श्री धर स्वामी इसी स्थान में रहते थे। जगन्नाथ पुरी मे यह मठ काफी प्रसिद्ध हैं।

 

 

 

 

कबीर मठ (Kabir Math)

 

 

समुद्र तट पर स्वर्गद्वार के पास यह स्थान है। यहां पाताल गंगा नाम का एक कूप है। कहते है कि यहां संत कबीरदास जी स्वयं आकर कुछ दिन यहां रहे थे।

 

 

 

हरिदास जी की समाधि (Haridas ji ki samadhi)

 

 

स्वर्गद्वार से दाहिनी ओर जाने वाले मार्ग से लगभग आधा मील दूर चलने पर हरिदास जी का समाधि मंदिर है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने हाथों से स्वामी हरिदास जी के शरीर को समाधि दी थी।

 

 

 

तोटा गोपीनाथ (Tota gopinath)

 

 

हरिदास जी की समाधि के आगे लगभग एक मील पर यह मंदिर है। यही रेत का वह टीला है, जिसे चटकगिरि कहते है। और जिसमें महाप्रभु को गिरिराज गोवर्धन के और निकटवर्ती समुद्र में कालिन्दी के दर्शन हुए थे।

श्री गौरांग महाप्रभु को इस चटकगिरि की रेत में ही श्री गोपीनाथ जी की मूर्ति मिली थी। श्री रसिकानंदजी गोस्वामी इस विग्रह की अर्चना करते थे। कहा जाता है कि यह मूर्ति पहले खडी थी। प्रतिमा पर्याप्त ऊंची होने से भगवान के मस्तक पर पग नही बांधी जा पाती थी। इससे जब भावुक आराधक को खेद हुआ, तब श्री गोपीनाथ जी बैठ गए। श्री चैतन्य महाप्रभु इसी मूर्ति में लीन हूए। यह मान्यता भी बहुत से भक्तों की है। मूर्ति मे एक स्वर्णिम रेखा है, जिसे महाप्रभु के लीन होने का चिन्ह कहा जाता है।

 

 

 

लोकनाथ (Loknath)

 

 

तोटा गोपीनाथ से लगभग आधा मील आगे नगर से बाहर वन्य प्रदेश मे एक घेरे के भीतर श्री लोकनाथ महादेव जी का मंदिर है। श्री जगन्नाथ जी के मंदिर से भी एक सडक यहां तक आई है। उस मार्ग से यह स्थान ढाई मील है।

लोकनाथ महादेव मंदिर के निकट ही एक सरोवर है। इस सरोवर को हर-पार्वती सर या शिव गंगा सरोवर कहते है। यहां पर एक मंदिर है। मंदिर में शिवलिंग के पास से बराबर जल निकलता रहता है। श्री लोकनाथ लिंग जल में डूबा रहता है। जल के ऊपर ही पूजा सामग्री चढाई जाती है। केवल महा शिवरात्रि के दिन जब सारा जल उलीचकर निकाल दिया जाता है, कुछ समय तक श्री लोकनाथ के दर्शन हो पाते है।

 

 

 

बेड़ी हनुमान (Bedi Hanuman)

 

 

जगन्नाथ पुरी रेलवे स्टेशन से समुद्र तट की ओर जाने पर लगभग आधा मील दूर श्री हनुमान जी का मंदिर मिलता है। मंदिर ऊंचे चबूतरे पर है। यहां श्री हनुमान जी के पैरों में बेड़ियां पडी है। कहते है कि समुद्र जगन्नाथ पुरी की सीमा में न बढ़ आए, इसके लिए भगवान जगन्नाथ जी ने यहां हनुमानजी को नियुक्त किया था, किंतु एक बार हनुमानजी श्री रामनवमी महोत्सव देखने अयोध्या चले गए। इस पर भगवान ने उनके पैरों में बेड़ी डाल दी, जिससे वे फिर कहीं न जा सकें।

 

 

 

कानवत हनुमान (kaanvat Hanuman)

 

 

यह हनुमान जी का मंदिर श्री जगन्नाथ मंदिर से आधा मील दूर है। समुद्र की गर्जन ध्वनि से सुभद्रा जी की निंद्रा भंग होती थी, इसलिए यहां हनुमानजी की नियुक्ति हुई। हनुमानजी कान लगाए सुनते रहते थे कि समुद्र की ध्वनि यहां तक आती तो नहीं है। इनके अलावा भी जगन्नाथ पुरी धाम मे अनेक मंदिर है। सभी का यहां वर्णन करना संभव नहीं है। जगन्नाथ पुरी को मंदिरों की नगरी भी कहा जाता है।

 

 

 

 

जगन्नाथ पुरी कैसे पहुंचे (How to reach jagannathpuri)

 

 

 

हवाई द्वारा: निकटतम हवाई अड्डा भुवनेश्वर, 60 किमी है।

रेल द्वारा: रेल के माध्यम से पुरी पहुंचना – पुरी पूर्वी तट रेलवे पर एक टर्मिनस है जिसमें नई दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, ओखा, अहमदाबाद, तिरूपति आदि के साथ प्रत्यक्ष एक्सप्रेस और सुपर फास्ट ट्रेन लिंक हैं। कुछ महत्वपूर्ण ट्रेनें कोलकाता (हावड़ा) पुरी हावड़ा एक्सप्रेस, जगन्नाथ एक्सप्रेस; नई दिल्ली; पुरुषोत्तम एक्सप्रेस। पुरी से 44 किमी दूर खुर्दा रोड स्टेशन चेन्नई और पश्चिमी भारत में ट्रेन के लिए सुविधाजनक रेल हेड है। स्टेशन शहर के लगभग एक किमी उत्तर में है। साइकिल रिक्शा और ऑटो रिक्शा आपको होटल में लाने के लिए आक्रामक रूप से प्रतिस्पर्धा करती हैं।

सड़क से: सड़क के माध्यम से पुरी पहुंचे – गुंडिचा मंदिर के पास बस स्टैंड भुवनेश्वर और कटक से कनेक्शन प्रदान करता है, हर 10-15 मिनट में सेवा प्रदान करता है। कोणार्क के लिए मिनीबस हर 20-30 मिनट और जतिबाबा छक से भी निकलते हैं। कोलकाता और विशाखापत्तनम के लिए सीधी बसें हैं।

 

 

 

 

 

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