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खैबर की जंग – खैबर की लड़ाई – महमूद गजनवी और अनंगपाल का युद्ध

खैबर की जंग – खैबर की लड़ाई – महमूद गजनवी और अनंगपाल का युद्ध

खैबर दर्रा नामक स्थान उत्तर पश्चिमी पाकिस्तान की सीमा और अफ़ग़ानिस्तान के काबुलिस्तान मैदान के बीच हिन्दुकुश के सफ़ेद कोह पर्वत शृंखला में स्थित एक प्रख्यात दर्रा है। यही वह स्थान है जहाँ पर खैबर की जंग हुई थी। खैबर दर्रा क्या है? यह 1070 मीटर (3510 फ़ुट) की ऊँचाई पर सफ़ेद कोह शृंखला में एक प्राकृतिक घाटी है। उस समय में इस दर्रे के ज़रिये भारतीय उपमहाद्वीप और मध्य एशिया के बीच आवागमन का यह एकमात्र सुगम मार्ग था। जिसके कारण इस क्षेत्र ने इतिहास अपनी पर गहरी छाप छोड़ी है। ख़ैबर दर्रा लगभग 52.8 कि.मी. लम्बा है और इसका सबसे सँकरा भाग केवल 10 फुट चौड़ा है। इस दर्रे के पूर्वी भारतीय छोर पर पेशावर तथा लंदी कोतल स्थित है, जहाँ से अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल को मार्ग जाता है। उत्तर-पश्चिम से भारत पर आक्रमण करने वाले अधिकांश आक्रमणकारी इसी दर्रे से भारत में आये। अब यह दर्रा पाकिस्तान के पश्चिमी पंजाब प्रान्त को अफ़ग़ानिस्तान से जोड़ता है। प्राचीन काल के हिन्दू राजा विदेशी आक्रमणकारियों से इस दर्रे की रक्षा नहीं कर सके। शकों और हूणों ने भी इसी मार्ग से ही आकर आक्रमण किया था। यहां तक कि खैबर का युद्ध के बाद मुस्लिम शासन काल में तैमूर, बाबर, हुमायूंनादिरशाह तथा अहमद शाह अब्दाली ने इसी दर्रे से होकर भारत पर चढ़ाई की थी जब पंजाब ब्रिटिश शासन में आ गया, तभी ख़ैबर दर्रे की समुचित रक्षा व्यवस्था की जा सकी और उसके बाद इस मार्ग से भारत पर फिर कोई आक्रमण नहीं हुआ।

 

 

खैबर की लड़ाई का यह मैदान आज खैबर पख्तूनख्वा पाकिस्तान में है। इसी स्थान पर खैबर की जंग बड़े ही भीषण रूप में हुई थी। यह जंगे खैबर की लड़ाई भारत की और से राजा अनंगपाल और विदेशी आक्रमणकारी तुर्की के शासक महमूद सुल्तान गजनवी के बीच हुई थी। जिसमें दोनों ओर से लाखों सैनिकों ने अपना बलिदान दिया था। यह जंगे खैबर की जंग, खैबर के इतिहास में एक बड़ी मानव त्रासदी रही है। अपने इस लेख में हम खैबर की जंग और खैबर पख्तूनख्वा के बारें में विस्तार से जानेगें। खैबर का युद्ध 1008 ईसवीं में महमूद गजनवी और राजा अनंगपाल के बीच हुआ था लेकिन इस भीषण संग्राम के इतिहास को सही और अच्छी तरह जानने के लिए हमें इसके पिछे इतिहास को शुरू से जानना बहुत जरुरी।

 

 

उस समय भारत की राजनीतिक स्थिति

 

भारत के राजाओं और नरेशों की आपसी फूट और ईर्ष्या ने न केवल उनको और अयोग्य बना दिया था, बल्कि उनकी इन कमजोरियों ने विदेशी विजेताओं को इस देश में विध्वंसकारी आक्रमण करने, लूटने और अमानुषिक अत्याचार करने के लिए द्वार खोल दिया था। इसका लाभ विदेशियों ने उठाया। ईरान वाले आगे बढ़े और देश की सीमा तक आकर किनारे के कुछ स्थानों और नगरों में थोडे समय के लिए आधिपत्य स्थापित करके लौट गये, उनके बाद यूनानियों ने भारत में प्रवेश किया और पंजाब के अनेक स्थानों को युद्ध क्षेत्र बनाकर अपने रणकौशल का प्रदर्शन किया।

 

इन विदेशी हमलों का एक दुष्परिणाम यह निकला कि इस देश में बहारी लुटेरों के आने का रास्ता खुल गया था। किसी भी शक्तिशाली देश के निवासी, सम्पत्ति की लूट करने के लिए बिना किसी भय के भारत में आने लगे और यहां की अपरिमित सम्पत्ति को लूटकर ले जाने लगे। अपने देशों को सम्पत्तिशाली बनाने के लिए उनको सबसे आसान रास्ता यह मिला कि वे लाखों की संख्या में आकर इस देश पर टूट पड़े, मारे, काटे और जितनी समपत्ति यहां से वे लूटकर ले जा सके ले जावें। इस देश के राजाओं और नरेशों के पास इसकी रोक का कोई उपाय न रहा। उस समय देश में समपत्ति की अधिकता थी। उस अपार सम्पत्ति का कोई एक संरक्षक न था। जिनके उपर देश की लक्ष्मी के संरक्षण का भार था, वे सैकड़ों की संख्या में इधरउधर बिखरें हुए थे। वे आपस में लड़कर अपनी संख्या बढाते जाते थे। देश में कोई एक बड़ी शक्ति न थी। छिन्न भिन्न शक्तियों में भी परस्पर स्नेह न था। सभी एक दूसरे का पतन देखना चाहते थे। अपने द्वेष से भरी हुई इस अभिलाषा में उन्होंने एक दूसरे को मिट्टी में मिलते हुए देखा और उसके साथ वे खुद भी मिट्टी में मिल गये।

 

भारत में अरब वालों का आक्रमण

 

गीता में दी गई कृष्ण की यद्ध शिक्षा भारत में लुप्त हो चुकी थी, और त्याग तथा वैराग्य ने उसके स्थान पर अधिकार कर लिया था। ईसा से 700 वर्ष पहले जैन धर्म ने और 600 वर्ष पहले बौद्ध धर्म के ने अहिंसा की शिक्षा देना आरंभ किया था। इन उपदेशों और शिक्षाओं से अभिभूत होकर जिस भारत ने अहिंसा को ही अपने जीवन का सर्वस्व समझा था। उसी भारत की भूमि को हिंसामय बनाकर उसकी प्यारी संतानों के रक्त की देश में खूब नदियां बहाई गई। पांचवीं शताब्दी के मध्य काल में हूणों का आक्रमण आरंभ हुए थे और छठी शताब्दी के मध्य काल तक उनके हमलों का सिलसिलें बराबर जारी रहे। सातवीं शताब्दी किसी प्रकार बीत गई। अभी तक पीछले हमलों से होने वाली क्षतियों की पूर्ति न हो पायी थी, कि अचानक अरब वालों ने लालयित नेत्रों से भारत की ओर देखा। उनके कानों में सुनाई पड़ा था कि मध्य एशिया की आक्रमणकारी जातियों ने भारत का धन लूट कर अपने देश को मालामाल कर दिया है। इन संवादों को सुनकर अरब वाले भारत पर हमला करने और यहां का धन लूटने की तैयारी करने लगे।

 

 

सबसे पहले लगभग 627 ईसवीं में अरब वालों का एक गिरोह भारत की ओर रवाना हुआ। लेकिन वह गिरोह वहां तक पहुंचा, जहाँ पर आज बम्बई बसा हुआ है। उन दिनों में अरब का शासन खलीफा ओमर के अधिकार में था। उसके बाद अरब वालो के दूसरे गिरोह भी भारत की ओर चले और वे भारत की सीमा तक पहुंच गये। इस प्रकार अरब से भारत में आने वाले रोजगारी थे। भारतीय देशों को जीतने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि साफ साफ लूटने के ख्याल से भारत में आये थे। इन आने वाले गिरोह में जो अधिक शक्तिशाली था, वह मकरान से रवाना होकर यहां आया था। इन दिनो इस्लाम का अभ्युदय काल था, और जो लोग अरब से भारत में उन दिनों आये थे वे इस्लाम की सेना बनाकर वहां पर पहुंचे थे। उनके आने का एकमात्र उद्देश्य था कि भारत के किसी स्थान में लूट मार करना और जो कुछ मिले उसे लूट ले जाना।

 

 

मुहम्मद बिन कासिम़ पहला मुसलमान था जिसने सन् 712 ईसवीं में एक शक्तिशाली सेना लेकर भारत पर आक्रमण किया और सिंध को जीतकर उसने मुलतान पर अधिकार कर लिया था। इन दिनों में भारत के राजाओं की शक्तियां बहुत क्षीण हो चुकी थी। सम्राट हर्षवर्धन के बाद फिर कोई प्रतापी राजा इस देश न हुआ। सम्राट हर्षवर्धन 606 ईसवीं में सिंहासन पर बैठा और 647 इसवीं थक बड़ी बुद्धिमानी के साथ उसने शासन किया। सम्राट हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद भारत की राज व्यवस्था लगातार गिरती गई। देश का शासन छोटे छोटे राजाओं के द्वारा चल रहा था। किसी पर भी किसी का अधिकार न था। जो राजा थे, वे धार्मिकता की लहरों में बह रहें थे। उनके निकट राज व्यवस्था और राजनीति का कोई महत्व न था। देश में कभी अहिंसा की वायु तेज दिखती थी, और कभी अध्यात्मवाद की।

 

 

इस्लाम का जोर

 

नवी शताब्दी के अंतिम दिनों में इस्लाम का जोर काफी बढ़ चुका था। लगभग पहली शताब्दी में इस्लाम धर्म ईरान, मिश्र, और एशिया के कई देशों में बहुत विस्तार पा चुका था। उसके मानने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जाती थी। इन्हीं दिनों में अरब वालों के आक्रमण काबुल पर हुए और वहां के राजा को पराजित करके उन लोगों ने नवी शताब्दी में काबुल पर अपना अधिकार कर लिया।

इसके बाद वे आगे बढने की कोशिश करने लगे। सन् 926 ईसवीं में आफ्तगीन नामक एक तुर्क गुलाम ने अपने तीन हजार तुर्क सवारों को लेकर अफगानिस्तान में गजनी के किले पर आक्रमण किया। उस किले का संरक्षण भाटिया लोगों के हाथों में था। अचानक हमला हो जाने पर उन लोगों ने तुर्क सेना का मुकाबला किया। भाटिया युद्ध में शूरवीर थे, लेकिन किले में उनकी संख्या बहुत थोड़ी थी, और इस आक्रमण की पहले से उनको कोई सूचना न थी, अचानक किला घेरे जाने पर भी उन लोगों ने बड़ी बहादुरी के साथ काफी समय तक युद्ध किया, लेकिन अंत में उनकी पराजय हुई। इसलिए किले को छोड़कर उनको भागना पड़ा और वे वहां से भागकर पंजाब के दक्षिण में आ गये।

 

 

मुस्लिम सेना ने भारत की सीमा को पार किया

 

 

सन् 976 ईसवीं में आफ्तगीन की मृत्यु हो गयी। उसके स्थान पर सुबुक्तगीन अधिकारी हुआ, कुछ दिनों के बाद उसने अपने आसपास के राज्यों पर हमला करना आरंभ कर दिया और काबुल, खुशसान, जूर्जन, बोस्ठ, हिरात को विजय कर उसने उन पर अपना अधिकार कर लिया। इसके बाद उसने पंजाब के महाराज जयपाल के साथ युद्ध किया और अंत में उसे पराजित करके उसने पेशावर पर भी अपना कब्जा कर लिया। सुबुक्तगीन ने उत्तर पश्चिम के मार्ग से भारत मे आकर आक्रमण किया यद्यपि वह अधिक दूर तक नहीं पहुंच सका। सुबुक्तगीन पेशावर के बाद आगे बढ़ना चाहता था, लेकिन वह एकाएक बिमार पड़ गया और उस बिमारी में सुबुक्तगीन की मृत्यु हो गई। सुबुक्तगीन की मृत्यु के बाद उसका पुत्र महमूद सुल्तान के नाम से बादशाह हुआ और महमूद गजनवी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। महमूद सुल्तान बलवान निडर चतुर और बहादुर था। छोटी अवस्था से ही वह इस्लाम का पक्का पक्षपाती था।

 

खैबर दर्रा
खैबर दर्रा

 

बादशाह होने के बाद से ही महमूद सुल्तान ने भारत पर आक्रमण करने के इरादे शुरू कर दिये। एक बहुत बड़ी सेना लेकर भारत में चढाई करने के उपायों को वह सोचने लगा। उसने अपने मंत्रियों के साथ परामर्श किया और अंत में उसने भारत पर हमला करने के लिए एक इस्लामी झंडा खड़ा किया और उस झंड़े के नीचे एक बड़ी सेना का विस्तार शुरू कर दिया। भारत में आक्रमण करने के लिए सुबुक्तगीन ने अपनी जिन्दगी में बड़े बड़े इरादे कर रखे थे, लेकिन उनको पुरा करने के पहले ही वह संसार से विदा हो गया। उसका लड़का महमूद उसी की तरह बहादुर और लड़ाकू था। उसने अपने पिता से भी अधिक साधनों के साथ भारत में हमला करने की पूरी तैयारी की।

 

 

महमूद गजनवी और भारत

 

जैसा की ऊपर लिखा गया है कि महमूद गजनवी सैनिक मनोवृत्ति का एक बहादुर मुसलमान था। मजहबी ताअसुब ने उसे भारत का शत्रु बना दिया था। इस्लाम का अभ्युदय काल था। एशिया के अनेक देश इस्लाम के झंडे के नीचे आ चुके थे। इस्लाम के नाम पर समस्त मुस्लिम देशों में जोश फैलाने का काम महमूद ने किया और उसे आशातीत सफलता मिली। महमूद गजनवी के इस कार्य में इस्लाम के विद्वानों ने प्रचार का काम किया। बगदाद के खलीफा ने संसार में इस्लाम को फैलाने और इस्लामी विजय के लिए महमूद को अधिकारी बनाया। उसने इस्लाम के इस महान कार्य के लिए महमूद को गजनी और खुरासान का न्यायोचित अधिपति मानकर हर्षपूर्वक अपनी अनुमति प्रदान की। महमूद ने इन मिले हुए अधिकारों के बदले में स्वीकार किया कि मैं प्रतयेक वर्ष इस पवित्र इस्लामी युद्ध के लिए हिन्दुस्तान पर आक्रमण करूगा। महमूद गजनवी ने अपने वादों को पूरा किया। उसने 1000 ईसवीं से लेकर 1026 ईसवीं तक भारत में सोलह भयानक आक्रमण किये इसमें खैबर की जंग भी शामिल है, और सिंध नदी से लेकर गंगा किनारे तक के राज्यों को उसने अपनी विशाल सेना के द्वारा पराजित किया। महमूद गजनवी का पहला आक्रमण भारत की सीमा के पास खैबर के निकटवर्ती शहरों पर हुआ। उसके पिता सुबुक्तगीन के पुराने शत्रु पंजाब के राजा जयपाल ने फिर से पेशावर पर अपना अधिकार कर लिया था। महमूद गजनवी ने सबसे पहले जयपाल को पराजित करने का निश्चय किया।

 

 

पेशावर में महमूद गजनवी सेना का मुकाबला

 

 

गजनी से रवाना होने से पहले महमूद सुल्तान के पास इस्लामी सेना का एक बहुत बड़ा लश्कर तैयार हो चुका था। समस्त इस्लामी देशों के वीर सैनिक गजनी में आकर एकत्रित हुए थे। लोहे के जिरह बख्तर पहने हुए अरब वालों का एक बड़ा जस्ता की गजनी में आ चुका था। मध्य एशिया के भयानक तीरंदाजों की एक खासी सेना महमूद ने अपने अधिकार में कर ली थी। भारतीय सेना के हाथियों को भगाने के लिए भयंकर आतिशबाजो का एक दल महमूद की सेना के साथ हो चुका था। इस प्रकार सब मिलाकर जो सैनिक गजनी में एकत्रित हुए उनकी संख्या एक लाख से अधिक हो चुकी थी। खैबर के दर्रे को पार कर महमूद अपनी विशाल सेना के साथ पेशावर की ओर रवाना हुआ। उस समय उसके साथ जो लश्कर था उसमें पैदल सैनिकों के सिवा पंद्रह हजार चुने हुए लड़ाकू सवार थे। इस विशाल सेना के साथ इस्लाम का ऊंचा झंड़ा था, जिसे लेकर इस्लामी सेना भारत की भूमि पर उमड़ती हुई पेशावर की तरफ चली जा रही थी।

 

 

राजा जयपाल को अचानक खबर मिली कि गजनी के महमूद सुल्तान की एक बहुत बड़ी सेना आ रही है। उसने थोड़े समय में जो सैनिक तैयारी संभव हो सकती थी उसे लेकर वह सिंध नदी पार कर पेशावर के करीब पहुंच गया, दोनों ओर की सेनायें एक मैदान की ओर बढ़ी। बादलों के समान उमड़ती और गरजती हुई गजनवी सेना के सामने जयपाल की सेना बहुत कम दिखाई पड़ी। दोनों ओर से एक साथ आक्रमण हुए। बहुत देर तक दोनों सेनाओं के सैनिक बाणों की वर्षा करते रहें और उसके बाद महमूद की सेना ने आगे बढ़कर तलवारों और भालों की मार आरंभ कर दी। महमूद की सेना के सामने भारतीय सेना बहुत थोड़ी थी, फिर भी जयपाल के सैनिकों ने पूरी शक्ति के साथ उसका मुकाबला किया। दोनों ओर की फौजें एक दूसरे के निकट पहुंच गयी थी, और कई घंटे से घमासान युद्ध हो रहा था। दोनों सेनाओं के सैनिक एक बड़ी संख्या में मारे गये। युद्ध के मैदान में उन घायल सैनिकों का खून पानी की तरह बह रहा था।

 

 

महमूद गजनवी की सेना को कई गुना अधिक देखकर जयपाल इस बात को समझ गया था कि मुस्लिम सेना का जोर रोकना किसी भी दशा में संभव नहीं है। फिर भी वह कसकर युद्ध कर लेना चाहता था। उसकी सेना थोड़ी थी लेकिन युद्ध में पीठ दिखाने वाली न थी। भारतीय सेना के सैनिक अधिक संख्या में मारे जा रहे थे, फिर भी वे युद्ध करने में अपनी बहादुरी का प्रमाण दे रहे थे। अचानक महमूद की सेना का जोर बढ़ा। मुस्लिम सेना को आगे बढ़ते देखकर भारतीय सैनिकों ने प्राणों का मोह छोड़कर भयंकर मार शुरू कर दी जिससे महमूद की सेना को एक बार पीछे हट जाना पड़ा। लेकिन जयपाल के साथ आयी हुई सेना थी ही कितनी। युद्ध में उसके बहुत से सैनिक मारे गए। बहुत से हाथी घायल हुए और बाकी हाथी भागने की कोशिश करने लगे। अपनी सेना की इस हालत को देखकर जयपाल की सवार सेना ने आगे बढ़कर युद्ध की स्थिति को संभालने की कोशिश की। लेकिन उसके साथ बहुत थोड़े सैनिक रह गये थे। अभी तक भारतीय सेना के सब मिलाकर पांच हजार सैनिक और अफसर मारे जा चुके थे। जो लोग युद्ध क्षेत्र में बाकी रह गए थे, उनकी संख्या बहुत थोडी थी। मुस्लिम सेना फिर आगे की ओर बढ़ी और उसके बाणों की मार से घायल होकर जयपाल के हाथी पीछे की ओर भागे। यह दशा देखकर जयपाल के बाकी सैनिकों का साहस टूट गया, वे पीछे हटकर बहुत से लड़ाई के मैदान से भाग निकले और बहुत से पकड़ कर कैद कर लिये गये। इसी समय महाराज जयपाल भी अपने पंद्रह भाई वंशजों और प्रमुख सरदारों के साथ कैद कर लिया गया।

 

 

महाराज जयपाल की पराजय के बाद, उसकी सेना की बहुत सी सामग्री मुस्लिम सेना के अधिकार में आ गयी। अन्य कैदियों के साथ जब जयपाल को महमूद गजनवी के सामने लाया गया उस समय जयपाल के गले में बहुमूल्य एक हार था, और उसकी किमत दस लाख रुपए से कम न थी। महमूद ने इस हार को जयपाल के गले से उतरवाकर अपने अधिकार में लिया। और अंत में जयपाल के साथ महमूद सुल्तान की की संधि हुई और उसके अनुसार महाराज को उसके साथियों के साथ छोड़ दिया गया।

 

 

पराजित होने पर जयपाल का प्राण त्याग

 

 

पराजय का यह अपमान जयपाल के लिए असाध्य हो गया। कैद हो जाने के बाद वह जिस प्रकार महमूद के सामने पेश हुआ और बंदी दशा में जो दृश्य उसके सामने आये, उनका स्मरण उसे बार बार पीड़ा पहुंचाने लगा। एक वीर पुरूष के लिए युद्ध में मृत्यु अपमान का कारण नहीं नहीं होती लेकिन वह शत्रुओं के द्वारा कैद कर लिया जाये और उसके बाद उसे शत्रु की शर्तों पर संधि करना पड़े, तो यह अपमान उसके लिए मृत्यु की अपेक्षा अधिक भयानक होता है। इन बातों को सोच सोचकर जयपाल का ह्रदय लज्जा से घायल होने लगा।

 

आत्मा सम्मान के आघात से दुखी होकर जयपाल ने अपने मंत्रियों और सरदारों के साथ परामर्श किया। उसकी इस पीड़ा को दूर करने के लिए मंत्रियों और सरदारों ने उसे बहुत कुछ समझाने का प्रयत्न किया, लेकिन जयपाल के पीडित अन्तःकरण को किसी प्रकार संतोष न हुआ। उसका पुत्र अनंगपाल युवावस्था में पहुंकर सभी प्रकार से समर्थ हो चुका था। अपने मंत्रियों और सरदारों से बातें करके जयपाल ने राज्य का भार अपने पुत्र को सौंपा और उसके बाद उसने राज धर्म पर अनंगपाल को कई प्रकार की शिक्षायें दी। राज्य के उत्तरदायित्व से पृथक होकर जयपाल ने आत्महत्या की और अपमान की एक असहाय पीड़ा को लेकर वह इस संसार से विदा हो गया।

 

 

भटनेर का युद्ध

 

जयपाल के स्थान पर उसका लड़का अनंगपाल राजा हो चुका था। आत्मा सम्मान नष्ट हो जाने पर जिस प्रकार जयपाल ने आत्महत्या की उसे अनंगपाल भूल न सका। लेकिन शत्रु की प्रबल शक्ति देखकर उसने समय का सही इंतज़ार किया और इस समय उसने चुपचाप रहना ही आवश्यक समझा। महमूद गजनवी की शर्तों को जयपाल ने संधि की थी, और उन्ही शर्तों के आधार पर वह छोड़ा गया था। उस संधि के अनुसार कर देने के लिए उसने सरदारों और अधिकृत राजाओं से बातें की। अनंगपाल बिना अपनी शक्ति को प्रबल किये संधि को तोड़ना नहीं चाहता था। लेकिन भटनेर के राजा विजयचंद्र ने कर देने से इंकार कर दिया। उसने साफ साफ कहा कि मुझे कर देना मंजूर नहीं है। शत्रु के साथ युद्ध करना मंजूर है। इस प्रकार की बातें करके ही विजयचंद्र चुप नहीं हो गया। वह जानता था कि इसके तुरंत बाद ही महमूद सेना का आक्रमण होगा और उस समय युद्ध करना ही पड़ेगा। इसलिए उसने सोचा की युद्ध की तैयारी पहले से ही क्यों न कर ली जाये।

 

 

विजयचंद्र का छोटा सा राज्य था। उसकी सैनिक शक्ति भी बहुत साधारण थी लेकिन उसकी सेना के भाटिया सैनिक युद्ध में अत्यंत बहादुर थे। उनके बल पर विजयचंद्र अपने मान की रक्षा करना चाहता था। बिना लड़े हुए और बिना पराजय के वह शत्रु की अधिनता स्वीकार करना नहीं चाहता था। महमूद सुल्तान की सेना के साथ युद्ध करने की विजयचंद्र ने तैयारी शुरु कर दी। सबसे पहले उसने अपने परिवार को भटनेर से हटा कर दूर छिपा कर रखा। अपने राज्य का कोष शत्रु की पहुंच से बाहर अपने नियंत्रण में रखा। राज्य के सम्पूर्ण स्थानों को सचेत और सावधान किया। इसके बाद उसने अपनी सेना की तैयारी आरंभ की।विजयचंद्र अपनी छोटी सी सेना के पराक्रम पर विश्वास करता था। उसने चुने हुए भाटिया सैनिकों की पांच हजार सैनिकों की सेना तैयार की और अपने किले के बाहर एक उंचे स्थान पर जाकर उसने शिविर बनाया। वहां पर मुकाम कर के वह विशाल महमूद सेना के साथ युद्ध करने के उपायों पर विचार करने लगा।

 

 

महमूद गजनवी ने मुलतान में अपनी सेना का अधिकारी अबुलफतह दाऊद को बनाया था। अबुलफतह न केवल युद्ध में वीर और बहादुर था बल्कि वह एक कट्टर इस्लामी मुसलमान और सुल्तान की समझ में अत्यंत होशियार आदमी था। विजयचंद्र को इस बात का पता था। अबुलफतह को मालूम न था कि विजयचंद्र ने भटनेर से निकलकर अपनी सेना के साथ बाहर कही मुकाम किया है। भारतीय लूट का खजाना महमूद सेना की एक टुकड़ी लेकर वहीं कही एक दूर के मार्ग से निकल रही थी। विजयचंद्र को खबर मिली की महमूद की सेना लूट का खजाना लेकर जा रही है। उसने तुरंत अपनी सेना लेकर उस पर हमला किया और उस खजाने को लूट लिया। खजाने को लूटे जाने की खबर अबुलफतह को मिली। वह इस समाचार को सुनते ही तिलमिला उठा और अपनी सेना लेकर विजयचंद्र से मुकाबला करने के लिए वह रवाना हो गया। पचास हजार सेना के साथ अबुलफतह ने सन् 1003 ईसवीं में भटनेर के बाहर विजयचंद्र पर हमला किया।

 

 

विजयचंद्र बड़ी सावधानी से इस युद्ध का रास्ता देख रहा था। अबुलफतह की सेना के करीब आते ही भाटिया सेना ने आगे बढ़कर आक्रमण का उत्तर दिया और एक साथ वह महमूद की सेना पर टूट पड़े। महमूद की सेना घबराकर पीछे की ओर हट गई यह देखकर भाटिया सेना कुछ दूर आगे की ओर बढ़ गई और फिर दोनों सेनाओं में संग्राम शुरु हो गया। विजयचंद्र यदुवंशी राजपूत था। अपनी छोटी सेना के कारण उसने विशाल शत्रु सेना की परवाह न की। कुछ समय के बाद दोनों ओर से युद्ध का जोर बढ़ गया और प्रलय के दृश्य दिखाई देने लगें। अबुलफतह के सेनापतित्व में मुस्लिम सेना ने पूरा जोर लगाकर युद्ध किया उसने पहले से ही भाटिया सेना को पराजित करने का विश्वास कर लिया था। लेकिन युद्ध के मैदान में वीर भाटिया सैनिकों के सामने मुस्लिम सैनिकों का रूकना कठिन मालूम होने लगा। लगातार कुछ देर तक भीषण मार होने के बाद उस थोड़ी सी भाटिया सेना के सामने अबुलफतह की सेना को दूर तक पीछे हट जाना पड़ा और इसी मौके पर उसके बहुत से सैनिक और बहुत से बहादुर सरदार युद्ध में मारे गये। अबुलफतह की सेना का साहस टूट गया और वह युद्ध क्षेत्र से हट गई। भाटिया सेना शत्रुओं को मैदान से पीछे हटाकर अपने शिविर में लौट गयी और वहां जाकर उसने विश्राम किया।

 

 

भटनेर का दूसरा युद्ध

 

भटनेर में अपनी सेना का खजाना लूटे जाने और अबुलफतह की पराजय का समाचार महमूद गजनवी को मिला। वह अत्यंत क्रोधित हुआ और वारिस जयचंद्र को परास्त करने के लिए वह स्वयं तैयार हुआ। अपने साथ पचास हजार तुर्की सेना लेकर वह खैबर को पार करता हुआ भटनेर की तरफ रवाना हुआ।विजयचंद्र पहले से इस बात को जानता था कि अबुलफतह की हार को सुनकर महमूद स्वंय अपनी विजयी सेना को लेकर आवेगा। भाटिया सेना पहले से ही थोड़ी संख्या में थी और उसमें भी उसके बहुत से सैनिक अबुलफतह के साथ युद्ध करने में मारे गये थे। भाटिया सेना एक बार मुस्लिम सेना को पराजित कर चुकी थी, लेकिन वह थक गई थी और उसके बहुत से सैनिक जख्मी हो चुके थे। फिर भी वह साहस में कमजोर न पड़ी थी। तुर्की सेना के आने पर भाटिया सेना ने भटनेर के बाहर ही उसका मुकाबला किया। आरंभ से ही तुर्की सेना का आक्रमण बडे जोर का हुआ। आमना सामना होते ही भीषण संग्राम शुरू हो गया। बहुत समय तक भाटिया सेना ने तुर्की सेना के साथ युद्ध किया। उसने अपनी भयंकर मार से सेना को आगे बढ़ने से रोके रखा। लेकिन उसके मुकाबले में तुर्की सेना बहुत बड़ी थी। उसके साथ युद्ध में भाटिया सेना के बहुत से जवान मारे गये। इस दशा में विजयचंद्र का पक्ष युद्ध में कमजोर पड़ने लगा। तुर्की सेना का जोर बढ़ने लगा और भाटिया सेना को धीरे धीरे पीछे की ओर हटना पड़ा। महमूद गजनवी की सेना ने बढ़कर भाटिया सेना को घेरना शुरू कर दिया। अब विजयचंद्र के साथ पांच सौ से अधिक सैनिक न रह गये थे। इतने थोड़े सैनिकों के रह जाने पर भी भाटिया सेना का एक भी सैनिक युद्ध से भाग न सका वे मर जाना चाहते थे, परंतु हार स्वीकार करना नहीं चाहते थे।

 

 

अपने पांच सौ वीर सैनिकों को लेकर विजयचंद्र युद्ध क्षेत्र से निकलकर अपने किले में चला गया। महमूद की तुर्की सेना ने भटनेर को जाकर घेर लिया। इस संकट को विजयचंद्र पहले से जानता था, इसलिए उसने भटनेर निवासियों की रक्षा के लिए पहले से प्रबंध कर रखा था। भटनेर के भीतर सशस्त्र ऐसे लोगों की संख्या मौजूद थी, उन्होंने अनेक अवसरों पर युद्ध का काम किया था। तुर्की सेना के भटनेर में घुसते ही उन वीरों ने अपने अपने मकानों की छतों से बाणों की मार शुरू कर दी। तुर्की सेना को पहले से इनका पता न था। इस असावधानी में महमूद की सेना के बहुत से सैनिक घायल हो गये। और महमूद सुल्तान स्वंय घायल हुआ। तुर्की सेना को घबराकर भटनेर से बाहर की ओर भागना पड़ा। महमूद सुल्तान की सेना भटनेर किले के भीतर प्रवेश करने की कोशिश करने लगी लेकिन उसके आसपास एक गहरी खाई थी और वह एक भयानक बाधा थी। महमूद उस खाई को पाटने का प्रबंध करने लगा। तुर्की सेना उस खाई को पाटने के लिए जुट गई। रात के अंधकार में विजयचंद्र अपने सैनिकों के साथ किले से बाहर निकला और तुर्की सेना पर टूट पड़ा। महमूद की सेना को इस आक्रमण का कुछ भी ख्याल न था। महमूद के बहुत से सैनिक और सरदार मारे गये और तुर्की सेना के तैयार होते होते भाटिया सैनिक और सरदार पहाड़ी के घने जंगलों में जाकर विलीन हो गये। रात के अचानक आक्रमण से महमूद की सेना का भयानक संहार हुआ उसने भटनेर किले में आग लगवा दी और उसके बाद उसने भटनेर पर फिर आक्रमण किया। तुर्की सेना ने यहां खूब लूट मार की और सन् 1004 में भटनेर पर अपना अधिकार करके वह खैबर के रास्ते गजनी की तरफ वापस चली गयीं।

 

 

अनंगपाल के साथ युद्ध

 

महमूद सुल्तान के गजनी चले जाने के बाद अभी कुछ ही महिने बीते थे। सुल्तान की ओर से मुल्तान के अधिकारी अबुलफतह दाऊद ने अपना रंग बदलना शुरु कर दिया। अब उसे इस्लाम धर्म की अपेक्षा बौद्ध धर्म अच्छा दिखाई देने लगा। इन दिनों में उसने अनंगपाल के साथ मित्रता का संबंध कायम कर लिया था। अबुलफतह दाऊद ने इस्लाम छोडकर बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया और इसके साथ ही उसने महमूद गजनवी को कर भेजना बंद कर दिया। अबुलफतह के धर्म परिवर्तन का समाचार महमूद गजनवी को मिला उसे यह भी मालूम हो गया कि अबुलफतह ने मुल्तान की ओर से कर भेजना भी बंद कर दिया है। इसी सिलसिले में जब उसने सुना की अबुलफतह की मित्रता अनंगपाल के साथ हो चुकी है। तो उसे विश्वास हो गया कि अबुलफतह की इन सभी बातों का कारण अनंगपाल है। इसी आधार पर उसने अनंगपाल के पिता जयपाल के साथ जो संधि की थी उसे तोड़कर उसने अनंगपाल पर आक्रमण करने का निश्चय कर लिया। अपने साथ एक लाख तुर्की सेना लेकर महमूद सुल्तान गजनी से रवाना हुआ। इस्लामी सेना के आने की खबर पाकर अनंगपाल ने भी युद्ध की तैयारी की और अपनी सेना को लेकर वह पेशावर के पास पहुंच गया। तुर्की सेना ने आकर अनंगपाल की सेना पर आक्रमण किया दोनों सेनाओं ने मार काट आरंभ कर दी और उस युद्ध में सारा दिन बीत गया। भारतीय सेना के मुकाबले में तुर्की सेना बहुत बड़ी थी। इसलिए भारतीय सेना के पैर उखड़ गए, और उसके सैनिकों ने भागना आरंभ कर दिया, यह देखकर तुर्की सेना ने उसका पीछा किया।

 

 

अनंगपाल अपनी सेना के साथ भागकर पहाड़ी रास्ते से होता हुआ कश्मीर चला गया। पेशावर के इस युद्ध में अनंगपाल को हरा कर तुर्की सेना मुल्तान की तरफ रवाना हुई। वहां पर मुल्तान का बागी अधिकारी अबुलफतह युद्ध के लिए तैयार था। तुर्की सेना के मुल्तान पहुंचते ही अबुलफतह की सेना ने उसके साथ युद्ध किया और सात दिनों तक दोनों ओर से घमासान संग्राम होता रहा, अंत में अबुलफतह की पराजय हुई। वह कैद कर लिया गया और महमूद गजनवी ने सन् 1006 ईसवीं में मुल्तान का राज्य सुखपाल को दे दिया यह सुखपाल, महाराज जयपाल का भाई था, और पेशावर की लड़ाई में जयपाल की हार हो जाने पर उसने इस्लाम स्वीकार कर लिया था। उसके मुसलमान हो जाने पर महमूद ने उसको अपनी सेना में अफसर बनाकर ऊंचा पद दिया था।

 

 

महमूद गजनवी के साथ सुखपाल का विद्रोह

 

 

अभी महमूद भारत में ही मौजूद था। उसे खबर मिली की तातार के बादशाह एलिफ खान ने खुरासान पर आक्रमण किया है। खुरासान में बहुत पहले से महमूद का कब्जा था। महमूद भारत से खैबर होता हुआ गजनी चला गया और वहां जाकर उसने तातार के बादशाह के साथ युद्ध आरंभ कर दिया। कुछ दिनों तक लगातार वह संग्राम चलता रहा। सुखपाल मुल्तान में राज्य कर रहा था, लेकिन उसका शासन महमूद गजनवी की अधीनता में था। सुखपाल ऐसे अवसर की खोज में था, जब वह महमूद गजनी के साथ अपना संबंध तोड़ सके और वह अपने आपको स्वत्रंत राजा घोषित करे। तातार के बादशाह के साथ महमूद को फंसा हुआ देखकर सुखपाल ने अपने लिए एक अच्छा अवसर समझा और उसने अपने आपको मुल्तान का एक स्वत्रंत राजा घोषित कर दिया।

 

खैबर की जंग
खैबर की जंग

तातार के बादशाह के साथ मुकाबले में महमूद सुल्तान की विजय हुई। खुरासान के युद्ध से छुटकारा के बाद ही उसने सुना कि मुलतान के अधिकारी सुखपाल ने बगावत कर दी है। महमूद ने खुरासान से छुट्टी पाते ही भारत में आने और मुल्तान को फिर विजयी करने का निश्चय किया। सुखपाल को इसकी खबर पहले से ही हो गई थी। उसने महमूद के साथ युद्ध करने का साहस किया, और एक बड़ी सेना एकत्रित करके स्वंय युद्ध के लिए रवाना हुआ। सुखपाल ने मुल्तान से चलकर सिंधु नदी के किनारे मुकाम किया, और इस बात का पूरा प्रबंध किया की तुर्की सेना सिंधु नदी को पार न कर सके। तातार के बादशाह को पराजित करके महमूद तुरंत एक बड़ी सेना लेकर सुखपाल पर हमला करने के लिए रवाना हुआ। वह सुखपाल के बल और साहस को पहले से जानता था। सुखपाल तुर्की सेना को सिंधु नदी पार करने से न रोक सका। महमूद की सेना ने सुखपाल को जीतकर उसे कैद कर लिया। इस बार तुर्की सेना ने भयानक अत्याचार किये। सुखपाल को बंदी दशा में गजनी भेजा गया और इस प्रकार महमूद गजनवी ने फिर मुल्तान पर कब्जा कर लिया।

 

 

खैबर की जंग – खैबर का युद्ध

 

जिस स्वाभिमान की रक्षा के लिए जयपाल ने आत्महत्या की थी, अनंगपाल उसे भुला न सका। पैशावर के मैदान में उसे स्वंय तुर्की सेना के सामने पराजित होना पड़ा था और युद्ध से भागकर वह कश्मीर चला गया था। उसने समझ लिया था कि छोटी छोटी सेना के द्वारा तुर्की सेना का मुकाबला नहीं किया जा सकता है। वह महमूद के साथ युद्ध करना चाहता था और युद्ध के सिवा उसके सामने अब कोई दूसरा रास्ता न रह गया था। इसलिए वह कश्मीर में जाकर उन उपायों को सोचने लगा जिनसे सेना एक बड़ी संख्या में एकत्रित की जा सकती थी। अनंगपाल ने पंजाब के दूसरे राजाओं से सैनिक सहायता लेने का निर्णय किया और उसी आधार पर उसने उनके पास अपने प्रतिनिधि भेजे। अनंगपाल ने सैनिक तैयारी का कार्य आरंभ कर दिया। उन दिनों में केकयी लोग युद्ध करने में बहुत मशहूर थे और वे अब गक्कर के नाम से प्रसिद्ध थे। तुर्की सेना के साथ युद्ध करने के लिए अनंगपाल को तीस हजार गक्कर सेना की सहायता मिली। उसके साथ पहले से ही जो अपनी सेना थी उसकी संख्या भी पांच हजार से कम न थी, इन पैंतीस हजार सैनिकों को लेकर अनंगपाल रवाना हुआ और उसने खैबर का वह रास्ता रोक लिया जिससे तुर्की सेना आया करती थी। गक्कर सैनिक तीरंदाजी में बहुत प्रसिद्ध थे, अनंगपाल ने उनको पहाड़ी के ऊंचें स्थानों पर नियुक्त किया और उनके नीचे खैबर दर्रा के रास्ते में उसने हाथियों की सेना लगा दी। अपनी इस मजबूत तैयारी के साथ वह महमूद की तुर्की सेना के आने का रास्ता देखने लगा।

 

 

गज़नी में महमूद को खबर मिली की अनंगपाल युद्ध करने के लिए एक बड़ी सेना लेकर खैबर की लड़ाई के लिए आ गया है। उसने गज़नी में युद्ध की तैयारी शुरु कर दी। इस्लामी देशों से सैनिक लाने के लिए महमूद के दूत रवाना हुए और बहुत थोड़े समय के भीतर गज़नी मे जो सेना युद्ध के लिए तैयार हुई उसकी संख्या दो लाख तक पहुंच गई। इस विशाल सेना को लेकर महमूद गजनवी, गजनी से रवाना हुआ और सन् 1008 इसवीं में बैटल ऑफ खैबर के लिए पहुंच गया। अनंगपाल की सेना युद्ध के लिए पहले से तैयार थी। जिन दूसरे राजाओं ने सैनिक सहायता देने का वचन दिया था, उनमे से किसी की सेना अभी तक अनंगपाल के पास न पहुंची थी, फिर भी वह युद्ध के लिए तैयार था। तुर्की सेना अपने अस्त्रों से सुसज्जित होकर जंग ए खैबर के लिए आगे बढ़ी और उसे आगे देखकर अनंगपाल के गक्कर सैनिकों ने बाणों की वर्षा शुरू कर दी। दोनों ओर से युद्ध आरंभ हो गया। महमूद की सेना खैबर का दरवाजा की ओर आगे बढना चाहती थी और अनंगपाल की सेना उसे पीछे हटाने की कोशिश कर रही थी, दो दिन तक भयंकर मार होती रही। गक्कर सैनिकों ने तीसरे दिन बाणों की भीषण वर्षा शुरू कर दी जिससे तुर्की सेना बहुत पीछे की ओर चली गई। युद्ध के इस दृश्य का समाचार आसपास फैलने लगे और जिन राजाओं ने अनंगपाल को सहायता देने का वचन दिया था वे युद्ध की परिस्थितियों की जानकारी का इंतजार कर रहे थे। दो दिनों के भयंकर युद्ध में अनंगपाल की सेना ने तुर्की सेना को मार कर पीछे हटा दिया। इस समाचार के फैलते ही कई राजाओं की सेनाये खैबर के मैदान की की ओर रवाना हुई और कन्नौज, अजमेर, कालिंजर, उज्जयिनी तथा त्रिपुरी के राजाओं की सेनाये पंजाब होती हुई अनंगपाल के पास खैबर की जंग में पहुंच गई।

 

 

महमूद सुल्तान को इस बात की खबर मिल गयी कि अनंगपाल की सहायता के लिए भारत के कई राजाओं की सेनायें आकर एकत्रित हो गई है। उसने समझ लिया इस कि यह खैबर का युद्ध साधारण तरीकें से विजयी होना मुश्किल है। उसने युद्ध की दूसरी चालों से काम लिया। और एक लंबी और गहरी खाई खुदवाने का काम शुरू कर दिया। एक खाई तैयार हो जाने के बाद उसने कुछ फासले पर दूसरी खाई भी खुदवाई यह खाई और भी अधिक गहरी थी। युद्ध कई दिनों तक बंद रहा। तुर्की सेना फिर लड़ाई के लिए तैयार हुई और भारतीय सेना को जब मालूम हुआ तो उसने तैयार होकर युद्ध आरंभ कर दिया। चालिस दिनों तक युद्ध की हालत इसी प्रकार चलती रही। इस समय अनंगपाल के साथ भी एक बड़ी सेना हो गई थी और वह सेना खैबर दर्रा से आगे बढ़कर तुर्की सेना को पराजित करना चाहती थी। अनंगपाल ने अपनी सेना को आगे बढ़ने और जोरदार हमला करने की आज्ञा दी। सम्पूर्ण सेना का जोर एक साथ बढ़ा। गक्कर सैनिकों ने अपनी भयंकर बाणों की मार से प्रलयकारी तुफान का दृश्य उपस्थित कर दिया, कुछ समय तक यही हालत बनी रही।भारतीय सेना के सैनिकों ने तीरों की मार बंद करके अपने दोनों हाथो में तलवारें ली और वे भीषण प्रहार करते हुए तुर्की सेना पर टूट पड़े। महमूद की सेना ने भी पूरा जोर लगाकर भारतीय सेना का मुकाबला किया। दोनों ओर के सैनिक बड़ी संख्या में मारे गये। कुछ समय तक युद्ध की भीषणता इसी प्रकार बनी रही। अचानक तुर्की सेना आगे बढ़ती हुई दिखाई पड़ी। यह देखकर अनंगपाल ने भारतीय सेना को जोर के साथ ललकारा। उस आवाज को सुनते ही भारतीय सैनिक एक साथ आगे बढ़े और भयानक रूप से उन्होंने तुर्की सेना का संहार किया। इस थोडे समय में ही महमूद गजनवी की सेना के बेशुमार आदमी युद्ध क्षेत्र में मारे गये। तुर्की सेना कमजोर पड़ती हुई दिखाई देने लगी। भारतीय सेना का साहस बढ़ता जा रहा था। गक्कर सैनिक ओर सरदार तलवारों के साथ इस्लामी सेना का संहार करते हुए आगे बढ़ने लगे। भारतीय सेना आज तुर्की सेना का नाश कर देना चाहती थी। वह क्रोध में अंधी हो चुकी थी। युद्ध का विस्तृत मैदान लाशों से पटा हुआ था। उस मैदान में बरसाती पानी की तरह खून बह रहा था। तुर्की सेना को पीछे हटने और भागने के सिवा कुछ न सूझ पड़ता था। भारतीय सेना उसको पीछे हटाती हुई आगे की ओर बढ़ रही थी। अचानक सामने खाई के पड़ते ही भारतीय सेना रूकी। लेकिन अनंगपाल की ललकार सुनते ही वह जोर के साथ आगे बढ़ी और उस खाई को पार कर आगे निकल गयी।

 

 

तुर्की सेना पीछे की ओर भागने लगी। भारतीय सैनिक अपनी भीषण मार से आगे बढ़ते चले जा रहे थे। तुर्की सेना को पीछे हटते देखकर वे सब एक साथ तुर्की सेना पर टूट पडने के लिए आगे बढ़े और कुछ फासले के बाद दूसरी खाई में जाकर वे पहुंच गये, यह खाई अधिक गहरी और लंबी थी। भारतीय सेना के खाई में पहुंचते ही महमूद ने अपनी सेना को एक साथ हमला करने के लिए ललकारा। तुर्की सेना भारतीय सेना पर टूट पड़ी और खाई के भीतर होने के कारण भारतीय सेना का उस समय भयंकर संहार हुआ। इसी समय युद्ध की परिस्थितिया बदली। तुर्की सेना ने खाई के भीतर भारतीय सेना को घेर लिया और ऊपर से उसने भयंकर मार शुरू कर दी। खाई के भीतर पहुंच जाने के कारण भारतीय सेना का अब कोई उपाय काम न कर रहा था। थोड़े समय के भीतर ही वे बहुत बड़ी संख्या में मारे गये। जो बचे वह घायल हुए। इसी अवसर पर तुर्की सेना के एक गिरोह ने आगे बढ़कर अनंगपाल के हाथी को घेर लिया। अपनी रक्षा करने के लिए अनंगपाल ने बहुत जोर के प्रहार किये। लेकिन उसका हाथी बुरी तरह से जख्मी हुआ और वह भयानक आवाज के साथ युद्ध से भागा। तुर्की सेना के सैनिकों ने उसका पीछा किया। भारतीय सेना मारी जा चुकी थी। उसने अपना साहस तोड़ दिया था। उसे जब मालूम हुआ कि अनंगपाल अपने हाथी पर पीछे की ओर भाग रहा है, तो बची हुई भारतीय सेना भी युद्ध क्षेत्र से भागने लगी। कुछ दूर तक तुर्की सेना ने उसका पीछा किया और उसके बाद वह अपने शिविर में लौट आयी। अनंगपाल के मुकाबले में तुर्की सेना की विजय हुई लेकिन उसके सैनिक इतने अधिक मारे गये थे कि उसकी यह विजय उसके लिए अनेक बार की पराजय से भी अधिक भयानक हो गयी। महमूद सुल्तान अपनी बची हुई और घायल सेना के साथ गज़नी लौट गया।

 

 

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