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अलीगढ़ के दर्शनीय स्थल – अलीगढ़ के टॉप 6 पर्यटन स्थल,ऐतिहासिक इमारतें

अलीगढ़ के दर्शनीय स्थल – अलीगढ़ के टॉप 6 पर्यटन स्थल,ऐतिहासिक इमारतें

अलीगढ़ शहर उत्तर प्रदेश में एक ऐतिहासिक शहर है। जो अपने प्रसिद्ध ताले उद्योग के लिए जाना जाता है। यह ऐतिहासिक शहर 1803 की अलीगढ़ की प्रसिद्ध लड़ाई के लिए प्रसिद्ध है। जिसमें मराठो और अंग्रेजों के बीच अधिग्रहण को लेकर युद्ध हुआ था। अलीगढ़ का किला इसकी गवाही आज भी देता है। यह शहर मुस्लिम संतों की विभिन्न कब्रों के लिए भी प्रसिद्ध है। इसके अलावा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय 1875-78 में स्थापित एक प्रसिद्ध कॉलेज है। अलीगढ़ के दर्शनीय स्थल, अलीगढ़ के पर्यटन स्थल, अलीगढ़ में घूमने लायक जगह में विभिन्न बाजार और खुबसूरत स्थान भी हैं, जिन्हें देखे बिना अलीगढ़ की यात्रा, अलीगढ़ भ्रमण, अलीगढ़ की सैर अधूरी रहती है। हम अपने इस लेख मे अलीगढ़ के इन्हीं खूबसूरत दर्शनीय स्थल के बारे मे विस्तार से बताएंगे।

 

 

अलीगढ़ के दर्शनीय स्थल

 

अलीगढ़ के टॉप 8 पर्यटन स्थल

 

 

 

अलीगढ़ के दर्शनीय स्थल के सुंदर दृश्य
अलीगढ़ के दर्शनीय स्थल के सुंदर दृश्य

 

अलीगढ़ किला

अलीगढ़ किला, जिसे ‘अलीगढ़ किला’, ‘बौनासौर किला’ या ‘रामगढ़ किला’ भी कहा जाता है, यह किला अलीगढ़ के दर्शनीय स्थल में मुख्य आकर्षणो में से एक है। किला इब्राहिम लोढ़ी के शासनकाल के दौरान 1525 में गवर्नर उमर के पुत्र मोहम्मद ने बनाया था। यह एक पहाड़ी पर स्थित है जो सभी तरफ लगभग 32 फीट खड़ी घाटी के साथ है। बहु कोण निर्माण का प्रत्येक कोण पर बुर्ज होने वाली प्राचीन गवाही का मुख्य आकर्षण है।
प्राचीन किले ने कई शासकों और गवर्नरों की सेवा की, जिनमें सबित खान, सूरजमल जाट (1753) और माधवराव सिंधिया (1759) शामिल हैं। पुराना किला 1753 में समकालीन शासक सूरजमल जाट के लेफ्टिनेंट बनसौर द्वारा लगभग 3 गुना बढ़ा दिया गया था। उन दिनों के दौरान, किले में एक विशेष विस्फोटक गोदाम और एक ठंडी हवा,और रसोई था। इसके अलावा, किले में एक तहखाना है, जो बाहर से ज्यादा दिखाई नहीं देता है।
ऐतिहासिक किला बरौली मार्ग में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उत्तर में स्थित है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय इस का प्रबंधन प्राधिकरण है, जो साइट पर बॉटनी के विभाग की सेवा भी कर रहा है। शहर के केंद्र से केवल 3 किमी की दूरी पर उत्तर, यह जगह टैक्सी, साइकिल, ईरिक्शा या ऑटो रिक्शा से आसानी से पहुंचा जा सकता है।

 

 

जामा मस्जिद

मुगलकाल में मुहम्मद शाह (1719-1728) के शासनकाल में कोल के गवर्नर साबित खान ने 1724 में इसका निर्माण शुरू कराया था। इसमें चार साल लगे और 1728 में मस्जिद बनकर तैयार हो पाई। मस्जिद में कुल 17 गुंबद हैं। मस्जिद के तीन गेट हैं। इन दरवाजों पर दो-दो गुंबद हैं। शहर के ऊपरकोट इलाके में 17 गुंबदों वाली यह जामा मस्जिद है यहां एकसाथ 5000 लोग नमाज पढ़ सकते हैं। यहां औरतों के लिए नमाज पढ़ने का अलग से इंतजाम है। इसे शहदरी (तीन दरी) कहते हैं।

देश की शायद यह पहली मस्जिद होगी, जहां शहीदों की कब्रें भी हैं। इसे गंज-ए-शहीदान (शहीदों की बस्ती) भी कहते हैं तीन सदी पुरानी इस मस्जिद में कई पीढ़ियां नमाज अदा कर चुकी हैं। अनुमान है कि इस वक्त मस्जिद में आठवीं पीढ़ी नमाज पढ़ रही है। अलीगढ़ के ऊपरकोट इलाके में स्थित जामा मस्जिद ऐसी है, जिसके निर्माण में देश में सबसे ज्यादा सोना लगा है। स्वर्ण मंदिर से भी ज्यादा।

290 साल पहले बनी इस जामा मस्जिद में आठवीं पीढ़ी नमाज अदा कर रही है। इसके गुंबदों में ही कई कुंतल सोना लगा है। यहां कुल कितना सोना लगा है, इसका किसी को अन्दाजा नहीं हैं। इस जामा मस्जिद में यह भी खास हैं कि जामा मस्जिद में 1857-गदर के 73 शहीदों की कब्रें भी हैं। इस पर भारतीय पुरातत्व विभाग कई साल पहले सर्वे भी कर चुका है यह अलीगढ़ में सबसे पुरानी और भव्य मस्जिदों में से एक है। इसको बनने में 14 साल लगे थे। मस्जिद बलाई किले के शिखर पर स्थित है तथा यह स्थान शहर का उच्चतम बिंदु है। अपने स्थिति की वजह से, इसे शहर के सभी स्थानों से देखा जा सकता है।

मस्जिद के भीतर छह स्थल हैं जहां लोग नमाज अदा कर सकते हैं। मस्जिद का जीर्णोद्धार कई दौर से गुजरा तथा यह कई वास्तु प्रभावों को दर्शाता है। सफेद गुंबद वाली संरचना तथा खूबसूरती से बने खम्भे मुस्लिम कला और संस्कृति की खास विशेषताएं हैं। अलीगढ़ के दर्शनीय स्थल मे यह मुख्य स्थल है।

 

 

खेरेश्वर मंदिर

खेरेश्वर – भगवान शिव के सम्मानित मंदिरों में से एक माना जाता है – शिवलिंग के छोटे आकार के कारण लोकप्रिय रूप से “अदृश्य शिवलिंग” के रूप में भी जाना जाता है।
खेेशेश्वर मंदिर खैर बाईपास रोड पर पड़ता है जो राज्य राजमार्ग 22 ए और राष्ट्रीय राजमार्ग 91 के बीच एक मार्ग के रूप में कार्य करता है।
यह प्राचीन मंदिर ताजपुर रसूलपुर के छोटे गांव में गंगा नदी के घाटियों पर स्थित है, जो अलीगढ़ से 5 किलोमीटर दूर है। तथा अलीगढ़ के दर्शनीय स्थल मे काफी प्रसिद्ध है।

 

 

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मौलाना आजाद लाईब्रेरी

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पुस्तकालय को मौलाना आजाद लाइब्रेरी के नाम से जाना जाता है। यह एशिया की दूसरी सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी है। इसकी सात मंजिला इमारत 4.75 एकड़ में फैली है। इसमें करीब 14 लाख किताबें हैं। 1960 में इसे मौलाना आजाद पुस्तकालय से नामित किया गया, तब प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इसकी वर्तमान इमारत का उद्घाटन किया। वर्ष 2010 में पचास साल पूरे होने पर इसकी गोल्डन जुबली मनाई गई। इस लाईब्रेरी मे काफी पर्यटक आते है। जिसके कारण यह अलीगढ़ के दर्शनीय स्थल काफी चर्चित स्थल बन गई है।

 

 

 

अलीगढ़ के दर्शनीय स्थल के सुंदर दृश्य
अलीगढ़ के दर्शनीय स्थल के सुंदर दृश्य

 

 

 

तीर्थ धाम मंगलायतन

मंगलायत में भगवान आदिनाथ को मुख्य देवता, मुलनायक के रूप में शामिल किया गया है। मंदिर परिसर में चल रही एक कृत्रिम पहाड़ी पर बनाया गया है। पहाड़ी 4 की ऊंचाई से शुरू होती है और 31 तक बढ़ जाती है। अपने चरम पर, 16 ‘x 16’ x 2.5 ‘मापने वाला एक सफेद संगमरमर मंच 10’ उच्च गुलाबी संगमरमर कमल सिंहासन का समर्थन करता है। इस पर बैठे भगवान आदिनाथ की हेलो (भामंदल) और तीन छतरियों (छत्र) के साथ एक प्रभावशाली 111 “उच्च सफेद संगमरमर की मूर्ति है।
जमीन के स्तर से 55 फीट की अधिकतम ऊंचाई तक की मूर्ति, आगरा-अलीगढ़ राजमार्ग पर जाने वाले हर किसी के लिए एक आकर्षण का केंद्र है। भक्तों के लिए मंदिर मे जाने के लिए सीढ़ी बनाई गई है। उन लोगों के लिए जो सीढ़ियों पर चढ़ नहीं सकते हैं, एक रैंप रास्ता बनाया गया है। अपंग, विकलांग और वृद्ध व्यक्तियों के लिए एक उच्च गति लिफ्ट की स्थापना भी की जा रही है।

 

 

बाबा बरछी बहादुर दरगाह

कठपुला के पास स्थित बरछी बहादुर की दरगाह पर हिन्दू-मुस्लिम, सिख-ईसाई सभी समुदाय के लोग इबादत करने दूर-दूर से आते हैं। सैकड़ों साल पुरानी इस दरगाह के बारे में मान्यता है कि यहां जो भी चादर चढ़ाकर इबादत करता है उसकी हर मन्नत पूरी होती है। यहां हर रोज सैकड़ों लोग आते हैं। जिसके चलते सुरक्षा के लिहाज से दरगाह परिसर को पूरी तरह सीसीटीवी से लैस किया गया है।
अजमेर के ख्वाजा गरीब नवाज ने ख्वाजा कुतुबद्दीन बख्तियार काकवी को अपना शागिर्द बनाया था और बाबा बरछी बहादुर काकवी के साथी थे। बाबा बरछी बहादुर का नाम सैयद तहबुर अली था, उनके अनुयायी हजरत जोरार हसन ने सबसे पहले बरछी बहादुर पर उर्स की शुरुआत की थी। बाबा बरछी बहादुर के अलावा हजरत शमशुल आफरीन शाहजमाल की दरगाह भी अलीगढ़ के इतिहास में दर्ज बहुत पुरानी दरगाह है। यह दरगाह अलीगढ़ के दर्शनीय स्थल मे काफी महत्व रखती है।

 

शेखा झील

शेखा झील अलीगढ़ शहर के केंद्र से 17 किमी की दूरी पर स्थित है, झील एक सिंचाई नहर के किनारे फैला हुआ है। झील शहर में पानी की आपूर्ति करती है। यह अपने जैव-विविधता और सर्दियों में प्रवासी पक्षियों के लिए एक जगह के लिए प्रसिद्ध है। कुछ कलहंस, बतख और अन्य प्रवासी पक्षियों की एक किस्म झील में सर्दियों में देखी जा सकती है। यदि आप प्राकृतिक सुंदरता के साथ मौसम में पक्षी देखना चाहते है तो यहां जरूर जाएं।

 

दोर फोर्टस

अलीगढ़ के प्रसिद्ध दोर किले अलीगढ़ शहर के केंद्र के ऊपरी क्षेत्र में स्थित है। हालांकि किले ने समय बीतने के साथ अपने पूर्व गौरव को खो दिया है लेकिन शानदार खंडहर अपनी कहानी बताने के लिए पर्याप्त हैं। इस किले को राजा बुद्धसेन दोर द्वारा बनाया गया था। खंडहर की साइट एक समय राजा बुद्धसेन की अदालत थी। ये खंडहर पुलिस ‘कोतवाली’ आज तक विस्तार। एक बड़ी अच्छी तरह से, घोड़े और हाथियों के लिए अस्तबल की योजना में दिखाई दे रहे हैं। एक लंबा मीनार के खंडहर उनकी खुद की एक कहानी है। कहा जाता है कि मीनार उसकी विधवा बेटी के कहने पर एक राजपूत शासक मंगलसेन द्वारा बनाया गया था। अलीगढ़ के दर्शनीय स्थल मे यह का

 

 

 

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