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कोलायत मंदिर के दर्शन – कोलायत का इतिहास

कोलायत मंदिर के दर्शन – कोलायत का इतिहास

प्रिय पाठकों अपने इस लेख में हम उस पवित्र धरती की चर्चा करेगें जिसका महाऋषि कपिलमुनि जी ने न केवल स्पर्श ही किया है। बल्कि उन्होंने अनेक वर्षों तक आसन लगाकर घोर व कठिन तपस्या की। और उसी का प्रताप है कि आज भी हजारों साल के बाद भी उस धरती में श्रद्धालुजनों के लिए चुम्बक जैसी शक्ति है। जिसके फलस्वरूप श्रृद्धालु स्वयं उस ओर खीचे चलें आते है। इस पवित्र पावन धरती का नाम है। कपिलायतन जिसे साधारणतया लोग कोलायत जी के नाम से जानते है। यह पवित्र धरती भारत के राजस्थान राज्य बीकानेर जिले के कोलायत नामक स्थान पर स्थित है। यह धरती प्रसिद्ध ऋषि कपिलमुनि की तपस्थली रही है। और यहां कपिलमुनि का आश्रम और कोलायत मंदिर है। आश्रम को मरूउद्यान भी कहते है। यह स्थान कोलायत झील के लिए भी जाना जाता है। जिसमें स्नान करना श्रृद्धालु अपना सौभाग्य समझते, और कोलायत सरोवर में स्नान करने से पापों से मुक्ति मिल जाती है यह श्रृद्धा भी भक्तों में होती है। यहां प्रति वर्ष कार्तिक की पूर्णिमा को कोलायत का मेला लगता है। जो बहुत विशाल होता है, और भारी संख्या में यात्री उसमें भाग लेते है।

कोलायत मंदिर या कोलायत का इतिहास, कोलायत दर्शन से पहले हम कुछ उस महान ऋषि कपिलमुनि के बारें मे जान लेते है। जिनके तप स्थल लिए भक्त देश के कोने कोने से यहां खिचे चले आते है। ऋषि कपिलमुनि कौन थे? ऋषि कपिलमुनि का हिन्दू धर्म में क्या महत्व है।

कोलायत धाम के सुंदर दृश्य
कोलायत धाम के सुंदर दृश्य

श्रीमद्भागवत गीता के दसवें अध्याय के छब्बीसवें श्लोक में अर्जुन को विभूति का परिचय कराते हुए, भगवान श्रीकृष्ण कहते है:– सिदानां कपिलो मुनि: !
अर्थात सिद्धों में, मैं कपिलमुनि हूँ ! वास्तव में भगवान कपिल श्रीकृष्ण अथवा विष्णु के पुरातन अवतार थे। जिन्होंने दृष्टिपात मात्र से कुमार्गगामी सगर पुत्रों को भस्म कर दिया था।

महाभारत में उल्लेख है कि श्री कपिलमुनि जी प्रजापति कर्दम के पुत्र थे। तथा इन्होंने माता देवहूती की कोख से अवतार धारण किया था। ऋषि कपिलमुनि जी का एक और भी नाम है जिससे बहुत ही कम लोग परिचित हैं। वह नाम है। चक्रधनू।
महाभारत में प्रसंग आता है कि एक बार राजा नहुष ने अपने घर आए हुए अतिथि त्वष्टा के लिए गाय का आलंभन करने का निश्चय किया जिसे कि वे वेद समान मानते थे। जब कपिल जी को इसका पता चला कि वेद के नाम पर गोवध की तैयारी हो रही है, तो उनके मुख से इतना ही निकला — हा वेद !! अभिप्राय यह है कि वेदों का गलत अर्थ लगाकर लोग मनमाना अनाचरण करते है। जब पितामह भीष्म शर शय्या पर लेटे हुए थे तो नारद, वसिष्ठ, विश्वामित्र आदि अनेक ऋषि मुनि उनके पास बैठे हुए थे। इन विशिष्ट व्यक्तित्वों में कपिलमुनि जी का भी उल्लेख हुआ है। इसके अतिरिक्त सात धरणीधर ऋषियों में भी कपिलमुनि जी का नाम आया है। उपयुक्त उदाहरणों से इतना स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय धर्मग्रंथों में कपिलमुनि जी का अपना विशिष्ट व्यक्तित्व है। जिसकी ऊचाई को दूसरा कठिनता से ही छू सकता है।

कोलायत का महत्व

श्री रामचरित मानस में गोस्वामी जी ने कहा है कि श्रीराम से भी बढ़कर राम नाम का महत्व है। राम अवतार हमारे सम्मुख न रहने पर भी राम नाम रूपी नौका के सहारे लोग सहज ही भवसागर से तर जाते है। इसी प्रकार कहा जा सकता है कि श्री कपिलमुनि जी ने तो यहां हजारों वर्ष पूर्व तपस्या की थी, और वे चले गए। परंतु उनकी पावन तपोभूमि अद्यावधि पाप पुंजों को क्षार करने की क्षमता रखती है। और अनिश्चितकाल तक इसी प्रकार श्रृद्धालुओं को तापत्रय से मुक्त करती रहेंगी।
श्रीमद्भागवत के अंतर्गत स्कंदपुराण में कपिलायतन अथवा कोलायत जी (कोलायत का प्राचीन नाम) के महात्म्य का निषिद वर्णन है। अगस्त्य जी की जिज्ञासा पर पार्वती नंदन स्कंद जी ने कपिलायतन की महिमा बताई जो पहले अज्ञातप्रायः थी।
अन्य तीर्थों का महत्व तो यह है कि उनके दर्शन से पापों का नाश होता है। पर श्री कोलायत जी इस विषय मे अद्वितीय है। इस तीर्थ के दर्शन की इच्छामात्र से ही पापों का नाश हो जाता है। और इसकी परिधि में केवल प्राणी ही प्रविष्ट हो सकते हैं।

कोलायत धाम के सुंदर दृश्य
कोलायत धाम के सुंदर दृश्य

कोलायत का इतिहास – हिस्ट्री ऑफ कोलायत

कर्नल जेम्स टॉड ने राजस्थान के इतिहास मे श्री कोलायत जी का उल्लेख करते हुए लिखा है कि कार्तिक पूर्णिमा को यहां मेला लगने की परम्परा अत्यंत प्राचीन है। तथा दूर दूर से पैदल, ऊंटों, घोडों व बैलगाड़ियों पर सवार होकर बड़ी संख्या में यात्री यहां दर्शनार्थ हेतू आते है। यह भी लिखा है कि प्राचीन काल में यात्रियों की भीड़ और अधिक रहती थी।

यहां यह बताना समीचीन होगा कि कपिलमुनि जी कोलायत कैसे पहुंचे। स्कंदपुराण में उल्लेख है कि अपनी माता देवहूति को अध्यात्म विद्या का उपदेश करने के बाद सांख्य दर्शन के आचार्य श्री कपिलमुनि काम – क्रोद्यादि से मुक्त भ्रमर्णाथ उत्तर की दिशा को जब चले तो इस बालुकामय धरती को भी वृक्षों की लताओं से आच्छादित एवं पक्षियों से कुंजीत तथा यहां हिरणों के सुंदर झुंड देखकर आकर्षित हुए। और इसी धरा को उन्होंने अपनी तपस्या के लिए उपयुक्त समझा। यह सही है कि बाद में वे पूर्व दिशा को भी गए। परंतु उनकी प्रारंभिक साधना स्थली तो श्री कोलायत जी ही है, इसमें कोई संदेह नहीं है।

बीकानेर के स्वर्गीय महाराजा गंगासिंह जी ने इस तीर्थ के महत्व की और समुचित ध्यान देते हुए बीकानेर – कोलायत के बीच रेलमार्ग की आवश्यकता का अनुभव किया था। अतः आज से लगभग सौ साल पहले सन् 1921 में यहां रेलमार्ग का कार्य पूरा हो गया था। तथा कपिल देव जी के मंदिर में संगमरमर जड़ा कर उसका कायाकल्प किया था। इसके अतिरिक्त कोलायत सरोवर जो बिना घाटों के तालाब की तरह पड़ा हुआ था। उसके चारों ओर पक्के घाट बनवाए। तथा शिव, गणेश, सूर्यादि पंच मंदिरों का निर्माण करवाया। इसके बाद सेठ मदन गोपाल दम्माणी, राजा विसेसरदास डागा ने भी यहां मंदिर बनवाएं। इसके अलावा अन्य लोगों ने भी मंदिर, व धर्मशालाओं का निर्माण यहां करवाया। अनेक समाजों की ओर भी भी यहां धर्मशालाएं बनी हुई है।

कोलायत धाम के सुंदर दृश्य
कोलायत धाम के सुंदर दृश्य

कपिल सरोवर

पुराने समय मे कोलायत झील में झाडिय़ों के बडे बडे जाल से थे। जिसके कारण इसमें स्नान करना स्नानर्थियों को दुष्वार होता था। अब इस सरोवर को साफ कराकर पक्के घाट बना दिए गए है। कोलायत लेक में बहुत दूर दूर का बरसाती पानी आता है। इसलिए कोलायत झील हरी भरी रहती है। वृक्षों, मंदिर, और भवनों से घिरे हुए इस सरोवर की शोभा निराली है।

श्री कोलायत जी सरोवर के स्नान को लोक जीवन मे गंगा स्नान के बराबर का महत्व प्राप्त है। इसलिए श्रृद्धालु यहां स्नान को जाते हुए गंगाजी की जय बोलते है। तथा गंगाजी के गीत गाते है। इसी प्रकार और भी अनेक लोक गीत यहां मेला पर्व पर सुनने को मिलते है। चतुर्दशी को दीपमाला उत्सव मनाया जाता है। सारी अट्टालिकाएं दीपकों से जगमगाने लगती है। और परछाई निर्मल जल में प्रतिबिंबित होकर अनुपम शोभा पाती है। रात मे जागरण होता है। कही रामघमंडी कही शास्त्रीय कही हल्के फुल्के गीत चलते है और रात फटाफट बीत जाती है।




स्कंदपुराण मे श्री कपिलायतन सरोवर का महात्म्य विस्तार पूर्वक दिया है। जिसके अनुसार जब सूर्य मकर राशि पर थे तो तीर्थराज प्रयाग में उच्चकोटि के साधु, संत, ऋषि, मुनियों और ब्राह्मणों का समाज जुडा। जिसमें ऋषि महाऋषि भी थे। उसी समाज में छः मुनि कन्याएं भी आई जो नारद जी के वीणावादन एवं सौंदर्य के कारण योगमार्ग की निंदा तथा विषय भोग की प्रशंसा करने लगी। योगमार्ग से भ्रष्ट इन कन्याओं की आत्मा का विष्णु भगवान की माया ने हरण कर लिया। तथा काम वासना से विद्व होकर सब की सब मर गई। चूंकि सब आपस मे प्रेमपूर्वक रहती थी, और योग भ्रष्ट होकर उन्होंने शरीर त्याग किया था। अतः इन सभी कन्याओं का जन्म इसी कपिलायतन क्षेत्र मे कुलीन ब्राह्मणों के घर हुआ था। दिन भर परिश्रम करने के बाद ये कन्याएँ सांयकाल कुछ फल आदि लेकर कपिल सरोवर पर आती, यही स्नान करके आराम करती व फल खाती तथा झूठन वहीं छोड़ जाती। कोलायत सरोवर मे स्नान के कारण उन्हें पूर्व जन्म की स्मृति हुई और ध्यान आया कि किस प्रकार वे योगभ्रष्ट हुई थी। मत्यु के पश्चात वे स्वर्ग लोक गई। वहा सुख भोगने के बाद अपनी लालसा के कारण उन्होंने पुनः ऋषि मुनियों के घर जन्म लिया व योग साधना की। कोलायत सरोवर पर झूठन छोडऩे के पाप के कारण वे सब अपने पतियों से परित्यक्त हो गई, परंतु तीर्थराज में स्नान का जो विपुल पुण्य उनहोंने अर्जित किया था। उसके फलस्वरूप वे महा योगिनियां आकाश में कीत्तिका इत्यादि छः तारे बन गई जो आज भी प्रकाशपुंज के रूप में हमें प्रकाशित कर रहे है।

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