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केदारनाथ धाम -केदारनाथ धाम का इतिहास रोचक जानकारी

प्रिय पाठको संसार में भगवान शिव  यूंं तो अनगिनत शिव लिंगो के रूप में धरती पर विराजमान है। लेकिन भंगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगो का महत्व अधिक माना जाता जिनके विषय में शिवपुराण में वर्णित है कि भूतभावन भगवान शंकर प्राणियो के कल्याण के लिए तीर्थ स्थानो में शिव लिंग के रूप में वास करते है। लेकिन जिस जिस पुण्य स्थान में भक्तजनो ने उनकी पूजा, अर्चना की और महादेव उनकी आराधना से प्रसन्न हुए उसी उसी स्थान पर भगवान शंकर प्रकट हुए और भक्तो के आग्रह और जन कल्याण के लिए ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा के लिए वही वास करने लगे। यूंं तो जैसा की हमने बताया संसार में अनगिनत शिवलिंग है। आपके आस पास भी मंदिरो व धार्मिक स्थलो में अनेको शिवलिंग होगे। संसार के इन असंख्य शिवलिंगो में सर्वप्रधान 12 ज्योतिर्लिंग माने जाते है। जिन्हें द्वादश ज्योतिर्लिंग भी कहते है। जिनका वर्णन केवल शिवपुराण में ही नही मिलता बल्कि रामायण, महाभारत तथा अन्य अनेक प्राचीन धार्मिक ग्रंथो में भी  इन द्वादश ज्योतिर्लिगोंं से सम्बंधी वर्णन भरा पडा है। इन द्वादश ज्योतिर्लिगों की धार्मिक महत्वता को देखते हुए हमने अपने पाठको के लिए इन 12 दिव्य ज्योतिर्लिगोंं की यात्रा से संबंधीत जानकारी अपने पाठको तक पहुचाने का निर्णय किया। द्वादश ज्योतिर्लिंगों की यात्रा के इस भाग में हम केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की यात्रा से संबंधीत सभी जानकारी अपने पाठको के साथ साझा करेगें। जिसे केदारनाथ धाम के नाम से जाना जाता है। द्वादश ज्योतिर्लिंगो यात्रा के अंतर्गत हमने अपने पिछले कुछ लेखो में 12 ज्योतिर्लिंगो में से निम्न का वर्णन भी किया जिनकी जानकारी हेतू आप निचे दिये गए विवरण में जाकर देख सकते है:—

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग

वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग

भीमशंकर ज्योतिर्लिंग

घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग

त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग का इतिहास

काशी विश्वनाथ धाम

इन सभी दिव्य ज्योतिर्लिगो का विवरण हम अपने पिछले लेखो में दे चुके आप इन पर क्लिक करके विवरण पढ सकते है चलिए अब हम अपना ध्यान इस लेख की ओर करते है और केदारनाथ धाम की यात्रा की सम्मपूर्ण जानकारी हिन्दी में आपके समक्ष रखते है। इससे पहले हम आपको बता दे की केदानाथ धाम की यात्रा के अंतर्गत हम जानेगें कि:-

  • केदारनाथ कहां स्थित है?
  • केदारनाथ का महत्व क्या है?
  • केदारनाथ धाम का इतिहास
  • केदारनाथ मंदिर का इतिहास
  • केदारनाथ की कथा
  • केदारनाथ के कपाट कब खुलते है?
  • केदारनाथ की ऊंचाई, कितनी ऊंचाई पर स्थित है?
  • केदारनाथ का तापमान कितना होता है?
  • केदारनाथ आरती का समय क्या है?
  • केदारनाथ के दर्शनीय स्थलो के बारे में भी जानेगें
  • आखिर में केदारनाथ की घटना और केदारनाथ की तबाही की उस दुखद घटना के बारे में भी जानेगें

 

केदारनाथ धाम के सुंदर दृश्य
केदारनाथ धाम के सुंदर दृश्य

 

केदारनाथ धाम कहाँ स्थित है?

भारत के उत्तराखंड राज्य के रूद्रप्रयाग जिले में केदार नामक पहाड पर स्थित है। यह स्थान हिमालय पर्वत की गोद में बसा हुआ है केदारनाथ धाम तीन ओर से ऊंचे पर्वतो से घिरा हुआ जिसके एक ओर केदार पर्वत है तथा दूसरी ओर खर्च कुंड पर्वत तथा तीसरी ओर भरत कुंड पर्वत है। इन पर्वतो के बीच से गुजरती पवित्र मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित केदार बाबा का यह पवित्र धाम समुंद्र तल से लगभग 3553 मीटर या 11657 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। बर्फ से ढकी पर्वत चोटियो से घिरा यह स्थल अत्यधिक मनोहारी व सुंदर दृश्य प्रस्तुत करता है। जिससे इस पवित्र स्थान पर आने वाले भक्तगण और यात्री मंत्रमुग्ध हो जाते है।

यह तो हम जान ही चुके है कि केदारनाथ कहा है? आइये आगे केदारनाथ धाम के महत्व के बारे में भी जान लेते है कि क्यो हिन्दू धर्म में इस धाम की इसकी इतनी मान्यता है? और इसके दर्शन पूजन से भक्तगणो को क्या लाभ मिलता है?

केदारनाथ धाम का महत्व हिन्दी में

श्री केदारनाथ द्वादश ज्योतिर्लिंगो में से एक है। इनको केदारेश्वर भी कहा जाता है। सतयुग में उपमन्यू जी ने यही भगवान शंकर की आराधना की थी। द्वापर युग में पाडंवो ने भी यहा तपस्या की थी। भगवान शंकर के विभिन्न अंग जो पांच स्थानो में प्रतिष्ठित हुए जिन्हें पंचकेदार कहा जाता है। उन्ही में से केदारनाथ मुख्य केदार पीठ है। शिवपुराण के अनुसार यह स्थान भगवान विष्णु के अवतार माने जाने वाले नर और नारयण ऋषि की तप स्थली भी थी जिनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उन्हें दर्शन दिये और सदा के लिए दिव्य ज्योतिर्लिंग के रूप में यहा वास करने लगे। इसके अलावा इस स्थान पर आदि गुरू शंकराचार्य ने भी तप और वास किया है। इसलिए इस स्थान को हिमालय के चारो पवित्र धाम में से एक, तथा केदार, और ज्योतिर्लिगं तीनो के रूप में पूजा जाता है। इसलिए केदारेश्वर की बडी महिमा है। और इनके दर्शनो का महत्व भी बहुत बडा माना जाता है। केदारनाथ के संबंध में लिखा है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन किए बिना बद्रीनाथ की यात्रा करता है। उसकी यात्रा निष्फल जाती है। कदारेश्वर सहित नर और नारायण मूर्ति के दर्शन का फल समस्मत पापो के नाशपूर्वक जीवन की प्राप्ति सुख और स्मृद्धि की प्राप्ति बतलाया गया है। जिसकी प्राप्ति के लिए हर वर्ष या हजारो श्रृद्धालु दर्शन के लिए आते है।

केदारनाथ बाबा का यह पवित्र धाम कहाँ है और बाबा केदारनाथ का धार्मिक महत्व व मान्यता के बारे में अब तक हम जान चुके है। अब हम केदारनाथ मंदिर के इतिहास के बारे में जानते है।

केदारनाथ का इतिहास

जैसा कि हम बता चुके है कि यह धाम ज्योतिर्लिंग और केदार के रूप में पूजा जाता है। इस पवित्र धाम पर दिव्य ज्योतिर्लिंग की स्थापना के इतिहास में शिव महापुराण में वर्णित कथा के अनुसार हिमालय पर्वत के केदार श्रृंग पर्वत पर भगवान विष्णु अपने अवतार महा तपस्वी नर और नारायण के रुप में तपस्या करते थे। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। वरदान के रूप में नर और नारायण ऋषि ने भगवान शिव से वही वास करने कि प्राथना की जिसके फलस्वरूप तभी से भगवान शंकर यहा ज्योतिर्लिगं शिव लिंग के रूप में सदा के लिए वास करने लगे। यह स्थल केदार श्रृंग नामक पर्वत पर स्थित है।

यह कथा तो यहा स्थित ज्योतिर्लिंग की स्थापना से संबंधित थी। दूसरा स्थान यहा पंचकेदार में से एक मुख्य केदार माना जाता है इस केदार की स्थापना के इतिहास में वर्णित कथा के अनुसार

ऐसा माना जाता है कि महाभारत के युद्ध में पांडवो के विजयी होने के बाद उन्हें भ्रातहत्या का पाप लग गया था। पांडव इस पाप से मुक्ती पाना चाहते थे। और भगवान शंकर के आशिर्वाद से ही उन्हें इस पाप से मुक्ती मिल सकती थी। इसके लिए वे भगवान शंकर का आशिर्वाद पाना चाहते थे। लेकिन भगवान शंकर पांडवो से रूष्ठ थे। और वह उन्हे दर्शन देना नही चाहते थे।

भगवान शंकर के दर्शन के लिए पांडव शिव नगरी काशी गए पर भगवन उन्हें वहा नही मिले फिर पांडव भगवन को खोजते हुए हिमालय तक आ पहुंचे। लेकिन जैसा कि हम बता चुके है भगवान शिव पांडवो को दर्शन नही देना चाहते थे। इसलिए पांडवो के हिमालय पहुंचते ही भगवन वहा से भी अंतर्ध्यान होकर केदार में जा बसे।

पांडव भगवन की इस लीला को समझ गए और उन्होने भी भगवान के दर्शन करने की ठान ली और अपनी लगन तथा भक्ती के चलते पांडव भगवन का पिछा करते करते केदार पहुंच गए। भगवान शंकर ने पांडवो को आता देख वहाँ चर रहे गाय बैलो के झुण्ड में आपना बैल रूपी रूप धारण करके पशुओ के झुण्ड में सम्मिलित हो गए। पांडवो को संदेह हो गया कि भगवन इन पशुओ के झुण्ड में उपस्थित है। तब भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाडो पर पैर फैला दिए। अन्य सब गाय बैल तो भीम के पैरो के नीचे से निकल गए परंतु बैल रूपी भगवान शंकर भीम के पैरो के नीचे से जाने को तैयार नही हुए। पांडव समझ गए यही भगवन है। तब भीम पूरी ताकत से बैल पर झपटे लेकिन बैल भूमि में अंतर्ध्यान होने लगा। तब भीम ने बैल की पीठ का ऊपर ऊठा हुआ भाग पकड लिया फिर भगवान शंकर पांडवो की भक्ति, दृढ संकल्प देखकर प्रसन्न हो गए और उन्होने तुरंत दर्शन देकर पांडवो को पाप से मुक्त कर दिया। उसी समय से भगवान शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ धाम में पूजे जाते है।

केदारनाथ मंदिर का निर्माण कब हुआ और किसने करवाया

केदारनाथ मंदिर का निर्माण कब हुआ यह एक रहस्य है। इसके निर्माण कि वर्ष अवधि किसी को ज्ञात नही है। परंतु यह मंदिर बहुत प्राचीन माना जाता है। केदारनाथ मंदिर का निर्माण किसने कराया इसके पिछे भी दो मत है। एक मत के अनुसार केदारनाथ मंदिर का निर्माण पांडव वंश के जनमेजय ने कराया था तथा बाद में इसका जीर्णो द्वार महा ऋषि आदि शंकराचार्य ने करवाया। दूसरे मत के अनुसार कुछ लोगो का मानना है की इसका निर्माण भी आदि शंकराचार्य ने ही करवाया था।

 

केदारनाथ मंदिर के कपाट कब खुलते है

 

(केदारनाथ धामअधिक ऊंचाई और हिमालय के करीब होने के कारण यहा शरद ऋतु में बर्फबारी अधिक होती है। जिसके कारण इस स्थान को जाने वाला मार्ग बंद हो जाता है और पारा शून्य से काफी नीचे जाने से यहा ठहरना मुश्किल होता है। जिसके करण यह स्थान लगभग आधे वर्ष बंद कर दिया जाता है। केदारनाथ मंदिर के कपाट अप्रैल माह के अंत (अक्षय तृतीया) को खुलते है। और नवंबर के महिने में कार्तिक पूर्णिमा (शरद पूर्णिमा) को पूर्ण विधि विधान के साथ मंदिर में एक दीप प्रवज्लित करके बंद कर दिए जाते है। और इस दौरान केदारनाथ जी की चल मूर्ति नीचे ऊखीमठ लाई जाती है। जहा शीतकाल के दौरान पंडे ऊखीमठ में ही नाथ जी की पूजा करते है।

 

अब तक के अपने लेख में हमने (केदारनाथ धाम का इतिहास) (केदारनाथ की कथा) (केदारनाथ मंदिर के कपाट कब खुलते है) (केदारनाथ मंदिर का निर्माण किसने कराया) आदि महत्तवपूर्ण जानकारी प्राप्त की चलिए आगे के लेख में केदारनाथ धाम के दर्शन करते है और केदारनाथ मंदिर के स्थापत्य के बारे में जानगें

केदारनाथ दर्शन

 

केदारनाथ मंदिर

 

केदारनाथ मंदिर में कोई निर्मित मूर्ति नही है। एक बहुत बडा त्रिकोण पर्वतखंड है। यात्री स्वयं जाकर पूजा करते है ओर अंकमाल देते है प्राचीन मंदिर साधारण शिव मंदिर जैसा है। पवित्र मंदाकिनी नदी की मनोरम घाटी का मुकुट जैसा दिखने वाला मंदिर केदारनाथ है और यहा का पूर्ण स्थल केदारनाथ धाम कहलाता है। मंदिर के सामने प्रागण में नंदी बैल विराजमान है। यह मंदिर बडे बडे पत्थरो से कत्यूरी शैली में निर्मित है।

मंदिर के जगमोहन में द्रोपदी सहित पांच पांडवो की विशाल मूर्तीयां, उषा, अनिरूद्ध, श्रीकृष्ण तथा शिव पार्वती की मूर्तिया है। कहा जाता है कि पांचो पांडवो ने भी यही अपनी देह का त्याग किया था। मंदिर के बाहर परिक्रमा के पास अमृतकुंड, ईशानकुंड, हंसकुंड, रेतसकुंड, आदि तीर्थ है। मंदिर के पिछे कई कुंड है जिनमे आचमन तथा तर्पण किया जाता है। पास ही में मधुगंगा, क्षीरगंगा, वासुकिताल आदि स्थान है।

 

शंकराचार्य की समाधि

वैदिक धर्म को नए सिरे से प्रतिष्ठित करने वाले श्री आदि गुरू शंकराचार्य का जन्म इसी क्षेत्र में हुआ था। आदि गुरू शंकराचार्य जी की समाधि मंदिर के ठीक पिछले भाग में बनी हुई है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि मात्र 32 वर्ष की अवस्था में वे केदारनाथ आए और सदेह कैलाश जाकर शिवत्व में लीन हो गए।

 

केदारनाथ धाम के आस पास के दर्शनीय स्थल

 

ऊखीमठ

जाडो में केदार क्षेत्र हिमाच्छादित हो जाता है। उस समय केदारनाथ की चल मूर्ति यहा लाई जाती है। शीतकाल में उनकी पूजा यही होती है। यहा के मंदिर के भीतर बदरीनाथ, तुंगनाथ, ओंकारेश्वर, केदारनाथ, उषा, अनिरूद्ध, मांधाता तथा सतयुग, त्रेता, द्वापर की मूर्तियां एंव अन्य कई मूर्तिया है।

 

भैरवझांप पर्वत

 

केदारनाथ के निकट भैरवझांप पर्वत है। पहले यहा कोई कोई लोग बर्फ में गलकर या ऊपर से कूदकर शरीरपात करते थे परंतु सन् 1829 से प्रचलित सती प्रथा के साथ साथ इस प्रथा को भी सरकार ने बंद कर दिया।

 

कालीमठ

मंदाकिनी के उस पार काली मंदिर अति प्राचीन तथा प्रसिद्ध है। ऊखीमठ से ही यहा के लिए मार्ग जाता है। यहा महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती के मंदिर है। यह सिद्धपीठ माना जाता है। कहा जाता है कि रक्तबीज नामक दैत्य का वध करने के लिए देवताओ ने महाकालीजी की आराधना की थी। तब महाकाली जी ने उन्हें दर्शन दिए थे तथा रक्तबीज दैत्य का वध किया था।

 

केदारनाथ यात्रा मार्ग

दिल्ली से केदारनाथ धाम की दूरी 467 किलोमीटर तथा ऋषिकेश 225 किलोमीटर है।  जिसमे गौरीकुंड से केदारनाथ धाम तक का 13 किलोमीटर का पैदल मार्ग है। बस या कार द्वारा आप गोरी कुंड तक ही जा सकते है इससे आगे का यात्रा मार्ग पैदल तय करना पडता है। जो बूजूर्ग यात्रियो के लिए काफी कठिन साबित होता है।

भारत सरकार के प्रयासो से आज के समय में केदारनाथ की यात्रा करना बहुत आसान व सुविधाजनक हो गया है। यदि आप पैदल यात्रा करना नही चाहते तो आप केदारनाथ हेलिकॉप्टर सर्विसेज का उपयोग कर सकते है। जिसके लिए आप ऊखीमठ के करीब दिव्य धाम, और फाटा हैलीपैड से इस सुविधा का लाभ उठा सकते है। यह सुविधा देहरादून, सिरसी, गुप्तकाशी, सीतापुर से भी उपलब्ध है। हेलिकॉपटर सुविधा के लिए आप अॉन लाइन टिकट यहा खरीदें सकते है

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