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कमला नेहरू की जीवनी – कमला नेहरू का जीवन परिचय

कमला नेहरू की जीवनी – कमला नेहरू का जीवन परिचय

कमला नेहरू गांव गांव घूमकर स्वदेशी का प्रचार करती थी। वे गांवों में घर घर जाती थी। स्त्रियों से मिलती थी, और उन्हें समझाती थी कि अपने देश का ही बना हुआ कपडा पहनना चाहिए। इससें देश की गरीबी दूर होगीं और अपने देश का धन अपने देश में ही रहेगा।

कमला नेहरु मे देशभक्ति कूट कूटकर भरी हुई थी। वे देश भक्ति में अपने शरीर, स्वास्थ्य और सुखों को भूल जाती थी। उन्होंने अपने आप को देश के चरणो मे न्यौछावर कर दिया था। वे देश की स्वतंत्रता के लिए गांव गांव पैदल घूमती थी। धूप और शीत की रंचमात्र भी परवाह नही करती थी। वर्षा के पानी में भीगती थी, परंतु स्वदेशी और खादी के प्रचार के लिए गांवों में जाना बंद नहीं करतीं थी।

 

कमला नेहरू को केवल अपने ही विदेशी कपडे जलाने से संतोष नही हुआ था। वे घर घर जाकर विदेशी कपडे इकठ्ठे किया करती थी। और उन्हें एक जगह रखकर जला दिया करती थी। वे विदेशी कपडो की होली जलाने के साथ साथ स्वदेशी का भी प्रचार किया करती थी। वे स्त्रियों से कहा करती थी कि– सबको चरखा चलाना चाहिए और सूत कातना चाहिए, और अपने हाथों से कते सूत का कपडा पहनना चाहिए।

 

सन् 1932 मे पुनः आंदोलन की आंधी चल पडी। कमला जी ने आंदोलन में भाग लिया। उन्होंने आंदोलन में भाग लेकर दो महत्वपूर्ण कार्यक्रम किए। पहला स्वदेशी वस्तुओं का प्रचार और दूसरा गांव की जनता को कर न देने के लिए तैयार करना।

 

कमला जी स्वदेशी के प्रचार के लिए विदेशी कपडो की दुकानों पर पिकेटिंग करती थी। वे हर कपडे की प्रत्येक दुकान पर जाती थी। और दुकानदारों को विदेशी कपडा न बेचने के लिए समझाया करती थी। वे दुकानदारों से मिलकर विदेशी कपडो पर सील व मुहर भी लगाया करती थी। वे इस काम मे धुप और शीत की चिंता नहीं करती थी। गर्मियों के दिनो मे लू चलती रहती थी। धरती जलते तवे के समान तपती रहती थी। और कमला जी अपनी चिंता न करके दुकानों के सामने पिकेटिंग करती रहती थी। जो भी उन्हें इस प्रकार पिकेटिंग करते हुए देखता था। उसके मन मे सहानुभूति उत्पन्न हो जाती थी। और वह मन ही मन प्रतिज्ञा कर बैठता था कि अब विदेशी कपडे कभी नही खरीदूंगा।

 

कमला जी स्वदेशी कपडे का प्रचार शहर मे ही नही, गांवो मे भी पैदल घूम घूमकर किया करती थी। वे छोटे बाजारों और कस्बो मे , सभाओं मे भाषण भी दिया करती थी। उनके प्रयत्नों और भाषणों का जनता पर बहुत प्रभाव पडता था। इलाहाबाद शहर और जिले के गांवों मे स्वदेशी का जितना अधिक प्रचार हुआ था। उतना देश के किसी ओर हिस्से मे नही हुआ था। जिसका श्रेय कमला जी के कठिन परिश्रम को ही जाता है।

 

इलाहाबाद जिले के गांवो मे जब कर बंदी आंदोलन प्रारंभ हुआ तो कमला जी ने उस आंदोलन मे भी भाग लिया। उन्होंने स्वयंसेवकों को संगठित किया, और गांवो मे जाकर किसानों को कर न देने के लिए प्रोत्साहित किया। जिसके परिणाम स्वरूप अंग्रेजों को बहुत नुकसान हुआ। और उन्होंने कमला जी को गिरफ्तार कर लिया। और तीन महीने की सजा देकर लखनऊ की जेल मे भेज दिया। परंतु पंडित मोतीलाल नेहरू का स्वास्थ्य अधिक खराब होने के कारण, उन्हें सजा की अवधि पूरी होने से पहले ही छोड दिया गया।

 

 

कमला नेहरू एक आदर्श पत्नी और एक आदर्श बहू भी थी। वे जब तक जीवित रही, अपने पति पंडित जवाहरलाल नेहरू की देख रेख व काम काज मे बडी रूचि लिया करती थी। वे सदा उनके खाने पिने और कपडों का ध्यान रखती थी। वे दौरे पर भी उनके साथ जाया करती थी। जब उनकी मृत्यु हुई तो नेहरू जी ने बडे दुख भरे शब्दों में कहा था—- मेरा जीवनसाथी मुझसे छिन गया। मैं अकेला हो गया। जनता के प्यार को पाकर कदाचित मैं इस दुख को भूल सकूँ।

 

 

कमला नेहरू
कमला नेहरू

 

कमला जी आपनी सास और ससुर की भी बडी सेवा किया करती थी। कमला जी की सास स्वरूपरानी जब बीमार पडी, तो अपने आप बिमार होने पर भी कमला जी उनकी सेवा मे जुटी रहती थी। कमला जी अपने ससुर मोतीलाल नेहरू जी को वे अपने पिता के समान समझती थी। वे उनकी सेवा मे अपने आप को भूल जाती थी। मोतीलाल जी की मृत्यु से कमला जी को इतनी मानसिक चोट पहुंची थी कि वे बिमार पड गई। सास ससुर भी कमला जी को अपनी आंखों की रोशनी समझते थे।

 

कमला जी बडी दयालु और विशाल ह्रदया स्त्री थी। वे किसी गरीब की दुख भरी बाते सुनकर ही द्रवित हो जाती थी। और उसकी सहायता करने के लिए तैयार हो जाती थी। जिस किसी का भी हाथ उनके सामने फैलता था, खाली नही लौटता था। उनकी दयालुता और रहमदिली सारे इलाहाबाद में प्रसिद्ध थी।

 

एक बार कमला जी गांव की एक सभा मे स्वदेशी पर भाषण दे रही थी। जब भाषण समाप्त हो गया तो, उनके सामने एक वृद्ध उपस्थित हुआ। वह बोला– “बिटिया” स्वदेशी तो मैं पहनना चाहता हूँ। परंतु मेरे पास पैसे नही है। कि मैं स्वदेशी धोती खरीद सकूँ। जो धोती पहने हूँ, वह विदेशी ही है। न जाने कब यह फटेगी”।

 

वृद्ध की बात सुनकर कमला जी द्रवित हो उठी। वे बटुए से कुछ रूपए निकालकर वृद्ध को देती हुई बोली— बाबा” जाओ इन रूपयों से स्वदेशी धोती खरीद लो।

 

उनकी दयालुता का दूसरा उदाहरण है कि, एक बार कमला जी एक बाजार की सभा मे भाषण दे रही थी। भाषण समाप्त होने पर उनके सामने एक स्त्री पहुंची, जो फटे कपडे पहने हुए थी, और उसकी गोद मे एक छोटा बालक था। स्त्री ने बडे ही करूण स्वर में कहा— रानीजी” आप स्वदेशी का प्रचार कर रही है। पर मे तो भूखो मर रही हूँ। आज दो दिन हो गए है, मुझे कुछ भी खाना नही मिला। आप कोई ऐसा उपाय करे, जिससे हम गरीबों को रोज भर पेट खाना मिल सके।

 

स्त्री कि बाते सुनकर कमला जी द्रवित हो उठी। उन्होंने बटुए से कुछ रूपए निकालकर देने चाहे, पर वह बिना रूपये लिए हुए ही उन्हें आशिर्वाद देती हुई चली गई। कमला जी ने जब इस घटना की चर्चा नेहरू जी से की तो उन्होंने कहा– उस स्त्री ने तो ठिक ही कहा। मनुष्य को सबसे पहले भोजन चाहिए। भोजन मनुष्य की सबसे बडी आवश्यकता है।

 

 

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कमला जी आनंद भवन की शोभा थी। वे जब तक जीवित रही, आनंद भवन मे सदा बसंत छाया रहता था। उनके संसार से जाने के पश्चात आनंद भवन उजड गया और वीरान हो गया था। इस समय वह एक पर्यटन स्थल जरूर बन गया है। पर उसमें ऐसी चहल फहल देखने को नही मिलती, जो कमला जी के जीवन काल मे थी।

 

कमला नेहरू का जीवन परिचय

 

कमला नेहरू की जीवनी

 

कमला नेहरू का जन्म 1अगस्त 1899 को दिल्ली में हुआ था। कमला नेहरू के पिता का नाम जवाहरलाल कौल था। वे एक प्रसिद्ध व्यापारी थे। उनकी दो संतानें थी। एक पुत्री और एक पुत्र। पुत्र का नाम कैलाशनाथ था। वे बडे होकर सीतापुर मे जाकर रहने लगे थे। कमला जी का पालन पोषण बडे ही लाड प्यार के साथ हुआ था। पर उनकी शिक्षा दीक्षा पर ध्यान नही दिया गया। इसका कारण यह था कि उन दिनों कश्मीरियों मे परदे की प्रथा अधिक थी। लडकियों को पढाने लिखाने का रिवाज कम था। कमला जी जो थोडा बहुत पढी वो घर पर ही पढी।

सात वर्ष की आयु मे कमला जी अपने निकट के एक रिश्तेदार के यहाँ इलाहाबाद चली गई। उनके रिश्तेदार जॉर्ज टाउन मे रहते थे। वहां भी उनकी पढाई लिखाई की ओर ध्यान नही दिया गया। वे घर पर ही पढकर हिंदी, उर्दू और साधारण अंग्रेजी का ज्ञान प्राप्त कर सकी थी।

 

सन् 1916 में कमला नेहरू का विवाह जवाहरलाल नेहरू के साथ बडी धूमधाम से हुआ। कमलाजी आनंद भवन में जाकर रहने लगी। उन्होंने थोडे ही दिनों में अपने गुणों से सबका मन मोह लिया।

 

एक वर्ष पश्चात 19 नवंबर 1917 को कमलाजी ने एक पुत्री को जन्म दिया उनकी वही पुत्री इंदिरा गांधी थी जो आगे चलकर भारत के प्रधानमंत्री पद पर सत्रह वर्षों तक बनी रही। सात वर्ष के बाद सन् 1924 मे कमला नेहरू ने एक पुत्र को भी जन्म दिया। परंतु दुर्भाग्य वश वह तीन दिनो तक जीवित रहकर स्वर्गवासी हो गया।

 

सन् 1919 में अमृतसर मे जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ। गांधी जी उस हत्याकांड से क्षुब्ध हो उठे। उन्होंने असहयोग आंदोलन की घोषणा की। पंडित मोतीलाल नेहरू और पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी आंदोलन में भाग लिया। फलस्वरूप वे गिरफ्तार किए गए और उन्हें जेल की सजा दी गई।

 

कमला नेहरू के ह्रदय पर भी असहयोग आंदोलन का प्रभाव पडा। वे भी आंदोलन मे सम्मिलित हुई। उन्होंने विदेशी कपडो की होलियां जलाई, जिसके फलस्वरूप वे भी गिरफ्तार हुई और उन्हें भी जेल की सजा दी गई।

असहयोग आंदोलन जब बंद हो गया तो सभी लोग जेल से छोड दिए गए। सन् 1924 के बाद वे बीमार पड गई धीरे धीरे उनकी बीमारी बढती चली गई। इलाज के लिए उन्हें स्विट्जरलैंड ले जाया गया। उनके साथ इंदिरा जी भी वहां गई थी। कुछ दिनो बाद नेहरू जी भी वहां पहुंच गए।

कई महीनों की चिकित्सा के बाद कमला जी ठीक हो गई। उन्होंने नेहरू जी के साथ यूरोप के कई देशो का भ्रमण किया। वहां से लौटने पर उन्होंने लंका की भी यात्रा की।

 

सन् 1930 मे नमक सत्याग्रह प्रराम्भ हुआ। मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरू ने भी सत्याग्रह मे भाग लिया। जिसके फलस्वरूप पिता और पुत्र दोनो को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।

 

कमला जी पुनः स्वतंत्रता संग्राम में कूद पडी। उन्होंने बार बार नमक बनाकर कानून को तोडा। उन्होंने जनता को भी नमक कानून तोडने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने कई सभाओं में भाषण देकर अंग्रेज सरकार के अत्याचारों की कडी निंदा की। पर सरकार ने उन्हें गिरफ्तार नहीं किया। इसका कारण यह था कि उन दिनो उनका स्वास्थ्य खराब था।

 

कुछ दिनों पश्चात कांग्रेस और सरकार मे समझौते की बाते चली। जिससे सत्याग्रह बंद हो गया। सभी नेता और कार्यकर्ता जेल से छोड दिए गए। गांधी जी गोलमेज सम्मेलन में सम्मिलित होने के लिए लंदन गए। पर समझौता न हो सका।

 

गांधी जी जब लंदन से लौट रहे थे तो उन्हें जहाज पर ही गिरफ्तार कर लिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि आंदोलन की आंधी फिर तीव्रगति  से चल पडी। मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरू फिर गिरफ्तार किए गए। मोतीलाल नेहरू को छः महिने और जवाहर लाल नेहरू को दो साल की सजा दी गई। कमला नेहरू ने भी आंदोलन में भाग लिया। उन्होंने बडे बडे जूलूसो का संचालन किया। और बडी बडी सभाओ मे भाषण दिए। परिणामस्वरूप वे भी गिरफ्तार की गई। उन्हें तीन महीने की सजा देकर लखनऊ जेल भेज दिया गया।

 

बीच मे मोतीलाल नेहरू बीमार पड गए। उनकी हालत जब चिंताजनक हो गई तो उन्हें जेल से छोड दिया गया । प्रयाग मे उनका इलाज होने लगा। परंतु बीमारी दिनों दिन बढती चली गई। जब हालत बहुत ही खराब हो गई तो जवाहर लाल नेहरू और कमला जी को भी छोड दिया गया। मोतीलाल नेहरू को बचाने के भरसक प्रयास किए गए। परंतु कोई लाभ नही हुआ। वे सारे देश को सोक सागर मे डुबोकर इस संसार से चले गए।

 

पंडित मोतीलाल नेहरू की मृत्यु के पश्चात नेहरू तो जेल चले गए। परंतु कमलाजी कांग्रेस के कार्यों में पुनः लग गई। इन्ही दिनो उन्होंने बंबई जाकर कार्यसमिति की सदस्यता के रूप मे एक बडे जूलूस का नेतृत्व किया। उनके साथ पंडित मदनमोहन मालवीय भी थे।

 

बंबई से लौटने पर कमला जी का स्वास्थ्य फिर खराब हो गया। उनके पुराने रोग तपेदिक ने उन पर पुनः आक्रमण कर दिया। उधर जब नेहरू जी जेल से लौटे, कलकत्ता में एक भाषण के अभियोग में उन्हें फिर गिरफ्तार कर लियलिया गया। इन.सभी घटनाओं का भी कमला जी के स्वास्थ्य पर बहुत प्रभाव पडा। जब उनकी बीमारी कम होती दिखाई नहीं पडी तो उन्हें चिकित्सा के लिए भवाली ले जाया गया। उन दिनों नेहरू जी भी अल्मोड़ा की जेल मे थे।

 

जब भुआली मे भी कमलाजी के स्वास्थ्य मे सुधार नही हुआ तो उन्हें जर्मनी ले जाया गया। कुछ दिनों बाद वे जर्मनी से स्विट्जरलैंड गई। वहां जब उनकी हालत चिताजनक हो गई तो नेहरू जी को जेल से छोड दिया गया। वे जेल से छूटते ही विमान द्वारा स्विट्जरलैंड जा पहुंचे।

 

कमलाजी को बचाने की भरसक चेष्टा की गई, पर वे बच न सकी। 28 फरवरी सन् 1936 को कमला नेहरू की मृत्यु हो गई। मृत्यु के समय उनके पास नेहरू जी, इंदिरा गांधी और फिरोज गांधी भी मौजूद थे।

कमला नेहरू का दाह संस्कार स्विट्जरलैंड मे ही किया गया। नेहरू जी संस्कार के बाद उनकी अस्थियां इलाहाबाद ले आए थे। उन्होंने उन्हे लाखों जनता के साथ त्रिवेणी संगम मैं विसर्जित कर दिया।

 

कमला जी भारत के स्वतंत्रता के इतिहास का एक अहम हिस्सा थी। उनके त्याग और बलिदान को आज भी भारतवासी याद करते है।

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