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चन्द्रशेखर वेंकट रमन की जीवनी – वेंकट रमन बायोग्राफी इन हिन्दी

चन्द्रशेखर वेंकट रमन की जीवनी – वेंकट रमन बायोग्राफी इन हिन्दी

विज्ञान के क्षेत्र में भारत की पताका विश्व भर में फहराने वाले महान वैज्ञानिक चन्द्रशेखर वेंकट रमन का जन्म 7 नवंबर 1888 को दक्षिण भारत के तमिलनाडु राज्य के तिरूचिरापल्ली जिले के थिरूवनैक्कवल नामक गांव में एक साधारण, किंतु ज्ञान-विज्ञान से समृद्ध ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे अपने माता पिता की दूसरी संतान थे।

 

 

वेंकटरमन के पिता श्री चन्द्रशेखर अय्यर गणित, विज्ञान और दर्शनशास्त्र के अच्छे विद्वान होने के साथ साथ संगीत मे भी विशेष रूची रखते थे। विशेषकर वायलिन और वीणावादन में तो उन्हें महारत हासिल थी। जब वेंकट रमन का जन्म हुआ, उस समय वे तिरूचिरापल्ली के ही एक हाईस्कूल में अध्यापक के पद पर कार्यरत थे।अध्यापन के कार्य के साथ साथ उन्हें स्वयं अध्ययन में भी विशेष रूचि थी। अनेक विषयों की पुस्तकों का उनके पास एक अच्छा संग्रह था। अपनी विद्वता और परिश्रम के बल पर वे वेंकट रमन के जन्म के कुछ ही वर्षों बाद आंध्रप्रदेश के विशाखापत्तनम के मिसेज ए.वी.एन कॉलेज में भौतिकी के प्रोफेसर पद पर नियुक्त हो गए।

 

 

चन्द्रशेखर वेंकट रमन की माता पार्वती अम्मल एक शास्त्री परिवार की कन्या होने के नाते स्वंय भी धार्मिक विचारों वाली एवं संस्कारवान थी। उन्होंने अपनी सभी संतानों की भांति बालक रमन को भी अपने देश की महान सभ्यता व संस्कृति से परिचित कराया।

 

स्वभाविक था कि बालक वेंकटरमन के बाल मन पर अपने विद्वान और गुणी माता पिता के संस्कारों का गहरा प्रभाव पडा। वेंकट रमन के पहले शिक्षक उनके पिता ही बने, जिन्होंने उनमें बचपन से ही संगीत और विज्ञान के विषयों के प्रति रूचि जाग्रत की। बालक रमन को भी जैसे विद्या की देवी सरस्वती का विशेष वरदान प्राप्त था। बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि होने के कारण वे शीघ्र ही प्रत्येक विषय की गहराइयों को समझ लेते थे।

 

वेंकट रमन कितनी तीव्र बुद्धि के बालक थे, इसका अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है, कि मात्र 11 साल की आयु मे आते आते जब वे हाईस्कूल की परीक्षा की तैयारियों मे जुटे थे, तब तक उन्हें भौतिक विज्ञान की अनेक पुस्तकें याद हो चुकी थी।

 

जिस अवस्था मे रमन के सहपाठी बालक खेलों मे प्रसन्न रहते, वेंकटरमन उस अवस्था मे अत्यंत गम्भीरता से विज्ञान और प्रकृति के रहस्यों को जानने और समझने में ही लगे रहते थे। कुछ तो जन्म से ही और कुछ अत्यधिक विद्या अध्ययन ने पहले से अस्वस्थ प्रकृति के रमन को और भी दुबला पतला कर दिया था। उनकी माता स्वास्थ्य के प्रति उनकी इस लापरवाही के प्रति चिंतित होकर उन्हें सचेत करती थी। किंतु वेंकट रमन बडे प्रेम से मां को समझा बुझाकर पुनः अध्ययन में जुट जाते थे।

 

 

उन्हीं दिनो की बात है कि महान समाज सुधारक और भारत प्रेमी श्रीमती ऐनी बेसेन्ट के विचारों से प्रभावित होकर रमन की रूचि भारत की महान सभ्यता और संस्कृति से ओत प्रोत धार्मिक ग्रंथो के अध्ययन की ओर मुड गई। कुछ समय के लिए वे अपने मूल विषय विज्ञान से विमुख होकर भारतीय जीवन पद्धति के पोषक और परिचायक ग्रंथों के अध्ययन में डूब गए।

 

 

 

चंद्रशेखर वेंकट रमन
चंद्रशेखर वेंकट रमन

 

 

 

चन्द्रशेखर वेंकट रमन की कॉलेज शिक्षा

 

 

रमन तो जैसे उत्पन्न विज्ञान की सेवा के लिए हुए थे। शीघ्र ही वे धर्म ग्रंथों के अलौकिक संसार से निकलकर पुनः भौतिकी विज्ञान के अध्ययन में जुट गए । वर्ष 1899 में मात्र 11 वर्ष की अल्पावस्थ मे ही रमन ने प्रथम श्रेणी से हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी।

 

वर्ष 1901 मे 13 साल की आयु मे ही चन्द्रशेखर वेंकट रमन ने इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की। परंतु इस परीक्षा में उनका विषय विज्ञान नही था।

रमन के कॉलेज के प्रिंसिपल श्र अयंगर,  रमन के पडोस मे ही रहते थे, जिनसे वेंकट रमन अंग्रेजी पढ़ा करते थे। श्री अयंगर, वेंकटरमन के भीतर छिपी महान वैज्ञानिक प्रतिभा को पहचानते थे। इंटर के बाद उन्ही की प्रेरणा से रमन ने अपना ध्यान पुनः भौतिकी विज्ञान की ओर लगाया और वर्ष 1902 में मद्रास के प्रेसिडेंसी कॉलेज मे प्रवेश लिया।

 

जिस रमन ने भौतिकी विज्ञान के छात्र के रूप में पहली बार बी.एस.सी (तब बी.ए) की कक्षा मे प्रवेश किया, तब रमन आयु मात्र 14 साल की थी, और अति साधारण वेशभूषा और दुबले पतले शरीर के कारण वे किसी बडी कक्षा के बालक नही दिखते थे। जब पहली बार उनके अंग्रेजी के प्रोफेसर ई. एच. इलियट ने उन्हे कक्षा में बठे देखा तो वो हैरानी से उन्हें देखकर सोचने लगे, कि अवश्य ही यह बालक भूल से इस बडी कक्षा मे आ बैठा है। उनके पूछने पर जब रमन ने अपनी वास्तविक आयु और शैक्षिक योग्यता के विषय में बताया तो वो रमन की योग्यता व प्रतिभा के प्रति मंत्रमुग्ध हो गए। जल्दी ही प्रोफेसर ही नही सारे कॉलेज के छात्र भी रमन के भीतर छिपी महान वैज्ञानिक प्रतिभा से परिचित हो गए। वे एकमात्र ऐसे छात्र बन गए, जिन्हें कॉलेज मे स्वतंत्र रूप से अध्ययन करने की छूट प्रदान की गई। सन् 1907  मे उन्होंने अपने विश्वविद्यालय के इतिहास में सर्वाधिक अंक प्राप्त कर भौतिकी विज्ञान की परीक्षा उत्तीर्ण की, और कॉलेज के सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी का भी पुरस्कार प्राप्त किया।

 

 

प्रेसिडेंसी कॉलेज की पढाई के साथ साथ ही वेंकट रमन भौतिकी विज्ञान के प्रयोगों से भी जुडे रहे थे। शोध कार्यों मे उनकी रूची बढ़ती ही जा रही थी। इसी के चलते सन् 1906 मे लंदन की एक प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका “फिलॉसफिकल मैगजीन” में उनका एक शोधपत्र भी प्रकाशित हुआ, जिसका शीर्षक था, “अनसिमेट्रिकल डिफ्रैक्शन बैंड्स ड्यू टू रैक्टैंगुलर एपर्चर”। यह शोधपत्र प्रकाश के विवर्तन के नवीन सिद्धांत की पुष्टि करता था। इसके बाद तो देश विदेश की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में चन्द्रशेखर वेंकट रमन क लेख और शोध प्रकाशित होने लगे।

 

 

एम. एस.सी की परीक्षा अव्वल अंकों से उत्तीर्ण करने के पश्चात रमन के अध्यापकों ने विज्ञान के विषय में उनकी अद्भुत योग्यता, प्रतिभा व रूची को देखते हुए उन्हे उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने के लिए प्रेरित किया। कॉलेज प्रशासन और सरकार द्वारा भी विदेश जाने के लिए उन्हें छात्रवृत्ति देने पर सहमति प्रदान कर दी गई थी। कहा जाता है कि अच्छे काम में अनेक बाधाएं आती है। वेंकट रमन के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। विदेश जाने के लिए एक चिकित्सकीय प्रमाण पत्र की आवश्यकता होती है। रमन का स्वास्थ्य जैसा होना चाहिए था, वैसा न था। अतः प्रमाण पत्र के अभाव और चिकित्सक के परामर्श पर उन्हें विदेश जाने का कार्यक्रम स्थगित कर देना पडा।

 

 

 

स्वास्थ्य कारणों से विदेश न जा सकने का रमन, उनके अध्यापकों और परिजनों को बहुत दुख हुआ, किंतु अब समय था भविष्य पर ध्यान देने का। यह सच है कि वेंकट रमन जीवन में जो कुछ भी करना चाहते थे, वह विज्ञान के क्षेत्र में ही करना चाहते थे। किंतु इस समय उनके परिजनों और शुभचिंतकों की इच्छा यही थी कि वे पहले आत्मनिर्भर बने और अपने परिवार को आर्थिक सहायता प्रदान करें।

 

रमन ने भी आपनी इस जिम्मेदारी को समझा और सरकार के अर्थ विभाग में नियुक्ति के लिए आयोजित परीक्षा की तैयारियों में जुट गए। एक विज्ञान के छात्र के लिए इतिहास, संस्कृत, राजनीतिक और अर्थशास्त्र जैसे अरूचिकर विषयों का अध्ययन करना बडा कठिन कार्य था। किंतु मेधावी रमन ने यह भी कर दिखाया। वह इस परिक्षा मे सर्वोच्च अंको सहित उत्तीर्ण हुए और सन् 1907 में कोलकाता में डिप्टी एकाउंटेंट जनरल के पद पर नियुक्त हो गए।

 

 

 

वेंकट रमन का विवाह

 

रमन और उनकी कुल परंपरा के अनुसार अब तक उनका विवाह हो जाना चाहिए था। किंतु अपने अध्ययन और पहले आत्मनिर्भर बनने के उद्देश्यों को लेकर रमन अब तक इसे टालते रहे थे। सरकारी नौकरी मिल जाने के बाद अब इससे इंकार करना सम्भव नही था। क्योंकि उनके माता-पिता की इच्छा भी यही थी कि रमन जल्दी से अपना घर बसा ले।

 

मद्रास के सामुद्रिक चूंगी विभाग के सुपरिटेंडेंट श्री कृष्ण स्वामी अय्यर के यहां रमन का अक्सर आना जाना लगा रहता था। उनकी एक सुंदर पुत्री थी। रमन भी उसकी ओर आकर्षित थे। श्री अय्यर की पत्नी रूक्मणि अम्मल स्वंय रमन जैसे प्रतिभाशाली और सरकारी नौकरी प्राप्त युवक को अपना दामाद बनाना चाहती थी। जल्दी ही उनका विवाह हो गया। वास्तव में अपने विज्ञान विषय की तरह यह विवाह भी रमन का अपना चयन था, जिसमें उन्होंने सफलता प्राप्त की। विवाह के बाद वेंकट रमन अपनी पत्नी के साथ कोलकाता मे एक किराए के मकान में रहने लगे।

 

 

 

वैज्ञानिक ह्रदय की उत्कंठा

 

 

सुख -सुविधाओं  से पूर्ण एक अच्छी सरकारी नौकरी  और पति के प्रति पूरी तरह समर्पित पत्नी को पाकर  भी रमर का ध्यान इन सबसे बहुत दूर विज्ञान की और लगा रहता था । यद्यपि नौकरी और गृहस्थी के साथ -साथ वे अपने  वैज्ञानिक अनुसंधान के कार्यों मे लगे रहते थे, किंतु विज्ञान की जिन ऊंचाइयों को वे छूना चाहते थे, इस तरह वह कहीं से भी सम्भव नही दिखता था। यही कारण था। कि समस्त सांसारिक सुखों से भरे अपने जीवन मे उन्हें कोई आकर्षण नहीं दिखता था।

 

 

एक दिन वे इन्हीं विचारों में खोए हुये थे, कि किस प्रकार अपने वैज्ञानिक कार्यों को उनकी परिणति तक पहुंचाए, रमन ट्राम में बैठकर दफ्तर से घर जा रहे थे, कि उनकी नजर एक बोर्ड पर पडी जिस पर लिखा था। “द इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ साइंस”। बोर्ड पर लिखे शब्दों को पढते ही उनके मन में अपने जीवन की साध पूरी करने की संभावना चमक उठी। वे उसी समय ट्राम से उतर पडे और बोर्ड पर लिखे पते पर जा पहुंचे।

 

 

“द इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ साइंस” कोलकाता के एक धनी डॉक्टर और विज्ञान में गहन रूची रखने वाले महेंद्र लाल सरकार द्वारा वर्ष 1876 मे स्थापित की गई, भारत की अपने तरह की पहली वैज्ञानिक शोध संस्था थी। कभी वैज्ञानिक क्रिया कलापों का प्रमुख और एकमात्र केंद्र रही यह संस्था अब महेंद्र सरकार के न रहने और ब्रिटिश सरकार की असहयोगी नीतियों के कारण निष्क्रिय पडी थी। संस्थान में पहुंचने पर रमन की भेंट संस्थान के सचिव अमृत लाल सरकार जो कि महेंद्र लाल सरकार के पुत्र और आशुतोष मुखर्जी एवं गुरदास बैनर्जी जैसे योग्य और प्रभावशाली व्यक्तियों से हुई। जब वेंकट रमन ने उन्हें अपना परिचय देकर वहां आने का अपना मकसद बताया तो उन्होंने रमन के भीतर छिपी महान वैज्ञानिक प्रतिभा को पहचानकर उसी समय वैज्ञानिक अनुसंधान कार्यों के लिए व संस्थान और उसकी प्रयोगशाला के समस्त अधिकार रमन को सौंप दिए।

 

 

रमन को तो जैसे उनकी मनचाही दुनिया मिल गई थी। वर्षों से बंद पडी प्रयोगशाला में उपकरण और अन्य संसाधन खस्ताहाल और सीमित थे। किंतु रमन ने शीघ्र ही संस्थान से जुडे आशुतोष मुखर्जी के सहयोग से उसे पुनः व्यवस्थित कर दिया। अब तो रमन अपनी सरकारी नौकरी और गृहस्थी के दायित्वों को पूरा करने के बाद बचा समय इसी प्रयोगशाला मे रहकर अपने अनुसंधान कार्यों में लगाने लगे। रमन अपने वित्त विभाग की नौकरी और प्रयोगशाला के अपने अनुसंधान कार्यों मे तन्मयता से जुटे ही थे, कि सन् 1909 में उनका स्थानांतरण रंगून (बर्मा) कर दिया गया, जो उस समय भारत का ही अंग था। ऐसे में उनका अनुसंधान कार्य कुछ समय के लिए बाधित हो गया था।

 

 

 

पिता का देहांत

 

उन दिनों वेंकट रमन रंगून मे ही थे कि सन् 1910 मे उन्हें अपने पिता की मृत्यु का दुखद समाचार मिला। छः माह का अवकाश लेकर वे मद्रास लौटे, वहां पिता का श्राद्ध कर्म आदि पूरा कर पुनः प्रयोगशाला के कार्य मे लग गए। वे प्रेसिडेंसी कॉलेज की प्रयोगशाला में भी जाने लगे। कुछ समय बाद उनका स्थानांतरण रंगून से नागपुर कर दिया गया। सन् 1911 मे जब वे पुनः कोलकाता लौटे तो उन्हें कोलकाता के डाक तार विभाग का मुख्य एकाउंटेंट बना दिया गया। यद्यपि सरकार ने उनकी कार्य क्षमता से प्रभावित होकर उन्हे सेक्ट्रेट में बुलाना चाहा, किंतु उन्होंने स्वीकार नही किया।

 

 

 

वेंकट रमन की उपलब्धियां

 

 

कोलकाता से रंगून, फिर नागपुर और पुनः कोलकाता लौटने पर रमन ने अपना पूरा ध्यान विज्ञान के कार्यों में लगा दिया था। उन्होंने अपनी एक विज्ञान पत्रिका भी आरम्भ की जिसमें उन्होंने अपने वैज्ञानिक कार्यों व अनुसंधानों से सम्बंधित लेखो का ब्योरा प्रस्तुत किया। इसका परिणाम यह हुआ कि रमन की ख्याति एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक के रूप में देश विदेश तक फैल गई थी।

 

रमन के कार्यों से प्रभावित होकर शीघ्र ही भारतीय वैज्ञानिक अनुसंधान परिषद द्वारा उन्हें इस संस्था का उपसभापति बना दिया गया। जिस समय वेंकट रमन प्रेसीडेंसी कॉलेज मे थे, उन्हीं दिनो उनकी रूची ध्वनि विज्ञान की ओर हो चली थी। विशेषकर भारतीय वाद्ययंत्रों और पश्चिमी वाद्ययंत्रों के संबंध मे चले आ रहे पारंपरिक ध्वनि सिद्धांतों ने उन्हें सोच में डाल दिया था। उनका ध्यान इस ओर गया कि भारतीय वाद्ययंत्र जैसे वीणा, मृदंग, सारंगी, सितार, पियानों और वायलिन जैसे वाद्ययंत्र मधुर संगीत कैसे उत्पन्न करते है।

 

ध्वनि कम्पन और शब्द विज्ञान के इस विषय पर उनकी रूचि इतनी बढ़ी कि वे गंभीरता से इसके अध्ययन और अनुसंधान कार्यों में जुट गए थे। एक दिन वह भी आया जब उन्होंने महान ध्वनि विज्ञानी मेल्डे द्वारा प्रतिपादित पारंपरिक ध्वनि और शब्द विज्ञान के सिद्धांतों में संशोधन करके अपने नवीन और तर्कपूर्ण सिद्धांतों का प्रतिपादन किया। उनकी इस खोज ने शीघ्र ही विश्व भर के वैज्ञानिक समुदाय को इनके प्रति आकर्षित कर दिया। अब रमन मात्र 25 साल की आयु में ही ख्याति प्राप्त वैज्ञानिकों में गिने जाने लगे थे।

 

 

सन् 1922 में वेंकट रमन ने प्रकाश विज्ञान पर अपना गहन शोध कार्य आरम्भ कर दिया। इस काम में सहयोगी बने उनके प्रिय शिष्य के. एस कृष्णन। इस शोध के माध्यम से रमन ने यह सिद्ध कर दिया था कि मात्र पारदर्शी द्रव्यों में ही नहीं, बल्कि बर्फ जैसे अन्य ठोस पदार्थों में भी अणुओं की गति के कारण प्रकाश किरणों का परिक्षेपण होता है। अत्यंत सिमित साधनों और उपकरणों के बल पर किये गए इस शोध कार्य के पीछे छिपी रमन की अटूट लगन और समर्पण भावना को देखते हुए। सन् 1922 में कोलकाता विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें डॉक्टर ऑफ साइंस की उपाधि से सम्मानित किया गया था।

 

 

सन् 1924 में प्रकाश विज्ञान के क्षेत्र में उनके मौलिक योगदान के लिए वेंकट रमन को विश्व की प्रतिष्ठित ,रॉयल सोसायटी ऑफ साइंस, का सदस्य बना लिया गया। केवल रमन ही नही, बल्कि भारत के लिए भी यह बडे गर्व की बात थी।

 

 

इसके बाद रमन ने 28 फरवरी सन् 1928 को प्रकाश संबंधित अपनी एक ओर नई खोज न्यूरेडिएशन को दुनिया के सामने रखा। उनके दो शिष्यों के. एस कृष्णन तथा वेंकटेश्वरम ने उनकी इस खोज को प्रमाणो व चित्रो सहित लिखित रूप दिया। उनकी यह खोज विश्व मे रमन प्रभाव , रमन इफेक्ट, के नाम से प्रसिद्ध हुई। विश्व के अनेक वैज्ञानिकों और विज्ञान से जुडी संस्थाओं ने रमन की इस उपलब्धि की भरपूर सराहना की। सम्मानो और पुरस्कारों की तो जैसे बाढ़ आ गई थी। सन् 1929 मे मद्रास मे होने वाली भारतीय विज्ञान कांफ्रेंस का उन्हें सभापति चुना गया। इसी साल ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हे ,सर, की उपाधि से सम्मानित किया गया। इसके अलावा भी देश विदेश के अनेक विश्वविद्यालयों द्वारा उन्हें मानद उपाधि देकर स्वयं को गौरवान्वित किया गया।

 

 

 

नोबेल पुरस्कार की प्राप्ति

 

 

महान वैज्ञानिक वेंकट रमन के जीवन और उनके कार्यों तथा भारत के इतिहास की दृष्टि से नवंबर सन् 1930 का दिन एक नई गौरव गाथा लिख गया था। जब वेंकट रमन को उस वर्ष का भौतिकी विज्ञान का नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा की गई। रमन के लिए इस पुरस्कार का प्रस्ताव सर रदरफोर्ड, नील्स बोर, चाल्सन, चार्ल्स फैबी जैसे महान वैज्ञानिकों ने किया था। रमन के लिए यह पुरस्कार सम्मान और प्रसन्नता का अनमोल खजाना तो था। किंतु अप्रत्याशित नही था। विज्ञान के क्षेत्र में की गई अपनी अखंड तपस्या और साधना पर उन्हें इतना विश्वास था कि वे पहले ही जानते थे, इस वर्ष यह पुरस्कार उनको ही मिलेगा। यही कारण था कि पुरस्कार वितरण समारोह में समय से पहुंचने के लिए उन्होंने पुरस्कार की घोषणा किए जाने से पहले ही अपने व अपनी पत्नी के लिए जहाज के दो टिकट बुक करा लिए थे। अतः वह.शुभ दिन भी आ पहुंचा जब 10 दिसंबर सन् 1930 को रमन अपनी पत्नी के साथ स्टाकहोम में आयोजित पुरस्कार वितरण समारोह में उपस्थित हुए। जब रमन को स्वीडन के सम्राट द्वारा यह पुरस्कार प्रदान किया गया,

 

 

 

भारत के वैज्ञानिक विकास मे महत्त्वपूर्ण योगदान

 

 

नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर भारत लौटने पर वेंकट रमन ने कहा कि , मेरे जैसे न जाने कितने रमन सुविधाओं और अवसर के अभाव में यूं ही अपनी प्रतिभा गवां देते है। यह मात्र उनका ही नही बल्कि पूरे भारत देश का नुकसान है। हमें इसे रोकना होगा।

 

अपने इस संकल्प को पूरा करने के लिए उन्होंने कडी मेहनत की और जिसके परिणाम स्वरूप उन्होंने सन् 1934 मे बंगलौर में इंडियन एकेडमी ऑफ साइंस, नामक एक पूर्णतः स्वतंत्र वैज्ञानिक संस्थान की स्थापना कर डाली। रमन के निर्देशन में इस संस्थान ने भारतीय और विदेशी वैज्ञानिक प्रतिभाओं को एक ही मंच पर लाकर वैज्ञानिक  अनुसंधान के कार्यों को वैश्विक स्तर पर आगे बढाने का कार्य तो किया ही, साथ ही इस बात पर ध्यान दिया कि संसाधनों अथवा सुविधाओं के अभाव में भारतीय प्रतिभाएं विदेशों की ओर पलायन न करें। साइंस एकेडमी को अपनी अप्रतिम सेवाएं देने के पश्चात रमन ने सन् 1943 में विज्ञान की दुनिया में एक ओर मील का पत्थर स्थापित किया। इसी साल उन्होंने बैंगलोर में रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना की। देश के युवा वैज्ञानिकों की शक्ति को अपने साथ लेकर रमन अब पूर्णतः विज्ञान एकाकार हो गए थे। उनके संस्थान के कार्यों का लेखा जोखा उन्हीं के द्वारा संपादित और प्रकाशित करेंट साइंस नामक एक विज्ञान पत्रिका में प्रकाशित होने लगा। जो शीघ्र ही विश्व की एक प्रमुख विज्ञान पत्रिका के रूप में प्रसिद्ध हो गई।

 

सन् 1954 में भारत सरकार द्वारा इस महान वैज्ञानिक को भारत रत्न के सर्वोच्च नागरिक सम्मान द्वारा सम्मानित किया गया। इसके कुछ ही सालों बाद 1957 में रूसी सरकार द्वारा रमन को रूस का सर्वोच्च सम्मान ,लेनिन शांति पुरस्कार, प्रदान किया गया।

 

 

 

चंद्रशेखर वेंकट रमन की मृत्यु

 

 

वेंकट रमन की आयु 70साल हो चुकी थी। किंतु उन्होंने कभी अपनी बढती आयु को अपने अनुसंधान कार्यों पर हावी नही होने दिया। कभी ध्वनि विज्ञान और प्रकाश विज्ञान के क्षेत्र मे अपने अनुसंधान कार्यों व नवीन खोजों के बल पर विश्व को विज्ञान के नए व अद्भुत रहस्यों से परिचित कराने वाले रमन इस समय स्वयं को प्रकृति के अत्यंत निकट पाने लगे थे।

हमेशा कुछ नया कर दिखाने की चाह उन्हें खनिज पदार्थों, रंग बिरंगे कीट पतंगों और फिर रंग बिरंगे फूलो की दुनिया में ले आई। उन्होंने इन विषयो मे भी अपने सतत अनुसंधानों द्वारा ऐसे निष्कर्ष व सिद्धांतों का प्रतिपादन किया जो आज भी सर्वमान्य है।

 

प्रकृति और उसकी सुंदरता से उन्हें इतना प्रेम था, इसका उदाहरण इसी बात से लगाया जा सकता है कि बैंगलोर स्थित उनका रमन संस्थान आज भी बाहर से देखने पर रंग बिरंगे और हरे भरे पेड पौधों से भरा ऐसा मनोरम उद्यान दिखाई पडता है कि सहसा इस बात पर विश्वास करना कठिन हो जाता है कि इस हरे भरे उद्यान के बीच कही विश्व को चमत्कृत कर देने वाले वैज्ञानिक अनुसंधानों मे जुटा कोई वैज्ञानिक अपनी विज्ञान साधना में लीन रहता है।

 

आखिर वह दिन आ ही गया जब विज्ञान को समर्पित यह महान वैज्ञानिक जीवन मृत्यु की असीम गहराइयों मे विलीन हो गया। 21 नवंबर सन् 1970 को सुबह 7ः30 बजे बंगलौर मे 82 वर्ष की आयु में इस महान भारतीय वैज्ञानिक ने अपनी अंतिम सांस ली।

 

यद्यपि चंद्रशेखर वेंकट रमन आज हमारे बीच नही है। किंतु अपने रमन प्रभाव द्वारा वे दुनिया पर ऐसा प्रभाव छोड गए है। जो शायद ही कभी कम हो। जब तक इस धरती पर विज्ञान रहेगा और वैज्ञानिक अनुसंधान किए जाते रहेंगे उनके रमन प्रभाव की प्रासंगिकता बनी रहेगी।

 

 

 

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