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अमर्त्य सेन की बायोग्राफी – अमर्त्य सेन की जीवनी,नोबेल पुरस्कार, सिद्धांत

अमर्त्य सेन की बायोग्राफी – अमर्त्य सेन की जीवनी,नोबेल पुरस्कार, सिद्धांत

क्या गरीब होना किस्मत की बात है? क्या अकाल से होने वाली मौतों को किसी भी प्रकार रोका या कम किया जा सकता है? क्यो आज भी विश्व के अधिकांश देश भूखमरी और कुपोषण जैसी गंभीर समस्या से ग्रस्त है, जबकि वे खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्म निर्भर होने या विश्व गुरू होने का दावा करते है? समान नागरिक संहिता वाले, लोकतांत्रिक देशों में आज भी स्त्री पुरूषों के बीच असमानता की एक चौड़ी खाई क्यों है? क्यो उच्चतर शिक्षा में अग्रणी माने जाने वाले देश इस सच्चाई से अनभिज्ञ बने हुए है। कि उनके देश का बचपन प्रारंभिक शिक्षा से भी वंचित है? ऐसे ही अनेक ज्वलंत प्रश्नों को उठाने वाले अमर्त्य सेन के नाम पर एक बारगी यह विश्वास करना कठिन हो जाता है कि वे विश्व के महान और ख्याति प्राप्त अर्थशास्त्री है। इसका कारण यह है कि आज तक विश्व के किसी भी अर्थशास्त्री ने चाहे वह नोबेल पुरस्कार विजेता ही क्यों न हो, अर्थशास्त्र को कभी उस दृष्टि से देखा ही नहीं था। जहां कि वह महज अर्थशास्त्र न रहकर मानव कल्याण का शास्त्र बन जाता हो। वास्तव में आज तक अर्थशास्त्र को अमेरिका और यूरोपीय अर्थशास्त्रियों द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों व परंपराओं के अनुसार उद्योग, पूंजी व लाभ हानि के आसपास ही सीमित रहने वाले एक स्पष्ट और गणितीय विषय के रूप में ही देखा जाता रहा है। सच तो यह है कि अर्थशास्त्र का अध्ययन ही पूंजी और पूंजीपतियों को अधिक से अधिक विकास के अवसर प्रदान करना रहा है। पूंजीहीन यानी गरीब व्यक्ति का तो इसमें कोई जिक्र भी नहीं किया जाता।




अर्थशास्त्र के इसी के स्वरूप को अपने क्रांतिकारी और अति नवीन सिद्धांतों द्वारा परिवर्तित करने का अद्भुत कार्य किया है अमर्त्य सेन ने। उन्होंने अर्थशास्त्र के परंपरागत सिद्धांतों को बड़े तार्किक ढंग से मिथ्या सिद्ध करते हुए, दुनिया भर के आर्थिक. तंगहाली और भुखमरी का शिकार बन रहे गरीबों के कल्याणकारी शास्त्र के रूप में स्पष्ट किया है। यद्यपि एक बार तो दुनिया भर के अर्थशास्त्री और विद्वानों को अमर्त्य सेन के कल्याणकारी अर्थशास्त्र की प्रासंगिकता को लेकर संदेह भी हुआ, किंतु जब उन्होंने अतीत, वर्तमान और भविष्य की वास्तविकताओं से जुड़े अमर्त्य सेन के शोध निबंधों और सिद्धांतों का तार्किक ढंग से अध्ययन किया तो उनके पास यह सत्य स्वीकार करने के अतिरिक्त और कोई चारा ही नहीं था कि श्री सेन वास्तव में आधुनिक और मानव कल्याण की सर्वथा नवीन विचारधारा वाले कल्याणकारी अर्थशास्त्र के जनक है। भारत ही नहीं, एशिया के प्रथम अर्थशास्त्री के रूप में जब सन् 1998 में अमर्त्य सेन को अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया तो तुंरत ही वे विश्वभर के लोगों के ध्यानाकर्षण का केंद्र बन गए। प्रसिद्ध के इस सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने वाले किसी भी व्यक्ति को प्रायः आलोचना और प्रशंसा दोनों ही प्राप्त होती है, किंतु श्री सेन इसके ही अपवाद रहे। उनके नवीन और वास्तविकता से जुड़े सिद्धांतों को झुठलाने का साहस उनके आलोचकों में भी नहीं था। यही कारण था कि दुनिया भर की पत्र पत्रिकाओं में उनके विषय में जो कुछ प्रकाशित हुआ, उनमें श्री सेन के विचारों और सिद्धांतों के प्रति सहमति ही प्रकट की गई थी। विश्व के महान अर्थशास्त्री के रूप में इस विद्वान भारतीय ने अपने जीवन के किन किन पड़ावों को पार करते हुए अपने इस दुर्लभ लक्ष्य को प्राप्त किया इसी के बारें में हम अमर्त्य सेन की जीवनी, अमर्त्य सेन का जीवन परिचय, की गाथा के अतीत में चलते है।

 

जन्म और जन्मभूमि



इस महान अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन का जन्म 3 नवम्बर 1933 को बंगाल राज्य के कोलकाता से लगभग 100 मील दूर बोलपुर स्थित शांति निकेतन में हुआ था। यह वही शांति निकेतन है जिसे भारत के प्रथम नोबेल पुरस्कार विजेता और महाकवि गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित किया गया था। जिसे आज भी भारत ही नहीं बल्कि विश्व का सर्वोच्च एवं श्रेष्ठ शिक्षा का केंद्र माना जाता है।

एक सुशिक्षित और सम्मानित बंगाली परिवार में जन्मे श्री अमर्त्य सेन के पिता का नाम आशुतोष सेन तथा माता का नाम अमिता सेन था। सेन परिवार का गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर और उनके शांति निकेतन से शुरु से ही संबंध रहा है। सच तो यह है कि श्री सेन का नामकरण गुरूदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने ही किया था। उन्होंने ही बालक सेन को अमर्त्य नाम दिया था। अमर्त्य का अर्थ उससे है जिसकी कीर्ति सदैव बनी (अमर ) रहे।



सन् 1936 में आशुतोष सेन जो स्वयं शांति निकेतन से जुड़े थे, अपने सेवा कार्य के संबंध में सपरिवार बर्मा चले गए। बालक सेन की प्रारंभिक शिक्षा की शुरुआत बर्मा में हुई। कुछ साल बर्मा में रहने के बाद इनके पिता वापिस शांति निकेतन लौट आये, तथा स्थाई रूप से शांति निकेतन में ही अध्ययन से जुड़ गए। उस समय बाल सेन की आयु 6 साल की थी, जब वे स्वाभाविक रूप से शांति निकेतन मे ही शिक्षा प्राप्त करने लगे। वास्तव मे श्री सेन का बाल्यकाल शिक्षा की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध था। शांति निकेतन जैसे विश्व प्रसिद्ध संस्थान के अतिरिक्त उनकी योग्यता और प्रतिभा को निखारने में उनके माता पिता का भी अति महत्वपूर्ण योगदान रहा, जो स्वयं शांति निकेतन से जुड़े थे।

 

शांति निकेतन व शुरूआती शिक्षा



शांति निकेतन को विश्व का श्रेष्ठतम शिक्षा संस्थान यूं ही नहीं माना जाता। सन् 1901 में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित यह शिक्षा संस्थान अपने ढंग का अनोखा है। समस्त प्रकार की ललित कलाओं, वह विश्व की श्रेष्ठ भाषाओं और भारतीय एवं पश्चिमी संस्कृति एवं विज्ञान के अदभुत समन्वय का ऐसा शिक्षण केंद्र विश्व में और कही नहीं है। यहां की सहशिक्षा पद्धति में पढ़ने वाले विद्यार्थी ज्ञान विज्ञान से ओत प्रोत वातावरण में बड़े सहज रूप से विद्या अध्ययन करते है। यहां अन्य विद्यालयों कि भांति शिक्षा विद्यार्थियों को बोझ नहीं लगती। बड़े ही सहज किंतु प्रभावी पाठयक्रम द्वारा यहां के विद्यार्थियों को ऐसी दिशा प्रदान की जाती है। जहां से वे स्वयं ही अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिभा व योग्यता को प्राप्त कर ले। इसी शैक्षिक वातावरण में पले बढ़े बालक सेन की तीव्र बौद्धिक क्षमता को देखकर यह स्वतः ही स्पष्ट हो जाता था कि आगे चलकर अवश्य ही बालक अपने कुल तथा शांति निकेतन का नाम उज्ज्वल करेगा।

 

उच्च शिक्षा



कोलकाता यूनिवर्सिटी ( प्रेसीडेंसी कॉलेज) उस समय से आज तक बंगाल में उच्च शिक्षा का प्रमुख केंद्र माना जाता रहा है। शांति निकेतन से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद श्री सेन ने सन् 1951 मे कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। बंगाल के साम्प्रदायिक दंगों और अकाल (1940 से 1943) को अपने बाल जीवन मे अत्यंत निकटता और गहराई से अनुभव करने से श्री सेन ने यह निष्कर्ष निकाला था कि इन दोनों ही त्रासदियों में हुई मौतों के लिए लोगों की आर्थिक स्थिति अत्यंत कमजोर होना और सरकारी अर्थव्यवस्था की विफलता ही प्रमुख रूप से उत्तरदायी थी। अतः अर्थशास्त्र ही एकमात्र वह विषय था, जो इन समस्याओं के अध्ययन और निराकरण का मार्ग प्रशस्त करेगा।




प्रेसिडेंट कॉलेज की ख्याति यूं ही नहीं थी। अत्यंत विद्वान और अपनी ज्ञान सम्पदा बांटने को तत्पर शिक्षक तथा ज्ञान अर्जित करने की अपरिमित लालसा लिए जिज्ञासु विद्यार्थियों की यहां कोई कमी नहीं थी। शांति निकेतन के ऐसे ही वातावरण से निकले श्री सेन शीघ्र ही यहां व्यवस्थित हो गए। भवतोष दत्त, तापस मजूमदार और धीरेश भट्टाचार्य आदि उच्च कोटि के विद्वान शिक्षकों के सान्निध्य में बिताए समय को श्री सेन आज भी नहीं भूलते इसी प्रकार सुखमय चक्रवर्ती, वरून दा और पर्था गुप्ता आदि सहपाठियों से जुडी यादें श्री सेन को आज भी अपने पुराने दिनों में लौटा लाती है। वह आज जो कुछ भी है, उसमें इन शिक्षक व सहपाठियों के तनिक भी योगदान को अनदेखा नहीं करते।

 

देश की राजनीति से रूबरू



यद्यपि कोलकाता यूनिवर्सिटी में अमर्त्य सेन का एकमात्र उद्देश्य अर्थशास्त्र का अध्ययन करना ही था, किंतु वे स्वयं को देश के उस राजनीतिक वातावरण से अलग न कर सके, जो देश के अधिकांश विश्वविद्यालयों में अपनी गहरी पैठ बनाए हुए था। वास्तव में भारत के स्वतंत्रता संग्राम और आंदोलनों में जितना योगदान राजनीतिज्ञों का रहा है, उतना ही उच्च शिक्षा संस्थानों का भी रहा है। सच तो यह है कि अधिकांश राजनितिज्ञों ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत की कॉलेज राजनीति के की है। भगतसिंह जैसे महान क्रांतिकारी हो या लोहिया जैसे समाजवादी नेता, इन सभी ने शिक्षा, स्वतंत्रता संग्राम और राजनीति का ऐसा मंच तैयार किया था, जिसने आगे चलकर देश की स्वतंत्रता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।



सन् 1947 में देश की आजादी के बाद चारों ओर देश को राजनीतिक, आर्थिक और समाजिक स्तर पर सुदृढ़ बनाने के प्रयास किए जा रहे थे। जाहिर था कि इतने बड़े उद्देश्य को पाने के लिए विभिन्न विद्वानों और विचार धाराओं को आपसी सामंजस्य से काम लेना था। जो इतना सरल नहीं था। देश में प्रचलित व मान्यता प्राप्त विचारधाराओं में जर्मन के महान दार्शनिक विचारक कार्ल मार्क्स के समाजवाद से उपजी वामपंथी विचारधारा भी अपने चरम पर थी। गरीब व मजदूर वर्ग की मूलभूत आवश्यकताओं का समर्थन करते हुए, पूंजीपति व शोषक वर्ग का उग्र विरोध प्रद्रर्शित करती यह विचारधारा भारत ही नहीं वरन विश्व के असंख्य दबे कुचले लोगों की आवाज बन चुकी थी।



श्री सेन स्वयं ऐसी अर्थव्यवस्था के पक्षधर थे जिसमें न कोई अत्यंत गरीब हो और न ही अत्यंत आवश्यक अमीर। वे एक ऐसी कल्याणकारी अर्थव्यवस्था की परिकल्पना कर रहे थे, जहां और कुछ नहीं तो कम से कम कोई मनुष्य अपनी मूलभूत आवश्यकताओं से तो वंचित न हो। इस प्रकार सक्रिय रूप से भले ही न सही, किंतु वैचारिक रूप से श्री सेन स्वयं को वामपंथी विचारधारा से जुडने से न रोक सके। वास्तव में उन्हें इस विचारधारा का वह मूल सिद्धांत ही स्वीकार्य था, जिसमें निम्न वर्ग की रोजी रोटी से जुड़े प्रशनों को उठाया गया था।

 

अमर्त्य सेन
अमर्त्य सेन

 

विदेश में अध्ययन



सन् 1953 मे श्री सेन कोलकाता यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में स्नातक (बी.ए) की डिग्री हासिल की। अब उनके सामने महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह था कि आगे की शिक्षा के लिए कौनसा संस्थान चुना जाएं क्योंकि आगे जो कुछ भी करना था। अर्थशास्त्र के क्षेत्र में ही करना था। अतः इस तथ्य को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता था कि विश्व में आज तक अर्थशास्त्र की जिन परंपराओं व सिद्धांतों का चलन था, वे सभी पश्चिमी व यूरोपीय देशों की ही देन थे।



इंग्लैंड की कैंम्बिज यूनिवर्सिटी उन सभी मानकों पर खरी उतरती थी। जो श्री सेन के आगामी अध्ययन के लिए आवश्यक या अनिवार्य थे। सन् 1953 में उन्होंने इंग्लैंड पहुंचकर कैंम्बिज यूनिवर्सिटी के ट्रिनिटी कॉलेज में अर्थशास्त्र के स्टूडेंट के रूप में पढाई शुरु कर दी। हांलाकि श्री सेन को यह जानकर कुछ निराशा हुई कि कोलकाता यूनिवर्सिटी की भांति ट्रिनिटी कॉलेज में अर्थशास्त्र के पाठयक्रम में उन विषयों को महत्व नहीं दिया गया था, जिनमें उनकी विशेष रूची थी, किंतु ट्रिनिटी कॉलेज में वर्ड के जो फैमस अर्थशास्त्री अध्धयापन कार्य कर रहे थे, श्री सेन को विश्वास था कि उनके मार्गदर्शन में वे अवश्य ही अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकेंगे। पियरो सेफा, डेनिस रॉबर्टसन तथा मॉरिस डाब आदि विद्वान अर्थशास्त्रियों के मार्गदर्शन तथा कॉलेज के अनेक अनुभवी स्टूडेंट्सो के साथ अर्थशास्त्र के सिंद्धातों को वैश्विक स्तर पर विभिन्न कसौटियों पर परखते हुए श्रीसेन ने अर्थशास्त्र को कल्याणकारी दृष्टिकोण से देखना शुरू कर दिया।



यद्यपि श्री सेन ने अर्थशास्त्र की पारंपरिक धारणाओं को परिवर्तित करते हुए जिस प्रकार अपना ध्यान पूंजी और पूंजीपतियों से हटाकर गरीब और गरीबी पर केंद्रित किया, वह कॉलेज के पाठयक्रम के सर्वथा विपरीत था, किंतु अपने शिक्षकों के सहयोग से उन्होंने अपना अध्ययन जारी रखा। यही कारण था कि उन्होंने अर्थशास्त्र को कल्याणकारी इकोनॉमी की ओर मोडते हुए “चॉयस ऑफ टैक्नीक्स” विषय पर शोध आरंभ किया। सन् 1955 में उन्होंने ट्रिनिटी कॉलेज से स्नातक की डिग्री प्राप्त की।

 

देश की चाहत और नई दिशा



ट्रिनिटी कॉलेज में अपने शोध का प्रथम चरण पूरा करने के बाद श्री सेन इस निर्णय के लिए स्वतंत्र थे कि वे अपना शेष कार्य इंडिया या इंग्लैंड कही भी रहकर कर सकते थे। अपने देश से प्रेम करने वाले श्रीसेन ने तुंरत ही इंडिया लौटने का निर्णय लिया। सन् 1956 श्रीसेन के जीवन में एक साथ अनेक खुशियां लेकर आया। इंग्लैंड के ट्रिनिटी कॉलेज में अपने शोध कार्यो को लेकर श्रीसेन भारत में भी चर्चाओं में आ गये थे। उनकी इसी प्रसिद्धि ने जीवन को एक नई राह पर मोड़ दिया। जादवपुर यूनिवर्सिटी जो कि देश के फैमस शिक्षण संस्थानों में गिना जाता है। वह इस महान अर्थशास्त्री के भारत आगमन की जैसे राह ही देख रहा था। इस यूनिवर्सिटी को अपने अर्थशास्त्र डिपार्टमेंट के लिए एक योग्य और प्रतिभावान प्रोफेसर की जरुरत थी। जब उन्होंने श्रीसेन से सम्पर्क साधा तो उन्होंने श्रीसेन की विद्वता को देखते हुए उन्हें यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र डिपार्टमेंट का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया।




यूनिवर्सिटी की समिति का यह निर्णय इतना सहज नहीं था। मात्र 24-25 वर्ष की अल्पायु वाले श्रीसेन को यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर के पद पर नियुक्त करना कुछ और बात थी, किंतु उन्हें डिपार्टमेंट का हेड़ बनाया जाना एक विवाद को जन्म दे गया। बहुत से अनुभवी और अधिक आयु वाले विद्वानों को इस प्रकार एक नौजवान को इतने महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त किया जाना रास नहीं आया। यह विवाद बढते बढते इतना बढ़ गया कि इसकी गूंज बंगाल की असेंबली तक में सुनाई दी। श्रीसेन के पक्ष और विपक्ष दोनों ही ओर से बहस और तर्कों का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह श्रीसेन की योग्यता एवं प्रतिभा के समक्ष शीघ्र ही शांत भी हो गया। इस प्रकार श्रीसेन को सर्वसम्मति से इस पद के योग्य मान लिया गया। इतनी कम आयु में इतने महत्वपूर्ण पद पर श्रीसेन की नियुक्ति शिक्षा जगत के इतिहास की अपने आप में पहली घटना थी।

 



इसके बाद श्रीसेन के जीवन ने एक अन्य नई राह पर उन्हें अग्रसारित कर दिया, जिसकी मंजिल थी श्रीसेन का गृहस्थ जीवन में प्रवेश। जादवपुर यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र विभाग के अध्यक्ष का दायित्व संभालने के कुछ साल बाद अमर्त्य सेन का विवाह सन् 1956 में बंगाल के ही एक संभ्रांत परिवार की एक सुशिक्षित कन्या नवनीता देव से हो गया। नवनीता देव अपने अपने समय से आज भी बंगला भाषा की प्रमुख एवं प्रसिद्ध लेखिका मानी जाती हैं। ट्रिनिटी कॉलेज से शुरु किए गए अपने शोध कार्य को आगे बढ़ना, यूनिवर्सिटी के विभागाध्यक्ष का दायित्व निभाना तथा अपने नव गृहस्थ जीवन को सकुशल आगे बढ़ना आदि, इन सभी जिम्मेदारियों का पूरी तन्मयता से निर्वाहन करते हुए श्रीसेन सन् 1957 में पुनः इंग्लैंड चले गए।



श्रीसेन द्वारा निर्धारित से भी कम समय में अपना शोध कार्य पूर्ण करने के फलस्वरूप कॉलेज द्वारा उन्हें फैलोशिप प्रदान की गई। अपने इंग्लैंड प्रवास के दौरान श्रीसेन ने अर्थशास्त्र को एक नए दार्शनिक दृष्टिकोण से देखते हुए अपना शोध कार्य जारी रखा। इसी संदर्भ में वे अनेक विश्व प्रसिद्ध विद्वानों, विचारकों दार्शनिकों व अर्थशास्त्रियों के संपर्क में आए। इन महान विद्वानों के साथ किए गए विचारों के आदान प्रदान के फलस्वरूप श्री सेन को ऐसे अमूल्य अनुभवों की प्राप्ति हुई, जिन्होंने आगे चलकर उनके लक्ष्य की प्राप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।



सन् 1958 में श्रीसेन ने जादवपुर यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र विभागाध्यक्ष का पद छोड़ दिया तथा अपने दो वर्षों के छोटे किंतु कभी न भूलने वाले कार्यकाल से विदा लेकर ट्रिनिटी कॉलेज में अपने शोध कार्य में पूरे मनोयोग से जुट गए। सन् 1959 में उन्होंने कॉलेज से स्नातकोत्तर ( एम.ए) तथा बाद में डॉक्टरेट ( पी.एच.डी) की डिग्री प्राप्त की।
अपने इस अतिव्यस्त कार्यकाल में श्रीसेन अपने पारिवारिक दायित्व को नहीं भूलें। अपनी मां तथा पत्नी से मिलने वह समय निकालकर भारत आते जाते रहते थे। इस बीच वे एक सुंदर पुत्री के पिता भी बन गए थे। प्यार से उसका नाम अंतरा रखा गया। सन् 1957 से 1963 का लंबा समय ट्रिनिटी कॉलेज के फैलो के रूप में व्यतीत करते हुए श्रीसेन ने अनेक विदेशी विद्वानों तथा अपने अपने क्षेत्र के महारथियों से भी वार्ताएं की तथा उनसे प्राप्त विचारों व अनुभवों का लाभ उठाया। कुल मिलाकर अपने इस शोध कार्य में श्रीसेन ने जिस नवीन धारणा का सूत्रपात किया, वह थी अर्थशास्त्र जैसे विशुद्ध गणितीय और आंकड़ों के सिद्धांतों पर आधारित विषय को दर्शनशास्त्र जैसे गहन और गंभीर विषय के साथ जोड़कर जन कल्याणकारी बनाना।

 

वतन की फिर वापसी



सन् 1956 में जादवपुर यूनिवर्सिटी को अपनी सेवाएं दे चुके श्री अमर्त्य सेन की जीवनी में पुनः वह अवसर आया, जब देश को उनकी सेवाओं की आवश्यकता थी। इस बार उनका कार्य क्षेत्र बना देश की राजधानी दिल्ली का दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, जो अपने विषय का एक ख्याति प्राप्त शिक्षा संस्थान था। सन् 1963 से उन्होंने इस संस्थान को अपनी सेवाएं देनी शुरू कर दी। उस समय अनेक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री वी.के आर, वी. राव, के.एन राज, बी.एन. गांगुली, तथा डी. नारायण आदि इस संस्थान से जुड़े थे।



यही वह समय था जब श्रीसेन अपनी एक महत्वपूर्ण कृति कलैक्टिव ऑफ चॉयस एंड सोशल वेलफेयर पर शोध कार्य भी कर रहे थे। यह पुस्तक अनेक अध्यायों मे विभाजित थी, जिसमें से एक प्रमुख अध्याय था समाजिक अभिरुचि। यह अध्याय उसी विषय पर आधारित था, जो श्रीसेन के शोध का केंद्र था। श्रीसेन के दिल्ली स्कूल में अध्ययन के समय एक दिलचस्प बात उभरकर सामने आई। हुआ यह कि स्कूल के अनेक छात्रों को सामाजिक अभिरुचि नामक इस विषय में रूचि नहीं थी, किंतु जब उन्हें पता चला कि श्रीसेन इस विषय के माहिर विद्वान है तो स्वतः ही इस विषय से जुड़ते चले गए। इस प्रकार श्रीसेन ने अपने इस कार्यकाल में एक अन्य उपब्धि जो प्राप्त की, वह यह थी कि उन्होंने अपने जिस नवीन अर्थशास्त्र सिद्धांत की रूपरेखा तैयार की थी, निकट भविष्य में उसे आगे बढ़ाने वाले भावी कर्णधार तैयार हो चुके थे।

 

लंदन से बुलावा



अक्सर देखा गया है कि विदेशों में भारतीय प्रतिभाओं को जो सम्मान दिया जाता रहा है, उतना शायद भारत में नहीं दिया जाता। स्पष्ट रूप से इसके पीछे यही सोच काम करती है कि विश्व की ये महान प्रतिभाएं विदेशों में रहकर वहीं के हित के लिए कार्य करें। अपने इस स्वार्थ पूर्ण उद्देश्य की पूर्ति के लिए विदेशों में इन प्रतिभाओं को धन, सम्मान, सुख वैभव क्या कुछ नहीं दिया जाता। यद्यपि श्रीसेन कभी भी इन इच्छाओं को लेकर विदेश नहीं गए। तथापि यह उनकी विवशता थी कि जिस लक्ष्य की प्राप्ति को लेकर वे चल रहे थे। उसकी मंजिल विदेश में ही थी, भारत में नहीं। यह सच भी था क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी सोच को विकसित करने तथा किसी विचार को क्रियान्वित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय समाज से जुड़ना बहुत आवश्यक था।



यही कारण था कि सन् 1963 से 1971 तक लगभग आठ साल तक दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स को अपनी सेवाएं देने के बाद श्रीसेन लंदन चले गए। और वहा के लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक के पद पर कार्य करने लगे। सन् 1971 से 1977 तक लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स अपनी सेवाएं देने के बाद श्रीसेन के अध्ययन, अध्यापन, शोध और लेखन का जो अनवरत क्रम आरंभ हुआ, वह सालों तक चलता रहा। सन् 1977 से 1988 तक इंग्लैंड और अमेरिका की फैमस यूनिवर्सिटियों में अध्यापन कार्य करते हुए अत्यंत भागादौड़ी का जीवन बिताने वाले श्रीसेन ने लगभग आठ से दस शिक्षण संस्थानों, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, कार्नेल यूनिवर्सिटी, स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी, वैस्टेलियन यूनिवर्सिटी, बर्कले यूनिवर्सिटीकैंम्बिज यूनिवर्सिटी आदि के छात्रों को अपने अर्थशास्त्रीय ज्ञान से अवगत कराया।



इस बीच वे अपने शोध कार्य के लिए आंकड़े और महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाने के लिए एशिया और अफ्रीका के दूरस्थ देशों की यात्राएं भी करते रहे। अपने इस उद्देश्य में वे अध्ययन अध्यापन के साथ साथ देश विदेशों की विभिन्न पत्र पत्रिकाओं, सामाजिक संस्थाओं तथा सरकारी एवं गैर सरकारी संगठनों से भी निरंतर जुड़े रहे। समय समय पर उनके लेख व निबंध प्रकाशित होते रहे, जिससे उनके विचारों व प्रतिभा से प्रभावित होकर भी अनेक विद्वान उनसे जुड़ते गए तथा उनके कार्यों में सहयोगी बने।

 

शोध यात्राएँ



यह तो स्पष्ट ही था कि श्रीसेन जिस विराट लक्ष्य को लेकर चल रहे थे, वह सरल नहीं था। जो शोध निबंध वे लिख रहे थे, वह किसी साहित्यकार द्वारा बंद कमरे या प्राकृति के मनोरम स्थानों पर आराम से बैठकर लिखी जाने वाली रचनाएं नहीं थी। श्रीसेन स्वंय इस बात को समझते थे कि जब तक इन समस्याओं की गहराई में जाकर स्वयं उनका अनुभव नहीं किया जायगा, तब तक वास्तविक कारणों और समाधानों को खोजना असम्भव है। इसके लिए वे स्वयं एक अन्वेषक के रूप में बंगाल, इथोपिया, बंगलादेश और साहेल प्रदेश सहित विश्व के ऐसे अनेक देशों और स्थानों पर गए, जो लंबे समय से गरीबी, अकाल, भुखमरी, सूखा और सामाजिक असमानता जैसी भयंकर और गंभीर समस्याओं से ग्रस्त थे।



उन्होंने इस संबंध में समस्त महत्वपूर्ण जानकारियां और आंकड़े प्राप्त करने के लिए अनेक देशों के राष्ट्रीय व सामाजिक संगठनों के साथ साथ अंतरराष्ट्रीय संगठनों का सहयोग प्राप्त किया व उन्हें भी अपना सहयोग दिया। वे इन समस्याओं से जूझ रहे आम लोगों के बीच गए तथा उनकी विवशता और पीड़ा का अनुभव व अध्ययन किया। वे अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के विश्व रोजगार कार्यक्रम से जुड़े तथा उनके साथ मिलकर इन समस्याओं के कारणों व निराकरण के उपायों से संबंधित महत्वपूर्ण निबंध व लेखों को भी संकलित किया। उनकी एक महत्वपूर्ण पुस्तक “पावर्टी एंड फेमिन्स” इसी कार्यकाल में प्रकाशित हुई थी।

अमर्त्य सेन विचारधारा



यद्यपि श्री सेन की विचार धारा अर्थशास्त्र के कल्याणकारी स्वरूप को प्राप्त करने के लक्ष्य तक पहुंचकर भी समाप्त नहीं होती, वरन वह वहां भी ऐसी अनेक सम्भावनाओं का द्वार खोलती है, जो विश्व शांति और विश्व कल्याण जैसे परम लक्ष्यों की ओर जाते है, तथापि उनके विचारों को स्पष्ट रूप से समझने के लिए उनके द्वारा चुने गए उन विषयों को अलग अलग रूप से जानना आवश्यक हो जाता है। वास्तव में यही वे विषय है जिनके अध्ययन और शोध ने ही श्रीसेन को नोबेल पुरस्कार जैसा विश्व का सर्वोच्च सम्मान दिलाने की आधारशिला रखी। प्रमुख क्षेत्र में उनके विचार



गरीबी :—– गरीबी श्रीसेन के अर्थशास्त्र विचारों के सबसे महत्वपूर्ण और केंद्रीय विषय के रूप में उभरी समस्या है। वे गरीबी को मात्र आंकड़ों व गरीबी की रेखाओं के निर्धारण तक सीमित रखकर नहीं देखते। वे स्पष्ट कहते है कि गरीबी मुद्दा है अभावों का। इस पर भी यह समस्या तब और भी चिंताजनक हो जाती है, जब समाज का एक वर्ग गरीबी और गरीबों को घृणा की दृष्टि से देखने लगता है। जिसके परिणामस्वरूप गरीबी व गरीब समाज और देश के लिए हानिकारक सिद्ध होने लगे। आज विश्व के सभी विकसित और विकाशशील देश गरीबी की समस्या से जूझ रहे है। यद्यपि अधिकांश देशों में लोकतंत्र है, तथापि वहां की सरकारें और सरकारी मशीनरी आज तक ऐसे सार्थक कदम नहीं उठा सकी है, जिनसे गरीबी को दूर किया जा सके। वह कहते है कि जब तक बातों पर विचार नहीं किया जाएगा कि गरीबों की गरीब लोग कितने अभावग्रस्त है, उनकी दशा और दिशा में कैसे परिवर्तन आ रहे है और इन सबके पीछे कौन से कारण है, तब तक इस समस्या का सही निदान संभव नहीं होगा और सही निदान के अभाव में सही उपचार कैसे हो सकेगा।



सामंतवादी व पूंजीवादी अर्थव्यवस्था:—– यद्यपि आज सामंतवाद अपनी समाप्ति पर है, किंतु कभी गहराई तक जमी इसकी जड़ो का प्रभाव आज भी देखा जा सकता है। अपने स्वार्थ और लाभ के लिए एक वर्ग विशेष द्वारा जिस प्रकार समाज के एक बडे वर्ग का शोषण कर उसे गरीबी, भुखमरी, विवशता और बदहाली की अंधेरी खाई में धकेल दिया गया था, उससे निकलने में आज भी मनुष्यों की एक बड़ी आबादी सफल नहीं हो पाएं है, जो इस समस्या का निराकरण करसके। प्रत्येक देश की अर्थव्यवस्था ऐसे नेताओं और पूंजीपतियों के हाथों में टिकी है, जो पूंजी लगाकर अधिक से अधिक धन कमाने को ही अर्थव्यवस्था का मूल मंत्र मानते है। ऐसे लोग जैसे जैसे और भी अधिक धनवान होते जाते है, वे धन का अभाव झेल रहे लोगों को और भी हाशिए पर धकेल देते है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था सभी लोगों के सामने यह धारणा स्पष्ट कर देती है कि धन कमाने के लिए धन लगाना जरूरी है। यह धारणा उन लोगों को हतोत्साहित करनेके लिए प्रयाप्त होती है, जो किन्हीं अन्य साधनों से अपनी गरीबी को दूर करने के लिए सोचते है।



सरकारे और उनकी नीतियां:—– इसी प्रकार सरकार और उसकी नीतियां, जो गरीबी की रेखा का निर्धारण और गरीबों की संख्या के आंकड़ें एकत्र कर, यह कहकर अपने दायित्व से मुक्त हो जाती है कि गरीब लोग अपनी गरीबी के लिए स्वयं उत्तरदायी है, वे सरासर दोषी है। कोई भी गरीब व्यक्ति इसलिए गरीब बना रहता है क्योंकि गरीबी के संबंध में उसकी मिथ्या धारणा, सहज एवं सरल मनोवृत्ति, गरीबी दूर करने के उपायों के प्रति अनभिज्ञता, अज्ञानता और इन सबसे उपजी उदासीनता उसे गरीबी से मुक्त होने का अवसर ही प्रदान नहीं करते। गरीबी को अपनी नियति मानकर, अभावों भरा जीवन जीने वाले गरीबों की दशा सुधारने के लिए यदि सरकारें, जो कि ऐसा करने में सक्षम है, वे ही कोई सार्थक कदम नहीं उठाएंगी तो कौन उठाएगा?। गरीबों को उनके उपयुक्त काम के अवसर प्रदान किये जाएं, उनको उनकी मेहनत का उचित परिणाम समय पर और सम्मान के साथ दिया जाएं तो फिर गरीबों की आर्थिक और सामाजिक दशा क्यो नहीं सुधरेगी? । भ्रष्ट नौकरशाही, नीतियों का त्रुटिपूर्ण मूल्यांकन और समय पर इन नीतियों का प्रभावी रूप से क्रियान्वयन न होना ही इस लक्ष्य की सबसे बड़ी बाधाएँ है। क्या ऐसा लोकतंत्र और ऐसी सरकारे हंसी की पात्र नहीं है, जो विभिन्न क्षेत्रों में विकास करने का दावा करते है, पर अपने देश की एक बड़ी आबादी को भूखे पेट और फटेहाल स्थिति में जीते मरते देखते रहते है। पूछे जाने पर उनका रटा रटाया एक ही जवाब होता है कि सरकारी तंत्र इस दिशा में अपना काम कर रहा है, फिर भी गरीबी बरकरार है तो क्या किया जाए? श्री अमर्त्य सेन ने अपने तर्कों और आंकड़ों से यह सिद्ध कर दिया है कि केवल कहने से ही कुछ नहीं होगा, यदि सरकारें उनके प्रतिपादित सिद्धांतों व उपायों पर गंभीरता से अमल करें तो अवश्य ही गरीबी से मुक्ति पाई जा सकती है।




अशिक्षा गरीबी का प्रमुख कारण:—- अर्थशास्त्र को एक कल्याणकारी रूप प्रदान कर मानव जाति को गरीबी से मुक्त कराने के लक्ष्य में अशिक्षा या अज्ञानता को श्रीसेन एक प्रमुख बाधा मानते है। अशिक्षित गरीब व्यक्ति लम्बें समय तक गरीबी और हीनता की स्थिति में रहने के कारण यही मान लेता है कि गरीब होना उसके भाग्य में ही लिखा है, जिससे छुटकारा नहीं मिल सकता।



बेरोजगारी:—- बेरोजगारी अपने आप में गरीबी का मुख्य स्त्रोत है। आर्थिक तंगहाली से ग्रस्त व्यक्ति बिना किसी रोजगार के कैसे अपने अभावों को दूर कर सकता है। श्रीसेन कहते है कि यह कहना गलत न होगा कि प्रत्येक देश में सभी क्षेत्रों में विकास की गति को देखते हुए रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध है। फिर वे कौनसे कारण है कि बेरोजगारी बढ़ती ही जा रही है। यद्यपि श्रीसेन इसके लिए अशिक्षा और तेजी से बढ़ती जनसंख्या को भी कुछ उत्तरदायी मानते है, तथापि इससे भी अधिक उत्तरदायी मानते है उस प्रणाली को, जिसमें या तो जरूरतमंदों को उपयुक्त रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं होते और होते भी है तो पात्र को उसका उचित मेहनताना नहीं मिल पाता। भ्रष्ट नौकरशाही और सामंतवाद मानसिकता इसका प्रमुख कारण है। श्री सेन आग्रह करते हैं कि बेरोजगारों को रोजगार के उपयुक्त अवसर वहीं प्रदान किए जाने चाहिए जहाँ उन्हें सुविधा हो। रोजगार के पाने के लिए धक्के खाना और मेहनताने के लिए गिड़गिड़ाते फिरना बेरोजगार के अन्याय से कम नहीं है। नौकरियों या छोटे उद्योगों द्वारा लोगों को आत्मनिर्भर बनाना कल्याणकारी अर्थव्यवस्था का प्रमुख अंग है।



समाजिक असमानता:—- किसी भी देश के सर्वांगीण विकास के मार्ग में सामाजिक असमानता भी एक प्रमुख बाधा है। लिंग, जाति, धर्म, या अन्य किसी भी आधार पर सामाजिक व आर्थिक क्षेत्रों में स्त्री पुरूषों के बीच किया जाने वाला भेद आर्थिक व्यवस्था के लिए ठीक नहीं है।



अकाल और भूखमरी से मौतें:—- श्रीसेन ने अपने तर्कों व प्रमाणों से यह सिद्ध कर दिया कि केवल भारत ही नहीं, विश्व के अधिकांश देशों में अकाल से होने वाली मौतों के लिए प्रकृति नहीं वरन वहां के सरकारी तंत्र की विफलता और गरीबी ही उत्तरदायी थी। जब श्रीसेन आंकड़े प्रस्तुत करते है जिनसे पता चलता है कि अकाल या भूखमरी से मरने वाले लोगों में गरीब किसान, खेतीहर मजदूर, काश्तकार जैसे गरीब और आर्थिक बदहाली का शिकार लोग ही थे।

 

अमर्त्य सेन के सिद्धांत कैसी हो अर्थव्यवस्था

श्री अमर्त्य सेन को आधुनिक युग का ऐसा क्रांतिकारी अर्थशास्त्री माना जाता है, जिन्होंने अर्थशास्त्र के पारंपरिक और पूंजीवादी व्यवस्था पर आधारित सिद्धांतों को मानव कल्याणकारी अर्थव्यवस्था में परिवर्तित करने का मार्ग प्रशस्त किया है। उनके अनुसार एक आदर्श और मानव कल्याण को समर्पित अर्थव्यवस्था का स्वरूप कैसा होना चाहिए?। उनके निम्न दृष्टिकोणों से समझा जा सकता है::::—–

• किसी भी देश में कल्याणकारी अर्थव्यवस्था की स्थापना के लिए वहां सबसे पहले एक आदर्श लोकतांत्रिक शासन प्रणाली का होना अनिवार्य है।

• सरकार की नीतियां इस प्रकार की हो कि उनसे समाज के अंतिम व्यक्ति को भी लाभ पहुंचे।

• अशिक्षा अनेक बुराइयों और समस्याओं की जड़ है। अतः शिक्षा प्रणाली ऐसी हो, जो सहज सुलभ होने के साथ साथ रोजगारपरक भी हो। देश और समाज के प्रत्येक आयुवर्ग के लोगों को शिक्षा का लाभ मिलें, प्रत्येक सरकार को इसके लिए ठोस कदम उठाने होगें।

• उद्योगों और अर्थव्यवस्था का ढांचा ऐसा होना चाहिए कि वह केवल पूंजीवादियों के हाथ का खिलौना बनकर न रह जाएं।

• अकाल और भूख से लोगों का मरना किसी भी देश की अर्थव्यवस्था और अस्मिता पर प्रश्न चिन्ह है। अतः देश में खाद्यान्न भंडारों की सुनिश्चितता तथा आपात स्थिति में अनाज को पीडितों तक पहुंचाने के लिए उत्तम वितरण प्रणाली की व्यवस्था करना भी एक प्राथमिकता होनी चाहिए।

• लिंग आयु अथवा कार्यक्षमता के आधार पर किसी भी क्षेत्र में होने वाला भेदभाव, इस मार्ग की एक बड़ी बाधा है। अतः इसे दूर करने के सार्थक उपाय करना भी बहुत आवश्यक है।

• बाल मजदूरी तथा बाल मजदूरों का होने वाला शोषण मात्र सामाजिक नहीं, वरन राष्ट्रीय समस्या है। इस पर रोक लगाने के लिए कड़े नियमों व कानूनों का प्रावधान होना चाहिए।

• वैसे तो महिलाओं के साथ होने वाला अपमान, दुर्व्यवहार व उनका शोषण विश्वव्यापी समस्या है। किंतु एशियाई देशों में इसकी स्थिति बहुत बुरी है। पुरूषों के मुकाबले महिलाओं को अधिक मेहनत करने पर भी असुविधा और अभाव से ग्रस्त जीवन बिताना पड़ता है। पुरूषों के मुकाबले महिलाओं की तेजी से घटती जनसंख्या भी इसका उदाहरण है। इस गंभीर समस्या को दूर करना भी कल्याणकारी अर्थव्यवस्था का प्रमुख अंग है।

• रोजगार और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने के अधिकाधिक अवसर अधिकाधिक लोगों को उपलब्ध कराना सरकार का दायित्व है।

• किसानों को उनके उत्पादन का उचित लाभ मिले तथा अकाल या सूखे की स्थिति में उनकी क्रय शक्तियों में ह्रास न आए, इसकी सुनिश्चितता करना भी प्रमुख दायित्व है।

• कुपोषण और उसके कारण बढ़ती मृत्यु दर, मानवता के विरुद्ध अपराध है। इस पर तुरंत रोक लगाने के उपाय करने होगें।

• भ्रष्ट और निकम्मी नौकरशाही देश के सर्वांगीण विकास को दीमक की तरह खोखला कर देती है। इस पर अंकुश लगाना होगा।

 

सर्वोच्च नोबेल पुरस्कार की प्राप्ति



सन् 1998 को जब अमर्त्य सेन न्यूयॉर्क के एक होटल ठहरे हुए थे, तभी स्टॉकहोम (स्वीडन) की नोबेल समिति के एक पदाधिकारी ने इस होटल से उनके संबंध में जानना चाहा। जब श्रीसेन को इसकी सूचना मिली तो उन्हें कुछ कुछ आभास तो हो गया था कि क्या होने वाला है?। किंतु पूरी तरह तब तक विश्वास नहीं हो सका जब तक कि उस पदाधिकारी ने स्वयं उनको यह विश्वास नहीं दिलाया कि उन्हें सन् 1998 के अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार के विजेता के रूप में चुना गया है। उनके अविश्वास का कारण यह था पिछले दो तीन वर्षों से बन रहा वह माहौल, जिसमें उन्हें नोबल पुरस्कार दिए जाने की बातें बड़े जोर शोर से उठती तो थी, किंतु समय आने पर होता कुछ नहीं था।



वास्तव में इसके पीछे उनके कतिपय विरोधियों का वह गुट काम कर रहा था, जो उनकी इस नई आर्थिक विचारधारा से सहमत नहीं था। अमर्त्य सेन को नोबेल पुरस्कार मिलने के पीछे होने वाली देरी की वजहें चाहे कुछ भी रही हो, किंतु जब सन् 1998 में उन्हें इस सम्मान के योग्य माना गया तो उन्होंने सबसे पहले यह सूचना शांति निकेतन में रह रही अपनी मां को फोन द्वारा दी। उनकी मां को भी उनसे कई बार पूछकर ही इस सत्य पर विश्वास हुआ कि वास्तव में अमर्त्य सेन नोबेल पुरस्कार के लिए चुने गए।



जब अमर्त्य सेन को 10 दिसंबर, 1998 को नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया तो समूचा विश्व इस महान भारतीय अर्थशास्त्री की योग्यता व प्रतिभा के समक्ष नमस्तक हो उठा। उनके कल्याणकारी अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों का विश्व के सभी देशों ने स्वागत किया। भारत और विशेषकर उनके गृह निवास शांति निकेतन की तो वहां पर व्याप्त प्रसन्नता का तो वर्णन ही करना कठिन है।

 

व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन



लंबे समय तक जिस गहन अध्ययन और शोधों के परिणामस्वरूप श्रीसेन ने यह उपलब्धि अर्जित की है, यह तभी संभव हो सकता है, जब कोई व्यक्ति शेष दुनिया से निश्चिंत होकर अपना सम्पूर्ण ध्यान अपने लक्ष्य पर ही केंद्रित रखें। यद्यपि श्रीसेन ने कभी भी अपने लक्ष्य को पल भर के लिए भी विस्मृत नहीं किया, किंतु पारिवारिक जीवन जिन उतार चढ़ाव से होकर गुजरा है, उसका उनके व्यक्तिगत जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा होगा? यह सिर्फ वे ही समझ सकते हैं।



अमर्त्य सेन को अपने जीवन में तीन विवाह करने पड़े। इन तीनों ही विवाह संबंधों में श्रीसेन की सहमति मात्र इतनी थी कि उन्होंने स्वयं को जीवन के इन उतार चढावों के प्रति अनुकूल बनाए रखा। अमर्त्य सेन का विवाह सन् 1956 में नवनीता देव से हुआ था। यह वैवाहिक संबंध लगभग 14 साल तक चला, जो कि सन् 1970 में पति पत्नी दोनों की आपसी सहमति से टूट गया। इस संबंध के टूटने का कारण उनका अति व्यस्त जीवन और नवनीता देव का अपनी साहित्य साधना और अपने पति की जीवन शैली से तालमेल न बिठा पाना। यद्यपि उनको इस बीच एक पुत्र एक पुत्री की प्राप्ति भी हुई, किंतु वे भी इस संबंध को बनाए रखने में सेतु का काम न कर सके। यद्यपि श्रीसेन ने इस संबंध को बनाए रखने का भरसक प्रयास किया, किंतु वे इसमें सफल न हो सके। सन् 1970 में यह संबंध टूटने के बाद से उनके दोनों बच्चे अपनी मां के साथ बंगाल में ही रहते है। बेटी का नाम अंतरा है और बेटे का नंदन।



इसे जीवन की नियति मानकर श्रीसेन ने स्वयं को पुनः लक्ष्य की ओर केंद्रित कर लिया था कि सन् 1971 में उनके जीवन में ईवा नामक एक यहूदी युवती आई, जो स्वयं अर्थशास्त्र और दर्शनशास्त्र की प्रतिभावान छात्रा थी। शीघ्र ही दोनों के कुछ समय तक चले विचारों के आदान प्रदान ने कब उन्हें एक दूसरे का जीवन साथी बनाने की राह पर चला दिया पता ही नहीं चला। ईवा से भी श्रीसेन को एक पुत्र और एक पुत्री की प्राप्ति हुई। सब कुछ ठीकठाक चल ही रहा था कि इस विवाह के लगभग 14 साल बाद 1985 में ईवा भी श्रीसेन को का साथ छोड़ गई। यह बड़ी दुखद घटना थी क्योंकि ईवा कैंसर की बीमारी के कारण मृत्यु का शिकार हुई थी। बच्चे अभी छोटे ही थे। मां के बिना अबोध बच्चों के लालन पालन की जिम्मेदारी अब श्रीसेन के कंधों पर थी। ईवा से उत्पन्न पुत्र का नाम कबीर था और पुत्री का नाम इंदिरानी।

जीवन की इस कठिन घड़ी में श्रीसेन ने अपने समस्त दुखों को सहन करते हुए एक पिता के रूप में अपने दायित्वों को बखूबी निभाया। उन्होंने अपने बच्चों को कभी मां की कमी का अनुभव नहीं होने दिया। उनके पालन पोषण और शिक्षा दीक्षा के लिए वह जो भी कर सकते थे उन्होंने किया। सन् 1991 में जब श्रीसेन कैंम्बिज यूनिवर्सिटी के ट्रिनिटी कॉलेज में अध्यापन कार्य कर रहे थे, तब ही उन्होंने अपना तीसरा विवाह एम्मा रोथ्स चाइल्ड नामक एक ब्रिटिश युवती से किया, जो स्वयं ट्रिनिटी कॉलेज में अध्यापन कार्य कर रही थी। श्रीसेन ने यह विवाह अपने बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए किया था। एम्मा ने श्रीसेन के विश्वास पर खरा उतरते हुए अपने दायित्व को भलीभांति निभाया उन्होंने श्रीसेन को उनके लक्ष्य की प्राप्ति में हर प्रकार से सहयोग भी दिया है।

 

अमर्त्य सेन की कृतियां



श्री सेन ने अपने गहन अर्थशास्त्रीय अध्ययन और शोधों के आधार पर लगभग 200 से अधिक लेखों, निबंधों, शोध पत्रो और लगभग 25 पुस्तकों का सृजन किया है। चॉयस ऑफ टैक्नीक्स, कलैक्टिव चॉयस एडं सोशल वेलफेयर, ऑन इकॉनॉमिक इनइक्वैविटी, पावर्टी एंड फैमिन्स, चॉयस वेलफेयर एंड मैनेजमेंट, ऑन इथिक्स एंड इकॉनॉमिक्स, मनी एंड वैल्यू, इनइक्वैविटी रिएक्जिमिन्ड सहित अर्थशास्त्र के विषयों के अतिरिक्त विभिन्न देशों की सामाजिक एवं सांस्कृतिक समस्याओं एवं खूबियों को उजागर करती कृतियों का भी सृजन किया है।

 

पुरस्कार और सम्मान



सर्वाधिक प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार के अतिरिक्त श्री अमर्त्य सेन को उनके कार्यों व उपलब्धियों के लिए समय समय पर देश विदेश में सम्मानित किया जाता रहा है।

  • • 10 दिसंबर 1998 को अमर्त्य सेन को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
  • • भारत सरकार द्वारा सन् 1976 में महालनोबिस पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
  • • सन् 1999 में उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
  • • सन् 1986 से 1988 तक वे इंटरनेशनल इकॉनॉमिक्स एसोसिएशन के अध्यक्ष रहे।
  • • सन् 1994 में उन्हें अमेरिकन इकॉनॉमिक्स एसोसिएशन का अध्यक्ष बनाया गया।
  • • वे रॉयल इकॉनॉमिक्स सोसायटी के सदस्य भी रहे।
  • • अमेरिकन एकेडमी ऑफ आर्ट्स एंड साइंसेज के विदेशी मानद सदस्य रहे।
  • • ब्रिटिश एकेडमी के फैलोशिप रहे।
  • • इकॉनोमक्रिक सोसायटी के फैलोशिप रहे।
  • • इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज (हेग) के मानद सदस्य रहे।
  • • सन् 1990 में एग्नेली इंटरनेशनल प्राइस तथा एलेन शॉन फेन्सटाइन वर्ल्ड हंगर अवार्ड से सम्मानित किया गया।
  • • सस्केचान यूनिवर्सिटी द्वारा उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की गई।

 

 

 

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