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कस्तूरबा गांधी की जीवनी – कस्तूरबा गांधी बायोग्राफी इन हिंदी

कस्तूरबा गांधी की जीवनी – कस्तूरबा गांधी बायोग्राफी इन हिंदी

भारत को गुलामी की जंजीरों से आजाद कराने वाले, भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी को प्ररेणा देने वाली और उन्हें गृहस्थ जीवन से मुक्त करके देश सेवा मे लगाने वाली कस्तूरबा गांधी एक महान देश भक्त, पवित्रता, और स्वाभिमानी भारती नारी थी। कस्तूरबा गांधी का जन्म 11अप्रैल 1869 को गुजरात के पोरबंदर मे हुआ था। कस्तूरबा के पिता का नाम गोकुलदास मकंन जी था। कस्तूरबा गांधी की माता का नाम ब्रजकुंवर कपाडिया था। कस्तूरबा गांधी के बचपन का नाम कस्तूरबा कपाडिया था।

 

कस्तूरबा गांधी की जीवनी

 

कस्तूरबा के पिता गोकुलदास मकनजी एक प्रसिद्ध व्यापारी थे। तथा प्राचीन परंपराओं को मानने वाले व्यक्ति थे। उन्होंने कस्तूरबा को पढाया लिखाया नही था। परंतु उन्हें एक योग्य गृहिणी बनाने का प्रयत्न अवश्य किया था। उन्होंने शिक्षा दी थी कि, विवाह होने पर पति की आज्ञा माननी चाहिए, सास-ससुर और गुरूजनों की सेवा करनी चाहिए।

सात वर्ष की अवस्था मे ही कस्तूरबा की सगाई गांधी जी के साथ हो गई थी। उस समय गांधी जी की भी अवस्था इतनी ही थी । कस्तूरबा लगभग गांधी जी से छः माह छोटी थी। पांच वर्ष के बाद लगभग बारह वर्ष की आयु मे दोनो का पोरबंदर मे बडी धुमधाम से विवाह हुआ। विवाह होने के बाद वह नववधू और गांधी जी की पत्नी के रूप मे गांधी जी के घर जाकर रहने लगी।

जिस तरह छाया साथ साथ चलती है, उसी तरह वे भी जीवनभर गांधी जी के साथ चलती रही। वे सच्चे अर्थो मे सहभागिनी थी। वे पत्नी के अतिरिक्त विशाल ह्रदय मां, सेविका और गृहस्थ जीवन की संचालिका थी। उनमे देशभक्ति कूट कूटकर भरी थी। गांधी जी के कार्यों में उन्होंने जिस प्रकार योगदान दिया, वह उन्हीं के योग्य था। गांधी जी को जो भी सफलता प्राप्त हुई, उसके मूल मे उन्हीं का सहयोग था।

कस्तूरबा सीधी-सादी  और सरल ह्रदय की स्त्री थी, पति और सास-ससुर में उनकी अनन्य भक्ति थी। परंतु इसका अर्थ यह नही है कि वे गांधी जी की गलत बातों को भी मानती थी। वे गांधी जी की बहुत सी बातों का विरोध भी करती थी। कभी कभी उनमे और गांधी जी मे विवाद भी पैदा हो जाता था। और मनमुटाव की स्थिति हो जाती थी। और फिर दोनो समझदारी का परिचय देते हुए अपने आप सुलह भी कर लेते थे।

 

कस्तूरबा गांधी के चित्र
कस्तूरबा गांधी के विभिन्न माध्यमों से प्राप्त चित्र

विवाह होने पर कस्तूरबा कुछ दिनों तक तो ससुराल मे रहती थी, और कुछ दिनों के लिए अपने माता-पिता के पास चली जाती थी। जब वे ससुराल में रहती थी तो गांधी जी कस्तूरबा को पढाया लिखाया करते थे। गांधी जी से ही पढ़ लिखकर उन्होंने गुजराती और हिंदी का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया था।

मैट्रिक की परीक्षा पास करने के पश्चात गांधी जी बैरिस्टरी पढ़ने के लिए विलायत चले गए। तीन चार वर्षों के बाद वे बैरिस्टरी पूरी कर भारत लौटे, और उन्होंने बैरिस्टरी प्रारंभ की, पर सफलता प्राप्त नही हो रही थी। इससे उनके कुटुंबियों को बडी निराशा हुई।

 

उन्हीं दिनों गांधी जी को एक मुसलमान व्यापारी ऐसा मुकदमा मिला, जिसके कारण उन्हें दक्षिण अफ्रीका जाना पडा। उन दिनों दक्षिण अफ्रीका में गोरो का प्रभुत्व था। वे हिन्दुस्तानियों के साथ बडा बुरा व्यवहार करते थे। गांधी जी को भी गोरो के बुरे व्यवहारो का सामना करना पडा। उन्होंने अपनी पत्नी कस्तूरबा को पत्र लिखकर सारी घटनाएं बताई, जो उनके साथ घटी थी।

कस्तूरबा को बडा आश्चर्य हुआ, वे सोच भी नहीं सकती थी,कि रंगभेद के कारण कोई मनुष्य किसी मनुष्य के साथ ऐसा  निदंनीय व्यवहार कर सकता है। वे सरल ह्रदय की आस्तिक भारतीय नारी थी। वे छल कपट से दूर संसार के सभी प्राणियों को ईश्वर की संतति मानती थी।

गांधी जी दो तीन वर्षों तक अकेले ही दक्षिण अफ्रीका में रहे। इसके बाद उन्होंने कस्तूरबा और बच्चों को भी वहीं बुला लिया। कस्तूरबा के कुल पांच पुत्र पैदा हुए थे। प्रथम पुत्र का जन्म सोलह वर्ष की अवस्था में हुआ था, पर कुछ दिनो बाद ही वह काल के गाल मे विलीन हो गया।

उसके पश्चात हरिलाल, मणिलाल और रामदास गांधी का जन्म हुआ। देवदास गांधी का जन्म उस समय हुआ, जब कस्तूरबा दक्षिण अफ्रीका में जाकर गांधी जी के साथ रहने लगी।

कस्तूरबा गांधी लगभग 17-18 वर्षों तक दक्षिण अफ्रीका मे रही। ये वर्ष उनके लिए बडे उपयोगी साबित हुए।  उन्होंने बहुत सी सामाजिक और राजनीतिक बातें सीखी  और तरह तरह की समस्याओं का ज्ञान प्राप्त किया।

इन्हीं दिनो उनके भीतर छिपी हुई शक्ति का चमत्कार भी देखने को मिला। वे गृहस्थी का संचालन करती, बच्चों का पालन पोषण करती, अतिथियों का स्वागत सत्कार करती, आपदाओं से जूझती और गांधी जी के कार्यों मे उनका हाथ बटाया करती थी।

गांधी जी ने जब टॉल्सटॉय और फिनिक्स आश्रमों की स्थापना की तो वे ही आश्रमों की देख रेख किया करती थी। वे जेल गई थी, और इस बात मैं रंचमात्र संदेह नही कि वे जेल जाने वाले सत्याग्रहियों की सेवा और सहायता करने मे किसी प्रकार की त्रुटि नहीं रखती थी। उनकी सेवाओं को देखकर सत्याग्रही उन्हे “बा” कहने लगे थे।

गांधी जी ने स्वयं एक स्थान पर लिखा– दक्षिण अफ्रीका में “बा” की कर्मठता और कार्य क्षमता को देखकर मैं स्वयं विस्मित हो जाता था। उनमें देश सेविका और संचालिका के गुण संयुक्त रूप से मौजूद थे। वे काम करते कभी थकती नही थी। संघर्ष और विध्न-बाधाओं से उनके भीतर की शक्ति में और भी अधिक ओज पैदा हो जाता था।

सन् 1907 मे दक्षिण अफ्रीका मे एक कानून पास हुआ, जिसके अनुसार प्रत्येक भारतीय के लिए अपने परिवार के सदस्यों के नाम का रजिस्ट्रेशन कराना आवश्यक हो गया। गांधी जी ने उस कानून का विरोध किया, उसके विरोध में सत्याग्रह आंदोलन भी छेडा। बहुत से सत्याग्रही पकडे गए। स्वंय गांधी जी को भी कैदी बनाकर जेल में डाल दिया गया।

गांधी जी के बंदी होने पर कस्तूरबा ने तीन दिनों तक कुछ नही खाया था। केवल इतने से ही उन्हें संतोष नहीं हुआ। वे हजारों स्त्रियों के साथ सत्याग्रह करके स्वयं भी जेल चली गई। उन्होंने जेल मे बुरे खाने के विरोध मे भूख हडताल की। उनकी हालत जभ चिंताजनक हो गई तो तीन महीने बाद.उन्हें जेल से छोड दिया गया।

कस्तूरबा गांधी जी की पाचन शक्ति नष्ट हो चुकी थी। उन्हें पानी तक नही पचता था। गांधी जी ने कई हफ्ते उनके पास रहकर उनकी सेवा की। मल मूत्र त्यागने जैसे कार्यों मे भी गांधी जी ने उनकी मदद की। गांधी जी की सेवाओं से उन्होंने नया जीवन प्राप्त किया।

गांधी जी को असहयोग और सत्याग्रह आंदोलनों मे अभूतपूर्व सफलता प्राप्त हुई। भारतीयों के विरुद्ध जो कानून बनाए गए थे। वे रद्द कर दिए गए। गोरे, जो गांधी जी के विरोधी थे, गांधी जी के मित्र बन गए। गांधी जी का नाम चारों ओर फैल गया। भारत के गांव गांव और घर घर उनकी कीर्ति गूंज उठी। लोग स्वर मे स्वर मिलाकर उनकी जय बोलने लगे।

सन् 1915 मे गांधी जी अपने परिवार के साथ भारत लौट आए। सन् 1915 मे उन्होंने कस्तूरबा के साथ भारत का परिभ्रमण किया। वे बडे बडे नगरो के साथ साथ गांवों में भी गए। उन्होंने चारो ओर दरिद्रता, गरीबी और भूख देखी। इससे प्रभावित होकर गांधी जी ने स्वयं कपडे पहनना छोड दिया। उन्होंने प्रतिज्ञा कि– “जब तक हर देशवासी को खाना और कपडा नही मिलेगा , मैं नंगे बदन रहूंगा।। गांधी जी के कपडे न पहनने, या नंगे बदन रहने का यही मुख्य कारण था।

गांधी जी ने अनुभव किया जब तक देश आजाद नही होगा। हमारे देश की गरीबी दूर नहीं हो सकती। अतः गांधी जी देश की स्वतंत्रता के लिए प्रयत्न करने लगे।

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गांधी जी ने देश की स्वतंत्रता के लिए पहली लडाई सन् 1921 में लडी थी। उनकी वह लडाई सहयोग आंदोलन के नाम से प्रसिद्ध है। उस लडाई मे अंग्रेजी सरकार के साथ साथ विदेशी सामान का भी बहिष्कार किया गया था। कस्तूरबा ने भी इस लडाई मे भाग लिया था। इस आंदोलन में गांधी जी और उनकी पत्नी कस्तूरबा दोनो गिरफ्तार हुए थे। इस गिरफ्तारी मे गांधी जी को छः वर्ष और कस्तूरबा जी की तीन वर्ष की सजा दी गई थी। परंतु सजा की अवधि पूरी होने से पहले ही उन्हें छोड दिया गया था।

गांधी जी ने स्वतंत्रता की दूसरी लडाई सन् 1930 मे लडी थी। वह आंदोलन नमक सत्याग्रह के नाम से प्रसिद्ध हैं। कस्तूरबा ने भी नमक सत्याग्रह मे भाग लिया था। उन्होंने कई स्थानों पर नमक बनाकर नमक कानून भंग किया था।

कस्तूरबा गांधी की दूसरी गिरफ्तारी सन् 1932 मे हुई थी। इह गिरफ्तारी मे उन्हें तीन महीने की सजा दी गई थी। जब वे जेल से लौटी तो उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया। परंतु थोडे ही दिनों के बाद छोड दिया गया। सन् 1938 मे उन्हें फिर गिरफ्तार किया गया।

गांधी जी ने स्वतंत्रता की तीसरी लडाई सन् 1942मे लडी । उनकी यह लडाई ” भारत छोडो आंदोलन” के नाम से प्रसिद्ध हैं। गांधी जी 9 अगस्त 1942 को सवेरे ही गिरफ्तार कर लिए गए। उसी दिन शाम को कस्तूरबा को भी गिरफ्तार कर लिया गया। गांधी जी और कस्तूरबा दोनो को ही पूना के आगाखां महल में रखा गया। उन दिनों आगा खां महल को जेल का रूप दे दिया गया था।

कस्तूरबा दो वर्ष तक गांधी जी के साथ जेल मे रही। सन् 1944 मे उनका स्वास्थ्य खराब हो गया। उन्हें कई बार दिल के दौरे पडे। अंत मे 22 फरवरी को वे गांधी जी की गोद मे सदा के लिए सो गई। कस्तूरबा गांधी की मृत्यु 22 फरवरी 1944 को हो गई। आगाखां महल मे ही उनका दाह संस्कार किया गया। उनकी अस्थियों का विसर्जन त्रिवेणी में हुआ था। जिन्हें विसर्जन करने के लिए उनके सबसे छोटे पुत्र देवदास गांधी ले गए थे।

कस्तूरबा सच्चे अर्थों में गांधी जी की सहभागिनी थी। उन्होंने घर मे गांधी जी का साथ तो दिया ही, साथ ही साथ जेलो मे भी दिया। दक्षिण अफ्रीका में जब गांधी जी जेल गए, तो उन्होंने भी जेल जाकर उनका पदानुसरण किया। यरवदा की जेल और आगाखां महल मे भी वे गांधी जी के साथ रही। यरवदा जेल में जब गांधी जी ने अनशन किया था, तो उन्होंने बडी अनन्यता के साथ उनकी सेवा की थी। गांधी जी ने उन्हीं के हाथो से फलो का रस पीकर अनशन तोडा था। आगाखां महल मे जब तक उनके शरीर में बल था। वे गांधी जी की सेवा में लगी रहती थी। उन्होंने गांधी जी की गोद मे ही अपनी सांसों का परित्याग किया। उनकी मृत्यु पर वज्र ह्रदय वाले बापू की आंखें सजल हो उठी थी। उनकी आंखो से दो बूंद आंसू धरती के आंचल मे गिर पडे थे। उन आंसुओं मे ह्रदय की जो पिडा छिपी हुई थी, कोई उसका अनुमान तक नही लगा सकता।

कस्तूरबा गांधी के इसी महान बलिदान को आज भी भारत का हर वासी अपनी यादो मे संजोए है। और उनके त्याग और बलिदान की गाथा को याद करते हुए गौरवान्वित महसूस करता है।

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